चमार जाति का इतिहास और योगदान: सिंधु सभ्यता से आधुनिक भारत तक

चमार जाति इतिहास योगदान भारतीय सामाजिक इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरक स्थान रखता है। यह समाज प्राचीन काल से ही श्रम, आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना का प्रतीक रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक भारत तक, चमार समाज ने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी भूमिका निभाई और सामाजिक ढांचे को मजबूती प्रदान की। बौद्ध परंपरा में समता के विचार हों, संत आंदोलन में मानवता और भक्ति का संदेश हो या स्वतंत्रता संग्राम में साहस और बलिदान—हर दौर में चमार समाज ने परिवर्तन की चेतना को आगे बढ़ाया। चमार जाति इतिहास योगदान हमें यह समझाता है कि भारतीय सभ्यता का विकास केवल राजाओं और शासकों से नहीं, बल्कि उन समुदायों से भी हुआ है जिन्होंने श्रम, संघर्ष और सामाजिक न्याय के लिए निरंतर प्रयास किए। आज के समय में यह इतिहास आत्मसम्मान, जागरूकता और समानता की प्रेरणा देता है।

चमार जाति इतिहास योगदान भारतीय समाज की प्राचीन और निरंतर विकसित होती सामाजिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत की अनुसूचित जातियों में चमार समुदाय एक ऐसा समाज है, जिसकी ऐतिहासिक जड़ें अत्यंत गहरी और व्यापक मानी जाती हैं। अनेक इतिहासकारों और सामाजिक अध्ययनों के अनुसार, इस समुदाय का संबंध भारत की सबसे पुरानी सभ्यता—सिंधु घाटी सभ्यता—से जुड़ा हुआ माना जाता है।

प्राचीन काल में चमार समाज श्रम आधारित जीवन शैली, कौशल और सामुदायिक संगठन का प्रतीक रहा है। प्रारंभिक शैव परंपरा में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण बताई जाती है, जहाँ श्रम, प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन को विशेष महत्व दिया गया। समय के साथ यह समाज सामाजिक असमानताओं और भेदभाव का सामना करता रहा, लेकिन इसके बावजूद चमार जाति इतिहास योगदान संघर्ष, आत्मसम्मान और सामाजिक परिवर्तन की चेतना को जीवित रखता है।

आधुनिक भारत में भी चमार समाज ने शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई है। यह इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए समानता, न्याय और मानवीय गरिमा की प्रेरणा देता है।

सिंधु घाटी सभ्यता और चमार जाति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सिंधु घाटी सभ्यता के अध्ययन से संकेत मिलता है कि यह एक उन्नत, संगठित और श्रमप्रधान समाज था, जहाँ शैव संस्कृति का प्रभाव था। क्योकि हमे सिंधु घाटी सभ्यता का अध्ययन करने से पता चलता है कि ‘चमार’ सिंधु घाटी के वीर शासको की संतान है।  ये आदिवासी लोग, आदि पुरुष शिव के वंशज है। प्राचीन समय में सिन्धु घाटी की सभ्यता में शिव का अखंड साम्राज्य था। ये लोग शैव संस्कृति के पूजक थे। आर्यों ने आकार इनकी सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। सिंधु सभ्यता के अंतिम शासक ‘चुमुरी’(चमार जाती के सम्राट) थे, जिन्होने आर्यों से मुक़ाबला किया और आर्यों के विरुद्ध लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हो गये। उसके सैनिक भारत के शेष भागो मे फैल गये। तथा उन्हे ‘असुर’ एवं शूद्र कहा जाने लगा और इन्होने शक्ति एकत्रित करके अनेक गणराज्यो कि स्थापना  कर ली। इनमें महाराज ‘बलि’ तथा ‘सुदास’ कुशल शासक हुए हैं।

आजीवक, बौद्ध परंपरा और सामाजिक समता

लगभग 600 ई.पू. इस आदिम जाति ने एक आजीवक संघ बनाया, जिसने आर्यों के अत्याचारों और कर्मकांडो के विरूद्ध आवाज उठाई। शूद्र माता सुजाता ने  घोर तप करने से कमजोर हुए महात्मा बुद्ध को पौष्टिक खीर खिलाई,जिससे बुद्ध की नवचेतना जाग्रत हो गयी। फिर उन्होने मानव कल्याण हेतु बौद्ध धर्म प्रतिपादित किया। क्योंकि बौद्ध धर्म जात–पात तथा वर्ण व्यवस्था को नहीं मानता था, और समता एवं बन्धुता मे विश्वास करता था । इन्होने (इस जाति) बौद्ध धर्म को फलने-फूलने मे अपना पूरा योगदान दिया। तथा शासन-प्रशासन में अपनी पूरी पैठ  जमा ली।

