छत्रपति शिवाजी महाराज: एक महान प्रशासक, कुशल सेनानायक एवं श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ (UPSC/BA/MA History)

छत्रपति शिवाजी महाराज मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक असाधारण व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वे न केवल अद्वितीय वीरता से परिपूर्ण योद्धा थे, बल्कि प्रशासनिक कुशलता और दूरदर्शी कूटनीति के भी प्रतीक थे। कठिन और प्रतिकूल राजनीतिक वातावरण में उन्होंने मराठा शक्ति को संगठित कर एक स्वतंत्र और सुदृढ़ राज्य की नींव रखी। उनका शासन जनहित, न्याय, धार्मिक सहिष्णुता और अनुशासित सैन्य व्यवस्था पर आधारित था, जिसने उनके राज्य को दीर्घकालीन स्थिरता प्रदान की। वास्तव में, छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान प्रशासक एवं सेनानायक थे, जिनकी नीतियाँ आज भी सुशासन और राष्ट्रनिर्माण के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

भूमिका (Introduction)

छत्रपति शिवाजी महाराज मध्यकालीन भारतीय इतिहास के उन विशिष्ट शासकों में गिने जाते हैं, जिनके व्यक्तित्व में साहसिक योद्धा, कुशल प्रशासक और चतुर कूटनीतिज्ञ—तीनों गुणों का अनूठा संगम दिखाई देता है। उन्होंने मुगल तथा बीजापुर जैसी शक्तिशाली सल्तनतों का निर्भीकता से सामना करते हुए एक स्वतंत्र, संगठित और आत्मनिर्भर मराठा राज्य की नींव रखी। उनकी प्रशासनिक नीतियाँ जनकल्याण, न्याय और सुशासन पर आधारित थीं। इसी कारण छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान प्रशासक एवं सेनानायक के रूप में भारतीय इतिहास में अमर हैं।

शिवाजी का प्रारम्भिक जीवन

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 ई. को जुन्नार के समीप शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। यद्यपि कुछ पुरानी पाठ्य पुस्तकों में इनकी जन्म तिथि 1627 ई. भी मिलती है, किंतु आधुनिक शोधों एवं महाराष्ट्र सरकार द्वारा 19 फरवरी 1630 ई. को ही आधिकारिक एवं प्रामाणिक तिथि स्वीकार किया गया है। उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले व माता का नाम जीजाबाई था।  शाहजी भोसले बीजापुर के सुल्तान के यहाँ उच्च पद  पर आसीन थे। और उनकी सेवा के पुरस्कार के रूप में  उन्हें पुणे की जागीर प्राप्त हुई थी। शिवाजी अपनी माता के साथ पुणे में ही रहे, उन पर अपनी माता के धार्मिक विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। दादाजी कोणदेव जो बड़े ही योग्य और दूरदर्शी  व्यक्ति थे, शिवाजी को सैन्य शिक्षा में दक्ष  किया। कोणदेव के संपर्क में रहने के कारण शिवाजी में  हिंदू तथा हिंदू जाति के प्रति प्रगाढ़ प्रेम पैदा हो गया। फलतः उन्होंने एक स्वतंत्र हिंदू राज्य की स्थापना करना अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।

कुशल सेना नायक एवं महान योद्धा

 शिवाजी एक महान सेनानायक एवं महान योद्धा थे। सर्वप्रथम शिवाजी ने 1646  ई. में बीजापुर के तोरण नामक पहाड़ी दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1648 ई. में उन्होंने पुरन्दर के दुर्ग को जीत लिया। 1656 ई. जावली और 1659  ई. में बीजापुर के योग्य सेनापति अफजल ख़ानको प्रतापगढ़ के किले में मार दिया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी को पकड़ने के लिए कई असफल प्रयास किए और अंत में मराठा सरदार से शांति संधि कर ली।

सन1663 ई. में शिवाजी ने मुगल सूबेदार शाइस्ता ख़ान को पराजित किया। इस सफलता के उपरांत  शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण करके उसे लूट लिया (1664 ई. में प्रथम सूरत लूट)। सन1665 ई. में मुगल सेनापति जयसिंह ने शिवाजी को परास्त करके पुरन्दर की संधि के लिए बाध्य किया और शिवाजी को स्वयं मुगलों के दरबार में हाजिर होना पड़ा। परंतु उन्हें वहाँ अपमान सहना पड़ा। तथा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन वे एक कूटनीतिक चाल से वहाँ से निकल कर अपने राज्य पहुँच गए। 13 अक्टूबर 1670 ई. में उन्होंने पुनः सूरत को लूटा और अनेक किले जीते। जून 1674 ई. में अपनी राजधानी रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक करवाया। और छत्रपति की उपाधि धारण की। उनका सबसे महत्वपूर्ण आक्रमण  कर्नाटक आक्रमण (1677-78 ई.) था। जिसके दौरान उन्होंने वेल्लौर,  जिंजी, तंजौर आदि अनेक किले जीते और अपने कुशल सेनानायक एवं महान योद्धा होने का परिचय दिया।

