चन्द्रगुप्त द्वितीय की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ/Chandragupta II Vikramaditya: Political and Cultural Achievements

चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) गुप्त वंश का महान शासक था, जिसने भारत को राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक उत्कर्ष प्रदान किया। उसके शासनकाल में कला, साहित्य, विज्ञान और धर्म का अभूतपूर्व विकास हुआ। यही कारण है कि गुप्त काल को भारतीय इतिहास का “स्वर्ण युग” कहा जाता है।

परिचय

चन्द्रगुप्त द्वितीय न सिर्फ गुप्त वंश बल्कि प्राचीन भारत का एक महान शासक माना जाता है। वह एक महान विजेता, सफल कूटनीतिज्ञ, कुशल शासन प्रबंधक, कला मर्मज्ञ, विद्वानों का संरक्षक, काव्य प्रेमी एवं संस्कृति का उन्नायक था। अगर देखा जाय तो गुप्त साम्राज्य की स्थापना चन्द्रगुप्त प्रथम ने की थी और साम्राज्य के विस्तार कार्यो को समुद्रगुप्त ने प्रारम्भ किया तथा साम्राज्य को शीर्ष ऊँचाई पर पहुँचाने का कार्य चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने किया। चन्द्रगुप्त द्वितीय भारतीय इतिहास का ऐसा महान शासक था, जिसके शासनकाल में गुप्त साम्राज्य ने प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति प्राप्त की और इसी प्रगति के कारण गुप्त साम्राज्य भारतीय इतिहास में स्वर्ण युग के नाम से जाना जाने लगा। अतः चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपलब्धियों को विभिन्न उपशीर्षकों के अंतर्गत उल्लेखित किया जा सकता है—-

(A) वैवाहिक सम्बन्ध और साम्राज्य की स्थिरता

ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है कि समुंद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात गुप्त साम्राज्य पर पुनः संकट के बादल छा गये थे। रामगुप्त के विद्रोह और शको के आक्रमण ने अन्य अधीनस्थ शासको को भी विद्रोह का झण्डा उठाने के लिए प्रेरित किया होगा। इस स्थिति से निपटने के लिए चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पहले अपनी आंतरिक स्थिति सुदृढ़ की। उसने वैवाहिक संबंधो की एक श्रृंखला बनाकर अनेक राजाओ को अपना मित्र एवं हितैसी बना लिया। इन शक्तिशाली राजाओ से साथ वैवाहिक सम्बन्ध बनाने का उद्देश्य यह था कि वे किसी भी अन्य राजा के साथ मिलकर उसके राज्य पर आक्रमण न कर दे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने अनेक राजवंशो से वैवाहिक सम्बन्धो को स्थापित किया—

1* उसने अपना विवाह नाग सामन्त की कन्या कुबेरनागा से किया।

2*  उसने अपनी कन्या प्रभावती का विवाह वाकाटक वंश के प्रतिभाशाली और वीर सम्राट रुद्रसेन द्वितीय से किया।

3*  उसने अपने ज्येष्ठ भ्राता रामगुप्त की विधवा स्त्री ध्रुवदेवी से विवाह किया डॉ विसेन्ट स्मिथ ने इन वैवाहिक संबंधों को बड़ा महत्व दिया। उसके अनुसार इनके द्वारा ही वह शको से भारत की रक्षा करने में समर्थ हुआ होगा।

4*  चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने पुत्र का विवाह कुन्तल के शक्तिशाली राजा की कन्या से किया।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय इन वैवाहिक संबंधों का राजनीतिक महत्व था। इन वैवाहिक संबंधों ने चन्द्रगुप्त की स्थिति सुदृढ़ कर दी। उसे अनेक प्रभावशाली शासको की मित्रता एवं संरक्षण प्राप्त हो गया।

(B) सैन्य अभियान और विस्तार नीति

अपनी स्थिति सुदृढ़ कर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने विजय अभियानों को प्रारम्भ किया। उसकी सबसे पहली विजय शक राजा रुद्रसिंह तृतीय पर हुई। उसे पराजित कर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिम की तरफ विस्तार किया। शको पर विजय प्राप्त कर उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। शक-विजय के स्मृतिस्वरूप ‘सिंह विक्रम’ प्रकार के सिक्के भी चलाये गये। शको पर विजय के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त का अधिकार मालवा, गुजरात, सौराष्ट्र एवं काठियावाड़ पर स्थापित हो गया। अब गुप्त साम्राज्य की सीमा पश्चिमी समुद्र तक पहुँच गई।