बौद्ध धर्म का पतन और अछूत व्यवस्था का निर्माण

मौर्य सम्राट अशोक महान के बाद गुप्तकाल में बौद्ध धर्म का पतन होने लगा। आगे चलकर राजपूतों और तुर्को ने तो बौद्धों का सफाया ही कर दिया। ऊंच-नीच का भेद-भाव बढने से समाज में एक नया अछूत वर्ग पैदा हो गया। डॉ. अंबेडकर के मतानुसार अछूतों के पूर्वज बौद्ध थे और शरणार्थी बनकर गाँव के बाहर बसे थे। वे उस समय अछूत नहीं थे। छिन्न-भिन्न हुए पशुवत मरे आदमी के समान थे, न  कुछ कम न कुछ अधिक। वैदिक काल में धर्म के नाम पर यज्ञों में पशुओ की बलि दी जाती थी तथा लोग गोमांस खाते थे। ब्राह्मणो ने बाद मे गोपूजा करनी प्रारम्भ कर दी तथा पशुबलि को बंद कर दिया। अब लोगो ने गौमांस खाना छोंड़ दिया परंतु यें ग्राम से बाहर अलग-अलग हुए लोग; मरे हुए पशु का मांस खाते रहे क्योंकि महात्मा बुद्ध ने हिंसा द्वारा पशु मारकर खाने की निंदा की थी। तथा मारे हुए पशु का मांस खाने का समर्थन। मरे हुए जानवरों पर इन छितरे हुए लोगो का अधिकार हो गया; जो बौद्ध थे। अब वे ही ब्राह्मण जो पहले मांस खाते थे, इनको अपवित्र मनाने लगे और अछूत कहने लगे। कालांतर में इन्होने (चमारो) पशुओ की खाल उतरना, उसे रंगना, उपयोगी बनाना, उससे रस्सियाँ, जूते एवं अन्य उपयोगी वस्तुए बनाना शुरू कर दिया। सवर्ण जतियों ने इन्हे दास बना लिया और इनसे हर तरह की बेगारी का काम लेने लगे। इन मजदूर कुशलकर्मी, मेहनती लोगों ने देश का उत्पादान बढ़ाकर भारत की सभ्यता एवं संस्क्रति के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्हे अछूत या चमार कहा जाने लगा तथा इन पर अनेक प्रतिबंध लगाकर पशु से बदतर बना दिया।

चमार’ शब्द की व्युत्पत्ति और सामाजिक अर्थ

‘चमार’ शब्द च+म+अ+र के योग से बना हैं, अर्थात चर्म+मज्जा +अस्थि +रूधिर का योग अर्थात चमार का जन्म आदि पुरूष के सम्पूर्ण शरीर से हुआ हैं।तथा उनमें सभी वर्णो के गुण हैं। महान विद्वान शैयरिंग का कथन है कि चमार जाति में आधा हिस्सा ब्राह्मण, एक चौथाई वैश्य, और एक चौथाई शूद्र का है। माननीय शैयरिंग का यह कथन मुझे भी सही लगता है क्योंकि चमार जाति के लोगों को यदि समुचित वातावरण मिले तो उनकी बुद्धि ब्राह्मण वर्ग से किसी भी स्थिति में कम नहीं होती हैं। कालांतर में चमार अनेक उपजातियों मे बंट गये-

उपजातियाँ, सामाजिक विभाजन और पहचान का संघर्ष

जैसवार, रैदास, दुसाध, पासी, रामदासी, कोरी, महार, रविदास, जाटव, धूसिया, अहरवार, दोहरे, संखवार, कुरील, खटीक, डोर, मांड, धनुक, आदि विद्वान मिस्टर ब्रिग्स की अंग्रेजी पुस्तक ‘दी चमार’ में चमार जाति की उपजातियों की संख्या 1156 बताई गयी हैं।

बहिष्कृत शूद्रों को अपमान पग-पग पर झेलना पड़ता तथा वह अपमान चमार जाति के लोगों को ही उठाना पड़ता हैं। वर्तमान में भी देखा जाय तो उनके साथ अपमान का व्यवहार हो रहा हैं। लेकिन आधुनिक समय में इनमें जागृति आई है। चमार जाति के नाम पर अपमानित होने के कारण वे अपने को चमार न कहकर दूसरी जातियों के उपनामों का प्रयोग करने लगे हैं।