शिवाजी एक कुशल प्रशासक

 शिवाजी एक योग्य प्रशासक एवं उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ थे उन्होंने मराठों को संगठित करके उनमें एक नई शक्ति का सृजन किया। उन्होंने एक शक्तिशाली राज्य का निर्माण किया। उनकी शासन व्यवस्था सुसंगठित थी जो भ्रष्टाचार और पक्षपात रहित थी। उनके शासन प्रबंध का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है–

केंद्रीय प्रशासन (अष्टप्रधान व्यवस्था)

शिवाजी का केंद्रीय  शासन स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश था। किन्तु वे प्रजा की भलाई का पूरा ध्यान रखते थे। अतः उन्हें एक दयालु एवं निरंकुश शासक (अथवा प्रबुद्ध निरंकुश शासक) कहा जा सकता है। उन्होंने शासन संबंधी कार्यों में परामर्श लेने के लिये “अष्टप्रधान” की व्यवस्था की थी। इन्हें किसी भी रूप में मंत्रिमंडल की संज्ञा नहीं दी जा सकती थी। ये मंत्री सचिव के रूप में कार्य करते थे और उन्हें प्रत्यक्ष रूप से निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं था, इनकी भूमिका मात्र सलाहकार के रूप में थी। इनमें “पेशवा” का पद सर्वोच्च था। जो प्रधानमंत्री कहलाता था। इसका कार्य अन्य मंत्रियों के कार्यों की देखभाल करना तथा उनकी अनुपस्थिति में शासन का संचालन करना था।

  • दूसरा: मजूमदार अथवा अमात्य था जो राजस्व विभाग का संचालन करता था। 
  • तीसरा: वाक्यानवीस अथवा मंत्री था,जो राजा की प्रतिदिन की गतिविधियों एवं दरबार की घटनाओं का विवरण रखता था। 
  • चौथा: शुरूनवीस अथवा सचिव था, जो पत्र-व्यवहार का कार्य संपन्न करता था।
  • पांचवा: दबीर अथवा सुमंत था,जो परराष्ट्र मंत्री के रूप में कार्य करता था। तथा इसके साथ ही गुप्तचर विभाग भी उसके अधीन था। 
  • छठवां: सर-ए-नौबत अथवा सेनापति था,जो सैन्य विभाग का प्रधान संचालक था। 
  • सातवां: पंडितराव अथवा थानाध्यक्ष कहलाता था, जो धर्म एवं दान विभाग का प्रधान होता था। इसका कार्य अधर्मियों एवं दुश्चरित्रों को दंडित कर जन-आचरण को उच्च बनाना था। 
  • आठवां: न्यायाधीशथा,जो न्याय विभाग के प्रधान के रूप में कार्य करता था तथा राज्य के अंतर्गत सभी न्यायाधीश उसके अधीन होते थे।

इनके अतिरिक्त सार्वजनिक कल्याण के लिये अठारह विभाग थे तथा प्रत्येक विभाग का एक पृथक मंत्री होता था। शिवाजी के अधीन पंडितराव और न्यायाधीश को छोड़कर शेष सभी मंत्रियों को युद्ध के समय सैन्य संचालन का कार्य करना पड़ता था।

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प्रांतीय प्रशासन

 यद्यपि शिवाजी का राज्य अस्थिर था, उसकी कोई निश्चित सीमा न थी। किन्तु प्रशासन की सुविधा एवं समुचित संचालन के उद्देश्य से उन्होंने अपने राज्य को उत्तरी प्रांत,  दक्षिणी प्रांत,दक्षिणी-पूर्वी प्रांत तथा सुदूर दक्षिणी प्रांत में विभाजित किया था। प्रांत के प्रमुख प्रांतपति (राज्यपाल) होता था। राजा ही उसकी नियुक्ति और पदच्युति कर सकता था। यह अपने प्रांत के प्रशासन के लिए उत्तरदायी था। प्रांतीय प्रशासन केंद्रीय प्रशासन के ही समान था।

स्थानीय प्रशासन

प्रत्येक प्रांत राजस्व के आधार पर महलों/सरकारों (जिलों) में विभक्त था, इसका प्रमुख अधिकारी महलदार या तरफदार होता था। जिला अनेक मौजों/ग्राम समूहों में  विभाजित था। कमाविसदार नामक अधिकारी दो अथवा तीन ग्रामों का प्रशासन देखता था। प्रत्येक ग्राम में पाटिल/पटेल नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई थी। ग्राम ही प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी।