चन्द्रगुप्त द्वितीय का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य था, पश्चिमोत्तर के गणराज्यो की शक्ति को जड़ से उखाड़ फेंकना। इन गणराज्यो को नष्ट कर दिया गया। कुषाणों की शक्ति सदैव के लिए नष्ट हो गयी। महरौली अभिलेख से पता चलता है कि उसने पश्चिम में बल्ख तथा पूर्व में बंगाल तक अपनी सत्ता का विस्तार किया।

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(C)  प्रशासनिक व्यवस्था

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य न सिर्फ एक राजनीतिज्ञ, महान विजेता और साम्राज्य निर्माता था, बल्कि वह एक योग्य प्रशासक भी था। उसकी मुहरों एवं अभिलेखों से उसकी शासन व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है। वैशाली से प्राप्त मुहरों एवं दामोदरपुर तामपत्र में अनेक पदाधिकारियों के  नाम मिलते है। चीनी यात्री फाहियान जो उसके समय (399 ई0) भारत आया था, के विवरण से भी इसकी कुछ जानकारी प्राप्त होती है। राजा शासन का प्रधान था। प्रशासनिक कार्यो में राजकुमार भी उसकी सहायता करते थे। राज्य के प्रमुख अधिकारी उपरिक (प्रांतीय शासक अथवा गवर्नर), महादंडनायक (न्यायाधिकारी), विनयस्थितिस्थापक (कानून एवं व्यवस्था की स्थापना करना), महाप्रतिहार (राजमहल का मुख्य सुरक्षधिकारी) इत्यादि थे। मुहरों में अनेक अधिकरणों (कार्यालय) का भी उल्लेख है। इनमे प्रमुख है– कुमारआमात्याधिकारण (राजकुमार के मंत्री का कार्यालय), बलाधिकारण (सेनापति का कार्यालय), रंभण्डाधिकारण (सेना के शेष कोष का कार्यालय), दंडपाशाधिकारण (पुलिस प्रधान दफ्तर)। चन्द्रगुप्त के कुछ सामन्तो और पदाधिकारियों के नाम भी मिलते है जैसे-वीरसेन, शिखरस्वामी, आम्रकार्दव, गोविंदगुप्त इत्यादि। श्रेष्ठि, सार्थवाह और कुलिक श्रेणियों की मुहरे भी मिली है।

प्रांतीय एवं स्थानीय शासन में मौर्यो और सीथियनो की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रभाव देखा जा सकता है। चन्द्रगुप्त के अधीन अनेक अधीनस्थ शासक भी थे, जिन्हें प्रशासनिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। प्रशासनिक सुविधा के लिए साम्राज्य विषय, भुक्ति एवं प्रदेश में विभक्त था। स्थानीय शासन में निगम एवं श्रेणी प्रमुख भूमिका निभाते थे।

(D) अन्य उपलब्धियाँ

चन्द्रगुप्त द्वितीय का प्राचीन भारतीय इतिहास में अद्वितीय स्थान है। वह एक वीर योद्धा, साम्राज्य निर्माता, कुशल प्रशासक एवं महान कूटनीतिज्ञ के रूप में विख्यात है। वह एक प्रजावात्सल्य शासक था, जो सदैव अपनी प्रजा के हित की कामना करता था। स्वयं वैष्णव होते हुए भी उसने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। चीनी यात्री फाहियान चन्द्रगुप्त की उदार धार्मिक नीति एवं दानशीलता की प्रशंसा करता है। चन्द्रगुप्त ने मुद्रा व्यवस्था में भी परिवर्तन किया। उसके पूर्वजों के समय मे सिर्फ सोने के सिक्के चलते थे परन्तु उसने चाँदी एवं ताँबे के सिक्के भी जारी किये। चन्द्रगुप्त के सिक्के अनेक प्रकार के है, उसके सिक्के मुख्यतः धनुर्धर, सिंहनिहंता, अश्वरोही और छत्र प्रकार के है। इन सिक्कों के चित्रों और अभिलेखों द्वारा चन्द्रगुप्त के शौर्य का पता चलता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि चन्द्रगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ भी करवाया, परन्तु उसके अश्वमेघ प्रकार के सिक्के नही मिले है। वह कला एवं साहित्य का प्रेमी एवं विद्वानों का आश्रयदाता था। उसका दरबार नवरत्नों से सुशोभित था, जिनमे सबसे विख्यात महाकवि कालिदास थे। इस समय आर्थिक क्षेत्र एवं कलाओं के विभिन्न क्षेत्रों में भी अभूतपूर्व विकास हुआ, इसिलिये अनेक विद्वानों की मान्यता है कि अगर गुप्त काल भारतीय इतिहास का “स्वर्ण युग” था तो वह काल वस्तुतः चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का ही शासनकाल था।