 श्री करन सिंह दीवान ‘चामर जाटव सम्राट’ नामक पुस्तक में कहते हैं कि सदियों से भारत में चमारों (जाटवों) का शोषण होता रहा हैं। इन्ही अत्याचारों के कारण चमार जाति समय-समय पर बचाव हेतु जाति व धर्म बदलती रही है। चमार ब्राह्मण बने, राजपूत बने, वैश्य बने, क्षत्रिय बने, मुसलमान बने, ईसाई बने, सिक्ख बने, बौद्ध बने, आदि धर्मी बने, अधर्मी बने, नास्तिक बने, ईश्वरवादी बने, राधास्वामी बने, वैरागी बने, आचार्य बने, भक्त बने, नवीन शर्मा बने, सूर्यवंशी बने, अतः चमार जाति संसार में पायी जाने वाली बड़ी से बड़ी एवं छोटी से छोटी हर जाति के गुणों से सम्पन्न रही। चमारो ने हजारों रूप बदले परंतु भारतीय आर्यों ने इन्हे ‘चमार’ ही कहा और उनसे बैर, नफरत का ही बर्ताव किया। इस चमार नाम के पुछल्ले से बचने के लिए इन्होने अनेक प्रयास किये पर यह पुछल्ला लगा ही रहा।

जातिवाद ऊँच-नीच की भावना से भयभीत होकर चमार छिपकर दूसरी जातियों में मिलता रहा है। अगर देखा जाय तो भारत का 85% ईसाई, चमार बना है, 25% मुसलमान, चमार बना है, 10% ठाकुर, 25% जाट, 10% भारत की अन्य हिन्दू कही जाने वाली जातियों मे चमार मिला है। 90% सिक्ख धर्म में आज भी चमार है इतना ही नहीं पूरे  सिक्ख धर्म में आज चमार ही सरगना है और अधिकांश गुरूद्धवारों में पुजारी चमार ही है।

चमार जाति के लोग चमार शब्द को अपने से दूर हटाने के प्रयास में लगे है। बौद्ध धर्म ग्रहण करने का ज़ोर शिक्षितों में बढ़ रहा है, बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने पर वे अपने संबन्धियों से दूर हट जाते है। कभी-कभी वे उनसे कहते है कि तुम लोग चमार हो, मैं तो चमार नहीं बौद्ध हूँ। इन नव दीक्षित बौद्धों को अन्य जाति के लोग उसी तरह चमार ही जानते है जैसे वे जैसवार या राजपूत जाटव कहे जाने वाले लोगों को, और ये लोग अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये अपनी पुरानी जाति के स्थान पर नई जातियाँ कहलाना पसंद करते है। खटीक सोनकर कहलाना पसंद करते है, तो पासी राजवंशी और सफाई मजदूर वाल्मिकी कहलाने में गर्व का अनुभव कहते है।

चमारों कि जनसंख्या गोरखपुर,  आजमगढ़,  मेरठ,  बिजनौर,  जौनपुर,  बुलंदशहर,  आगरा,  कानपुर,  वाराणसी,  सहारनपुर,  देवरिया,  अलीगढ़,  आदि  जिलों में अधिक हैं। लेकिन जौनपुर के चमार अपने को जैसवार या जैसवारा भी कहते हैं। इलाहाबाद, वाराणसी, फैजाबाद, तथा मिर्जापुर जिले के चमार भी अपने को जैसवार कहते हैं। कहीं-कहीं रैदास भी कहते हैं।

 ‘हरिजनवाद’ पुस्तक में श्री बलवंत सिंह ने जाटव जाति के बनने के संबंध में लिखा है आगरा  निवासी श्री रामबाबू का कहना है कि हजारों वर्षों से गुलामी के कारण ‘चमार’ शब्द बहुत ही नीच माना जाने लगा था जिसके कारण 1935-1936 के स्वतंत्रता आंदोलन के समय चमारों के कुछ सुधारवादी नेताओं ने चमार नाम से पिण्ड छुड़ाने के लिये एक दूसरा नाम ‘यादव’ गढ़ा बाद में ये ही ‘जाटव’ कहे जाने लगे और बहुत से चमारों ने यह परिवर्तन मान लिया। इस आंदोलन के प्रमुख नेता डॉ मानिक चंद सेठ, गोपीचन्द सेठ, बनवारीलाल, सेठ रामनारायण दास, यादवेन्द्र सेठ, केशवचंद्र, रामस्वरूप, तथा चंद्रभान आदि थे। अगरे की जीवन मण्डी के इन चमार नेताओं ने इस आंदोलन को दूर-दूर तक फैलाया, जाटव आंदोलन उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों- दिल्ली, हरियाणा, और राजस्थान में विशेष रूप से फैला। अपने नाम के आगे ये लोग सिंह लगाते है। और अपने को चमारो से श्रेष्ठ जताने का प्रयास करते है। किन्तु इन क्षेत्रों के सवर्ण लोग इनके साथ चमार जाति की ही तरह व्यवहार करते हैं।