न्याय-व्यवस्था

शिवाजी ने न्याय के क्षेत्र में एक उच्च आदर्श का प्रतिमान स्थापित किया था। उनके संपूर्ण राज्य में हिन्दू और मुस्लिम जनता में बिना किसी भेदभाव के अपने धार्मिक रीति-रिवाजों को संपादित करने की अनुमति प्रदान की गई थी। शिवाजी की न्याय व्यवस्था दोहरी थी, दीवानी न्यायालय हिंदुओं की स्मृतियों के आधार पर तथा  मुस्लिमों का न्याय उनके धार्मिक ग्रंथों के आधार पर किया जाता था। फौजदारी न्याय में दोनों के लिए समान दंड का विधान था। न्याय का प्रधान न्यायाधीश होता था। छोटे-छोटे झगड़ों का फैसला करने के लिए ग्रामों में ग्राम पंचायतें थीं। शिवाजी ने जहाँ कुरान का सम्मान किया वहीं वे गीता के सम्मान से भी पीछे  नहीं रहे।

भू-राजस्व व्यवस्था

 शिवाजी की भूमि व्यवस्था मालिक अंबर एवं मौर्यों की व्यवस्था पर आधारित थी। शिवाजी ने भूमि मापने के लिए काठी एवं छड़ी का प्रयोग किया। भूमि मापने की सबसे छोटी इकाई को “चावर” कहा जाता था, जो मराठी भाषा का शब्द है। शिवाजी ने 1679 ई. में भू-सर्वेक्षण करवाकर  कुल उपज का 33% राजस्व के रूप में लिया, जो कालांतर में 40% हो गया। कर निर्धारण में दोहरी नीति अपनाई। बंजर भूमि से अल्प कर लिया।

शिवाजी ने ज़मींदारी एवं जागीरदारी व्यवस्था का विरोध करते हुए   रैयतवाड़ी व्यवस्था को अपनाया। उनकी आय के प्रमुख साधन राजस्व कर,चौथ  एवं सरदेशमुखी थे। चौथ (पड़ोसी मुग़ल एवं बीजापुरी क्षेत्रों से वसूल किया जाने वाला सुरक्षा कर था), जो विदेशियों के आक्रमण से रक्षा करने के एवज,(बदले) में लिया जाने वाला कर था (1/4)। सरदेशमुखी में आय का 10% भाग वसूला जाता था। शिवाजी के भूमि सुधारों से किसानों की दशा अच्छी हो गई और राज्य की आय बढ़ी। जो उनके कुशल प्रशासक होने का परिचय देता है।

सैन्य-व्यवस्था

शिवाजी की सैन्य व्यवस्था ऐसी सुगठित शिक्षित एवं अनुशासित थी कि वह 17वीं सदी में अजेय हो गई थी। शिवाजी उच्च कोटि के सेनानायक थे और उनके अंदर सेनानायक के अनेक गुण मौजूद थे क्योंकि वे युद्ध की योजना स्वयं ही बनाते थे और उसको अंत तक गोपनीय रखते थे और आवश्यकता पड़ने पर ही उसे खोलते थे। शिवाजी में अद्भुत संगठन शक्ति थी । वे अपने सैनिकों के लिए आदर्श थे और युद्ध में उनके साथ कठिन परिश्रम करते थे। इन्होंने सर-ए-नौबत अर्थात सेनापति को नाममात्र का ही बनाए रखा। उसको सेना की भर्ती करना, वेतन बाँटना एवं सेना को संगठित करने जैसे कार्यों को सौंपा। उन्होंने अपनी सेना समानता एवं संतुलन के आधार पर निर्मित की। सेना को पैदल, पागा और सिलेहदार में विभाजित किया गया था।

मध्ययुग में वे ही सर्वप्रथम शासक थे जिन्होंने समय की आवश्यकता के कारण, दरिया सारंग के नेतृत्व में जल बेड़े (जल सेना) का निर्माण किया था।

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निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि शिवाजी में महान प्रशासक, कुशल सेनानायक तथा श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ आदि समस्त गुण मौजूद थे और इन्हीं गुणों के परिणामस्वरूप शिवाजी एकीकृत मराठा साम्राज्य की स्थापना करने में सफल रहे।

1: छत्रपति शिवाजी महाराज को एक महान प्रशासक क्यों माना जाता है?