निष्कर्ष

 उपर्युक्त विवेचना के आधार पर यह कहना न्यायसंगत होगा कि इस समय भारत की शासन व्यवस्था एवं अन्य व्यवस्थाएं उन्नत अवस्था मे थी। मनुष्य का जीवन सुखमय तथा शान्तिमय था। राज्य की धार्मिक नीति उदार थी। मनुष्य के धार्मिक विचारों में राज्य की ओर से किसी प्रकार का हस्तक्षेप नही किया जाता था। राजा स्वयं ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था किन्तु उसका  दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ अच्छा व्यवहार था। इन सभी उपलब्धियों के कारण ही गुप्त साम्राज्य भारतीय इतिहास में स्वर्णिम परिच्छेद का प्रतिनिधित्व करता है। 

FAQ / PAQ (People Also Ask)

1. चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य क्यों कहा जाता है?

उत्तर: चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिम भारत में शासन करने वाले शक नरेश रुद्रसिंह तृतीय को हराकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने “विक्रमादित्य” की उपाधि अपनाई, जो उनके पराक्रम, वीरता और गौरवशाली शासन का प्रतीक मानी जाती है।

2. चन्द्रगुप्त द्वितीय की प्रमुख राजनीतिक उपलब्धियाँ क्या थीं?

उत्तर: उनकी प्रमुख राजनीतिक सफलताओं में शकों पर निर्णायक विजय प्राप्त करना, पश्चिमी भारत को गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित करना, वाकाटक वंश से वैवाहिक गठबंधन स्थापित करना और शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना शामिल था। इन उपलब्धियों से गुप्त साम्राज्य की एकता, स्थिरता और प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

3. चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार के प्रमुख नवरत्न कौन थे?

उत्तर: चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नौ विद्वान और विदुषी विद्यमान थे, जिन्हें “नवरत्न” कहा जाता था। इनमें प्रसिद्ध कवि कालिदास, शब्दकोश रचयिता अमरसिंह, खगोलशास्त्री वराहमिहिर, वैद्य धन्वंतरि, तथा क्षपणक, घटकर्पर, शंख, शपूर्नक और वेतालभट्ट जैसे विद्वान सम्मिलित थे। इन नवरत्नों ने साहित्य, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

4. फाहियान ने चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन के बारे में क्या कहा है?

उत्तर: चीनी यात्री फाहियान, जो 399 से 414 ईस्वी के बीच भारत आए थे, ने अपने यात्रा-वृत्तांत में उल्लेख किया है कि उस समय भारत में शांति और समृद्धि का वातावरण था। अपराध नगण्य थे, लोग धार्मिक रूप से सहिष्णु और संतुष्ट जीवन व्यतीत कर रहे थे, तथा शासन व्यवस्था सुव्यवस्थित और न्यायपूर्ण थी।

5. चन्द्रगुप्त द्वितीय का भारत के सांस्कृतिक विकास में क्या योगदान था?

उत्तर: चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कला, साहित्य, संगीत और धर्म के संरक्षण को अपनी नीति का प्रमुख हिस्सा बनाया। उनके शासनकाल में कालिदास जैसे महान कवियों ने संस्कृत साहित्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। मंदिर वास्तुकला, सुंदर सिक्कों की निर्माण कला और धार्मिक सहिष्णुता ने उस काल को भारत की सांस्कृतिक उन्नति का स्वर्ण युग बना दिया।

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