 अनुसूचित जातियों  में ‘चमार’ एक प्रमुख जाति हैं। इसीलिए चमार जाति को दूसरी अनुसूचित जातियों के साथ सदभाव का व्यवहार करना चाहिए। इसके साथ ही साथ खान-पान और रोटी-बेटी का सम्बंध बनाने पर भी विचार करना चाहिए। मेरे विचार से तो तभी सही रूप से सामाजिक न्याय होगा और इसी प्रकार सभी अनुसूचित जातियाँ एकजुट हो सकेगी।

चमार जाति अपनी श्रेष्ठता में किसी दूसरी जाति से कमतर नहीं हैं। क्योंकि इसमें  भी प्राचीन काल से ही बड़े-बड़े शासक, संत महात्मा हुए हैं। 12 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में  उत्तरी भारत पर दलित राजा ‘सातन पासी’ के पूर्वज शासन करते थे। महाराजा सातन पासी के 12 किले थे, जिनमें सातन कोट,सोहनिया सादेर, नाहेर, काकोरगढ़, बिजनौर प्रमुख थे। वह एक सफल शासक व कुशल योद्धा था। उसने मोहम्मद गोरी की सेना को हराने तथा विद्रोह को दबाने के लिये अपने प्राणो की आहुती दे दी थी। संत शिरोमणी गुरु रविदास तथा कबीर साहेब आदि संतों ने अंधविश्वास व पाखण्ड का खण्डन करके भक्ति आंदोलन से भारतीय समाज का उद्धार किया। 18 वीं सदी में गुरु घासी दास ने दलितो के उत्थान के लिये ‘सतनामी पन्त’ की स्थापना की। उन्होने सत्य, अहिंसा तथा “सभी मानव एक हैं ” की शिक्षा दी। उन्होने समता तथा सत्य का प्रचार किया और जातिवाद, छुआछूत तथा पत्थर पूजा का विरोध किया।

Must Read It: शोध आलेख : संयुक्त प्रांत में चमार जाति का सामाजिक और राजनीतिक उत्थान : निम्न जातियों में परिवर्तन का अध्ययन

स्वतंत्रता संग्राम में चमार समाज का योगदान

 चमारों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की वीर सिपाही वीरांगना झलकारी बाई ने अपनी रियासत झाँसी की अंग्रेज़ो से रक्षा करने के लिये महारानी लक्ष्मीबाई की जगह रानी जैसी वेषभूषा पहनकर अंग्रेजों के विरूद्ध खूब लड़ी तथा अपने प्राणो की आहुती दे दी। जबकि उनके पति पूरन और भाऊ बख्शी आदि दूसरे स्थानो पर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। उदइया चमार को भला कौन भुला सकता हैं जिसने 1857, अलीगढ़ की क्रांति से 50 वर्ष पूर्व गनौरी के खाली किले में बारूद की सुरंगे बिछा दी थी, जिसमें सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। बाद में इस महान क्रांतिवीर को फांसी पर चढ़ाया गया। वीरवर उदइया चमार की गौरव गाथा आज भी क्षेत्र के लोगो में प्रचलित हैं।  

   26 मई 1857 को सोरो क्षेत्र की क्रांति ज्वाला में चेतराम जाटव व बल्लू मेहतर अपने प्राणो की आहुती देने कूद पड़े। चेतराम जाटव व बल्लू मेहतर जो क्रांति के प्राण थे, को पेड़ों से बांधकर गोलीयों से उड़ा दिया गया। अमर शहीद बांके चमार 1857 की क्रांति में बागी नेता हरपाल सिंह का साथी था। क्रान्ति विफल होने पर 18 लोग बागी घोषित किये गये। उनमें बांके चमार प्रमुख था। जिसे मौत के घाट उतार दिया गया। आजादी के इस संघर्ष में मंगल मोची को भला कौन भूल सकता हैं, जिन्होने अंग्रेज़ो से मोर्चा लिया। 13 अप्रैल सन् 1919 में हुये जालियावाला बाग हत्या काण्ड के आरोपी अंग्रेज़ अधिकारी डायर की हत्या कर के जालियावाले बाग हत्या काण्ड का बदला लेने वाला और कोई नहीं चमार जाति से ही उत्पन्न सपूत ऊधम सिंह थे।