उत्तर: छत्रपति शिवाजी महाराज को एक महान प्रशासक इसलिए माना जाता है क्योंकि उन्होंने सुव्यवस्थित और जनहितकारी प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की। उनके शासन में केंद्रीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तर पर स्पष्ट प्रशासनिक ढाँचा विकसित किया गया। अष्टप्रधान परिषद के माध्यम से उन्होंने शासन को संगठित रूप दिया, जबकि अंतिम निर्णय स्वयं राजा लेते थे। उनकी न्याय व्यवस्था निष्पक्ष थी और भ्रष्टाचार पर कठोर नियंत्रण रखा जाता था। भूमि सुधार, किसान संरक्षण और जनकल्याणकारी नीतियों के कारण उनका शासन प्रजा के विश्वास पर आधारित था। इसी कारण छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान प्रशासक एवं सेनानायक के रूप में इतिहास में प्रतिष्ठित हैं।

2: शिवाजी महाराज की सैन्य नीति की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?

उत्तर: शिवाजी महाराज की सैन्य नीति अत्यंत व्यावहारिक, अनुशासित और रणनीतिक थी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध पद्धति को प्रभावी रूप से अपनाया, जिससे सीमित संसाधनों के बावजूद शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया जा सका। उनकी सेना स्थायी और वेतनभोगी थी, जिससे सैनिकों में निष्ठा और अनुशासन बना रहता था। दुर्गों को उन्होंने सैन्य शक्ति का आधार बनाया और समुद्री सुरक्षा के लिए एक संगठित नौसेना की स्थापना की, जो भारत के मध्यकालीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।

3: अष्टप्रधान व्यवस्था क्या थी?

उत्तर: अष्टप्रधान व्यवस्था शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित एक उच्चस्तरीय प्रशासनिक परिषद थी, जिसमें आठ प्रमुख मंत्री शामिल होते थे। प्रत्येक मंत्री को वित्त, सेना, न्याय, विदेश नीति जैसे विशिष्ट विभागों की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। ये मंत्री राजा को सलाह देते थे, किंतु शासन का अंतिम निर्णय लेने का अधिकार शिवाजी महाराज के पास ही सुरक्षित रहता था। यह व्यवस्था प्रशासनिक संतुलन, जवाबदेही और कार्यकुशलता का उत्कृष्ट उदाहरण थी।

4: शिवाजी महाराज की भू-राजस्व व्यवस्था की विशेषता क्या थी?

उत्तर: शिवाजी महाराज की भू-राजस्व व्यवस्था किसान-हितैषी और न्यायपूर्ण थी। उन्होंने भूमि का वैज्ञानिक ढंग से मापन करवाकर उपज के अनुसार कर निर्धारित किया। बिचौलियों की भूमिका समाप्त कर किसानों से सीधे कर वसूली की रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की गई। इससे किसानों का शोषण कम हुआ, कृषि को प्रोत्साहन मिला और राज्य की आय में स्थिर वृद्धि हुई। प्राकृतिक आपदाओं के समय करों में छूट देना उनकी संवेदनशील प्रशासनिक सोच को दर्शाता है।

5: मध्यकालीन भारतीय इतिहास में शिवाजी महाराज का क्या योगदान था?

उत्तर: मध्यकालीन भारतीय इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विदेशी और दमनकारी शक्तियों को चुनौती देकर एक स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की। उनका शासन राजनीतिक स्वाधीनता, कुशल प्रशासन और संगठित सैन्य शक्ति पर आधारित था। उन्होंने आत्मसम्मान, स्वराज्य और सुशासन की अवधारणा को साकार किया। उनके प्रयासों ने न केवल मराठा शक्ति को सुदृढ़ किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा भी दी।

  1. सरकार, यदुनाथ (Jadunath Sarkar) – शिवाजी एंड हिज टाइम्स (Shivaji and His Times), एम. सी. सरकार एंड संस, कलकत्ता, (प्रकाशन वर्ष: 1919)।
  2. सरदेसाई, जी. एस. (G. S. Sardesai) – न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज (New History of the Marathas – Vol. 1: Shivaji and His Lineage), फिनिक्स पब्लिकेशन, बॉम्बे, (प्रकाशन वर्ष: 1946)।
  3. सेन, सुरेन्द्र नाथ (S. N. Sen) – एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम ऑफ द मराठाज (Administrative System of the Marathas), कोलकाता विश्वविद्यालय, (प्रकाशन वर्ष: 1923)।
  4. राणाडे, महादेव गोविंद (M. G. Ranade) – राइज ऑफ द मराठा पावर (Rise of the Maratha Power), पुना पैट्रियॉटिक प्रेस, (प्रकाशन वर्ष: 1900)।
  5. वर्मा, एच. एल. (H. L. Verma) – मध्यकालीन भारत का इतिहास (1200-1707 ई.), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, (प्रकाशन वर्ष: 1998)।
Dr. Om Prakash Singh, Assistant Professor and Head of History Department at Constituent Government College Thakurdwara

Dr. Om Prakash Singh

Assistant Professor & Head, Department of History

Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)

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