भारत को आज़ाद कराने में इस समाज के लोग आज़ादी की लड़ाई में भी कूद पड़ें और इस समाज ने देश को आजाद कराने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। चाहे वह जालियावाला हत्या काण्ड हो या चौरी-चौरा काण्ड, असहयोग आंदोलन रहा हो या सविनय अविज्ञ आंदोलन, व्यक्तिगत सत्याग्रह हो या भारत छोड़ो आंदोलन, आजाद हिन्द फौज हो या संविधान निर्माण। सभी में चमार समाज के लोगो ने बढ़-चढ़ कर अगवानी की, जिससे चमारो की शौर्यता, वीरता और साहस पर हर एक भारतवासी को गर्व रहेगा।

देश को आजाद कराने वाले चमार जाति के क्रातिवीरों और शहीदो के नाम

चौरी-चौरा काण्ड : 

अमर शहीद रामपती चमार, अमर शहीद संपति चमार, अमर शहीद छोट्टू पासी, क्रांतिवीर अयोध्या चमार, क्रांतिवीर अगलू पासी, क्रांतिवीर कल्लू चमार, क्रांतिवीर गरीब चमार, क्रांतिवीर नोहर चमार, क्रांतिवीर फलई चमार, क्रांतिवीर बिरजा चमार, क्रांतिवीर मंडी चमार, क्रांतिवीर मेढई चमार (गोरखपुर)।

असहयोग आंदोलन: 

मिठई चमार, मुक्खू चमार, ठेलू चमार (गोरखपुर), दुर्जन चमार, चौधरी परगी लाल (सीतापुर), रामप्रसाद चमार (आजमगढ़), सूरज नरायन चमार (सुल्तानपुर), सीताराम चमार, जोधा चमार (लखनऊ)।

नमक सत्याग्रह और सविनय अविज्ञ आंदोलन: 

अमर शहीद बलदेव प्रसाद कुरील (कानपुर), सूचित राम जयसवार (चमार), छोट्टे लाल पासी, टीकराम पासी, चंद्रिका प्रासाद पासी (लखनऊ), क्रांतिवीर विंदेश्वरी, रघुवर चमार, रामदुलारे चमार, उमराव चमार, भभूति चमार (गोरखपुर), चौधरी परगी लाल (सीतापुर), कंधाई पासी (सुल्तानपुर), पूरनमासी चमार, चिल्लू चमार (देवरिया), पूरनमल जाटव, भजनलाल, (आगरा), झब्बल रैदास (खीरी), अयोध्या चमार, कमले चमार, घुम्मन चमार, बनवारी चमार, धनपत चमार, हरदयाल चमार (इटावा), रामलाल चमार (कानपुर), घासी चमार, रामलाल चमार, दरसन चमार (फ़र्रुखाबाद)।

 व्यक्तिगत सत्याग्रह: 

नारायण दास चमार, मोहन लाल, मैकूलाल, टीकराम, उमराव, जगन्नाथ प्रसाद, कंधई (लखनऊ), अयोध्या चमार (इटावा), अयोध्या चमार, गुनई चमार, (फैजाबाद), विभूति चमार (गोरखपुर), छेदीलाल रैदास, नंगराम रैदास (खीरी), बलदेव सिंह आर्य (गढ़वाल), रामाधार चमार (बलिया), राजाराम छिपी, मंशाराम (सहारनपुर), बिहारी चमार (उन्नाव), खूशीराम(बिजनौर)।

भारत छोड़ो आंदोलन: 

मैकुलाल चमार (सीतापुर), शिवधान चमार (आजमगढ़), झाऊलाल जाटव (मुरादाबाद), नानकऊ मेहतर(इललाहाबाद), रामसुभग चमार, हरी चमार, घेला दुसाध (बलिया), बसंत लाल, मानसिंह आजाद (लखनऊ), कल्लू चमार (जौनपुर), समंता राव जाटव (आगरा), छिबनू चमार, सुमेरराम चमार, सुखदेव चमार (वाराणसी), सत्यनारायन चमरु (गाजीपुर) कंधई लाल धूसिया, मुन्ना रविदास, रामदीन रविदास, कल्लू रविदास (कानपुर), धज्जू चमार, रामखिलख चमार (फैजाबाद)  महावीर हरिजन (गोरखपुर), पूरन लाल रैदास, प्यारेलाल रैदास, (खीरी),  कमला हरिजन, गाजिराम चमार, (लखनऊ), जवाहिर चमार  (हरदोई), हरी सिंह जाटव (मेरठ), मंगल लाल चर्मकार (झाँसी)।

आजाद हिन्द फौज: 

रामप्रसाद चमार (कानपुर), भोलाराम जैसवार (वाराणसी), कांशीराम, गबड़ राम, कन्या राम (हरियाणा), बाबूलाल  (लखनऊ)।

इतना ही नहीं जब शैडयूल्ड कास्ट फेडेरेशन ने सन 1946-1947 में देशव्यापी आंदोलन छेड़ा, तो आंदोलन का उद्देश्य था, अछूतों के अधिकारों की रक्षा, और उनका नारा था “अधिकारों के लिये लड़ना होगा, जीना है तो मारना होगा”। देश भर की जेलो में लगभग 25 हजार सत्याग्रही भर गये। उन्ही क्रांतिवीरों में थे अमर शहीद दोजीराम जाटव जो 12 जून सन 1947 लखनऊ जेल की सलाखों के पीछे अपने देश-जाती के लिये शहीद हो गये। जो ग्राम चांदपा, तहसील हाथरस, जिला अलीगढ़ के रहने वाले थे। बाबू जगजीवन राम, जुगल किशोर, डॉ॰ अंबेडकर, स्वामी अछूतनंद, प्रथ्वी सिंह आजाद तथा भिखू सिंह आदि ने देश को आजाद कराने के साथ ही साथ अपने समाज को आगे ले जाने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। अनेक चमार युवको ने सुभाषचंद्र बोस की “आजाद हिन्द फौज” में शामिल होकर आजादी की लड़ाई लड़ी। और अपने समाज का नाम रोशन किया।

आधुनिक भारत में चमार समाज की भूमिका

आज ‘चमार’ समाज में आने वाले व्यक्तियों की संख्या लगभग 20 करोड़ है। यह एक श्रेष्ठ जाती है। इसके गोत्र अनेक क्षत्रिय जातिओं में पाये जाते हैं। इसमें संत रविदास तथा कबीर हुए। डॉ॰ अंबेडकर (महार) का तो विकल्प किसी जाती में भी नहीं है, वे भी चमारों की एक उपजाति में से हैं। दादा साहब गायकवाड, बेरिस्टर खोवारगढ़े, प्रो॰ बी॰पी॰ मौर्या, बाबू जगजीवन राम, चौ॰ चांदराम, रामविलास पासवान, कांशीराम, बहन कुमारी मायावती एवं मीरा कुमार आदि महापरूषों का जन्म इसी चमार जाती में होने से इस जाती का महत्व बहुत बढ़ गया हैं। आज उत्तर प्रदेश ही नहीं भारत की राजनीति इसी जाति के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है, पहले बाबा साहब डॉ॰ भीम राव अंबेडकर की जयंती उसी जाति के लोगों द्वारा मनाई जाती थी, लेकिन आज वोट बैंक की राजनीति में सवर्ण लोग भी चमारों को सहयोग प्रदान कर रहे हैं।  इतना ही नहीं आज भारत की सभी राजनीतिक पार्टियों ने बाबा साहेब को ही अपना सिम्बल बना रखा हैं। इस वर्ष तो बाबा साहब डॉ॰ भीम राव अंबेडकर की 125 वीं  जयंती (२०१६) को सम्पूर्ण विश्व में मनाया गया तथा बाबा साहब को ‘विश्व रत्न’ देने की कवायत शुरू हो गई है। आज संसार का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं हैं; जिसमें चमार जाति अपना महत्वपूर्ण योगदान न दे रही हो, चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो या सामाजिक, साहित्य का क्षेत्र हो या मनोरंजन का, खेल का क्षेत्र हो या सिनेमा का, रक्षा का क्षेत्र हो या विज्ञान प्रोधौगिकी का, आदि सभी क्षेत्रों मे चमार जाति के लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। मेरे विचार से यदि इस जाती का एक मजबूत संगठन हो जाय तो यह बहुत सशक्त हो सकती है। लेकिन आज  तो यह है कि इस जाती के लोग सम्पन्न होकर अपनी जड़ों से ही अलग हो जाते है और सवर्ण लोगों के समुदाय में सम्मिलित हो जाते है। इसमे उनकी अपनी निजी उन्नति सार्वजनिक समाज की उन्नति में बाधा बन जाती है। गरीब दल, गरीब असाहय ही रह जाता है। सम्पन्न लोगों को चाहिए कि वे अपने गरीब और असाहय भाइयों का ख्याल रखे तथा उन्हे ऊपर उठाने में सहयोग करे, क्योंकि ये ही लोग उनकी शक्ति है और मेरे सभी शिक्षित भाईयों को भी अंबेडकरवादी मिशन को सहयोग देना चाहिए, जिससे सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है।

सामाजिक एकता और भविष्य की दिशा

मैं अपने समाज के शिक्षित और सुसंपन्न साथियों से इस लेख के माध्यम से विनम्र अनुरोध करता हूँ कि यदि हमें अपने समाज को सचेत, सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है, तो इसकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी। हमारे आचार-विचार, व्यवहार और जीवन-मूल्य समाज के लिए उदाहरण बनने चाहिए। केवल आर्थिक उन्नति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उच्च विचार, नैतिक आचरण, शिक्षा और संगठन—ये चार स्तंभ किसी भी समाज को मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

शिक्षा वह माध्यम है जो हमें अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है, जबकि संगठन हमें सामूहिक शक्ति देता है। जब समाज के सक्षम लोग आगे बढ़कर कमजोर और वंचित वर्ग का हाथ थामते हैं, तभी वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव होता है। अपने महापुरुषों, मसीहाओं और नेताओं के विचारों से प्रेरणा लेकर हमें उनके संघर्षों और बलिदानों का सम्मान करना चाहिए। यह श्रद्धा केवल प्रतीकात्मक न होकर व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।

यदि हम आपसी भेदभाव, हीन भावना और स्वार्थ से ऊपर उठकर एकजुट होकर कार्य करें, तो हमारा समाज न केवल अपनी पहचान को सशक्त करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उज्ज्वल और सम्मानजनक भविष्य भी सुनिश्चित करेगा। सामाजिक एकता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और इसी के माध्यम से हम एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और प्रगतिशील समाज का निर्माण कर सकते हैं।

निष्कर्ष

चमार जाति का इतिहास संघर्ष, श्रम और आत्मसम्मान से निर्मित एक सशक्त परंपरा को दर्शाता है। यह समाज सदियों से कठिन परिस्थितियों में भी भारतीय सभ्यता के निर्माण और विकास में निरंतर योगदान देता रहा है। सामाजिक भेदभाव और उपेक्षा के बावजूद चमार समुदाय ने साहस, धैर्य और सामूहिक चेतना के बल पर अपनी पहचान बनाए रखी।

वास्तव में, चमार जाति इतिहास योगदान यह स्पष्ट करता है कि यह समाज किसी भी दृष्टि से हीन नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक ढांचे की एक मजबूत आधारशिला रहा है। शिक्षा, संगठन और जागरूकता के माध्यम से यह समुदाय भविष्य में भी सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने में और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

संदर्भ:  हिन्दी बुक्स:

1.  डॉ॰ सुमनाक्षर सोहनपाल, आदिम जाति चामर (इतिहास,धर्म व संस्कृति), भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली, २००२.

2.  नारायण बद्री,विष्णु महापात्र, अनन्त राम मिश्रा, उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास, वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली, २००६.

3.  सरोज राम परकाश, पासी समाज दर्पण, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, २०११.

4.  ‘राज’ सिंह राजपाल, स्वामी अछूतानन्द हरिहर व्यक्तित्व और कृतित्व, दलित साहित्य रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली, २००९.

5.  विद्रोही एम॰आर॰,दलित दस्तावेज़, सम्यक प्रकाशन, दिल्ली, २००४.

6.  दुसाध एच॰एल॰, सामाजिक परिवर्तन और बी॰एस॰पी॰, सम्यक प्रकाशन, दिल्ली,२००५.

7.  डॉ॰ प्रसाद माता, सामाजिक परिवर्तन में दलित साहित्य कि भूमिका, भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली, २००४.

8.   डॉ॰ भूषण मुकेश, दलितों का इतिहास, अतीत एवं वर्तमान के आइने में, राधा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, २०१०.

9.  नैमिषराय मोहनदास, स्वतन्त्रता संग्राम के दलित क्रांतिकारी।

10.  डॉ॰ प्रसाद माता, भारत में दलित जागरण और उसके अग्रदूत (राज्यों के अलग-अलग विवरण), सम्यक प्रकाशन, दिल्ली, २०१०.

11.  डींकर डी॰सी॰, स्वतन्त्रता संग्राम में अछूतों का योगदान, गौतम बुक सेंटर, दिल्ली, २००७.

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14.   Akela, A.R. Kanshi Ram Ke Saakshatkaar, Manak Publications (Pvt.) Limited, Delhi, 2007.

15.  Ambedkar, B.R, Who were the Shudras and how they come to be the fourth Varna in Indo- Aryan Society, Thacker and Co, Bombay, 1946.

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18.  Gooptu, Nandini, Caste and Labour : untouchable social movements in Urban UP in the early Twenteeth century, Oxford University Press (First Published in 1993), Delhi,1996.

19.  Gupta, S.K. “The Scheduled Castes in Modern Indian Politics: Their Emergence as a Political Power”, Munshiram Manoharlal, New Delhi, 1985.

20.  Jatav, Mangal Singh. Shri 108 Swami Achhutanand ji ka jivan Parichaya (An Introduction to the life of Shri 108 Swami Achhutanand) Saraswati Press, Gwalior, 1997.

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26.  Narayan, Badri. Women Heroes and Dalit Assertion in North India: Culture, Identity and Politics, Sage Publication, New Delhi, 2006.

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33.  Kumar Vivek, Dalit Leadership in India, Kalpaz Publications, Delhi, 2002.

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FAQs : चमार जाति इतिहास योगदान

प्रश्न 1: चमार जाति का इतिहास कितना प्राचीन माना जाता है?

उत्तर: चमार जाति का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। अनेक इतिहासकारों और सामाजिक अध्येताओं का मत है कि इस समुदाय की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता के काल तक फैली हुई हैं। उस समय विकसित श्रम आधारित जीवन, सामुदायिक व्यवस्था और प्रारंभिक शैव परंपराओं में चमार समाज की भूमिका देखी जाती है, जो इसके प्राचीन अस्तित्व की ओर संकेत करती है।

प्रश्न 2: चमार समाज का बौद्ध धर्म से क्या संबंध रहा है?

उत्तर: बौद्ध धर्म ने जाति-भेद और ऊँच-नीच की व्यवस्था का स्पष्ट विरोध किया था। इसी कारण चमार समाज ने बौद्ध विचारधारा को स्वीकार किया और उसके प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाई। डॉ. भीमराव अंबेडकर सहित कई विद्वानों का मानना है कि आज के अनेक दलित समुदायों के पूर्वज बौद्ध परंपरा से जुड़े रहे हैं।

प्रश्न 3: चमार जाति को अछूत क्यों कहा जाने लगा?

उत्तर: बौद्ध धर्म के पतन के बाद जब ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था मजबूत हुई, तब श्रम से जुड़े कार्यों को हीन दृष्टि से देखा जाने लगा। मृत पशुओं से संबंधित कार्यों के कारण चमार समाज को सामाजिक रूप से अलग किया गया और धीरे-धीरे उन्हें अछूत की संज्ञा दी गई। यह स्थिति सामाजिक भेदभाव की देन थी, न कि किसी धार्मिक या नैतिक आधार की।

प्रश्न 4: स्वतंत्रता संग्राम में चमार समाज का क्या योगदान रहा?

उत्तर: चमार जाति इतिहास योगदान का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वतंत्रता आंदोलन में दिखाई देता है। 1857 की क्रांति से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन और आज़ाद हिंद फौज तक, इस समाज के लोगों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। झलकारी बाई, उदइया चमार जैसे अनेक वीरों ने साहस और बलिदान के साथ स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया।

प्रश्न 5: आधुनिक भारत में चमार समाज की वर्तमान स्थिति क्या है?

उत्तर: आज चमार समाज शिक्षा, राजनीति, प्रशासन और सामाजिक आंदोलनों में निरंतर प्रगति कर रहा है। डॉ. भीमराव अंबेडकर, बाबू जगजीवन राम, कांशीराम और मायावती जैसे नेताओं ने इस समाज को नई पहचान, आत्मसम्मान और अधिकारों की दिशा दी है।

प्रश्न 6: चमार जाति इतिहास योगदान को जानना क्यों आवश्यक है?

उत्तर: चमार जाति इतिहास योगदान को समझना भारतीय समाज में सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास को समझने के लिए आवश्यक है। यह इतिहास बताता है कि यह समाज केवल संघर्ष का ही नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के निर्माण और परिवर्तन का भी महत्वपूर्ण आधार रहा है।

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