टिप्पणी: इस पेज पर नीचे भाषा बदलने का बटन मौजूद है। उस पर क्लिक करके आप इस आर्टिकल को अपनी पसंद की भाषा (20 भाषाओं) में पढ़ सकते हैं। |
Tip: The Language Switcher button is available at the bottom of this page. Click on it to read this article in your preferred language (20 languages).”
छत्रपति शिवाजी महाराज मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक असाधारण व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वे न केवल अद्वितीय वीरता से परिपूर्ण योद्धा थे, बल्कि प्रशासनिक कुशलता और दूरदर्शी कूटनीति के भी प्रतीक थे। कठिन और प्रतिकूल राजनीतिक वातावरण में उन्होंने मराठा शक्ति को संगठित कर एक स्वतंत्र और सुदृढ़ राज्य की नींव रखी। उनका शासन जनहित, न्याय, धार्मिक सहिष्णुता और अनुशासित सैन्य व्यवस्था पर आधारित था, जिसने उनके राज्य को दीर्घकालीन स्थिरता प्रदान की। वास्तव में, छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान प्रशासक एवं सेनानायक थे, जिनकी नीतियाँ आज भी सुशासन और राष्ट्रनिर्माण के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

भूमिका (Introduction)
छत्रपति शिवाजी महाराज मध्यकालीन भारतीय इतिहास के उन विशिष्ट शासकों में गिने जाते हैं, जिनके व्यक्तित्व में साहसिक योद्धा, कुशल प्रशासक और चतुर कूटनीतिज्ञ—तीनों गुणों का अनूठा संगम दिखाई देता है। उन्होंने मुगल तथा बीजापुर जैसी शक्तिशाली सल्तनतों का निर्भीकता से सामना करते हुए एक स्वतंत्र, संगठित और आत्मनिर्भर मराठा राज्य की नींव रखी। उनकी प्रशासनिक नीतियाँ जनकल्याण, न्याय और सुशासन पर आधारित थीं। इसी कारण छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान प्रशासक एवं सेनानायक के रूप में भारतीय इतिहास में अमर हैं।
शिवाजी का प्रारम्भिक जीवन
शिवाजी का जन्म 10 अप्रैल1627 ई0 को जुन्नार के समीप शिवनेर के पहाड़ी दुर्ग में हुआ था। उसके पिता का नाम शाहजी भोंसले व माता का नाम जीजाबाई था। शाहजी भोसले बीजापुर के सुल्तान के यहां ऊंच पद पर आसीन थे। और उनकी सेवा के पुरुस्कार के रूप में उन्हें पूना की जागीर प्रप्त हुई थी। शिवाजी अपनी माता के साथ पुणे में ही रहे, उन पर अपनी माता के धार्मिक विचारो का गहरा प्रभाव पड़ा। दादाजी कोणदेव जो बड़े ही योग्य और दूरदर्शी व्यक्ति थे शिवाजी को सैन्य शिक्षा में दक्ष किया। कोणदेव के सम्पर्क में रहने के करण शिवाजी में हिंदू तथा हिंदू जाति के प्रति प्रगाढ़ प्रेम पैदा हो गया। फलतः उन्होने एक स्वतंत्र हिंदू राज्य की स्थापना करने का अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
कुशल सेना नायक एवं महान योद्धा
शिवाजी एक महान सेनानायक एवं महान योद्धा थे। सर्वप्रथम शिवाजी ने 1646 ई0 में बीजापुर के तोरण नमक पहाड़ी दुर्ग पर अधिकार कर लिया इसके बाद 1648 ई0 में उसने पुरन्दर के दुर्ग को जीत लिया। 1656 ई0 जावली और 1659 ई0 में बीजापुर के योग्य सेनापति अफजल खान को प्रतापगढ़ के किले में मार दिया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी को पकड़ने के लिए कई असफल प्रयास किए। और अंत में मराठा सरदार से शांति संधि कर ली। सन1663 ई0 में शिवाजी ने मुगल सूबेदार शाइस्ता खां को पराजित किया। इस सफलता के उपरांत शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण करके उसे लूट लिया। सन1665 ई0 में मुगल सेनापति जयसिंह ने शिवाजी को परास्त करके पुरन्दर की संधि के लिए वाध्य किया और शिवाजी को स्वयं मुगलों के दरबार में हाजिर होना पड़ा। परंतु उन्हें वहां अपमान सहना पड़ा। तथा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन वे एक कूटनीतिज्ञ चाल से वहां से निकल कर अपने राज्य पहुँच गए। 13 अक्टूबर 1670 ई0 में उन्होंने पुनः सूरत को लूटा और अनेक किले जीते। जून 1674 ई0 में अपनी राजधानी रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक करबाया। और छत्रपति की उपाधि धारण की। उनका सबसे महत्वपूर्ण आक्रमण कर्नाटक आक्रमण (1677-78 ई0) था। जिसके दौरान उन्होंने वेल्लौर, जिंजी, तंजौर आदि अनेक किले जीते और अपने कुशल सेनानायक एवं महान योद्धा होने का परिचय दिया।
शिवाजी एक कुशल प्रशासक
शिवा जी एक योग्य प्रशासक एवं उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ थे उन्होंने मराठो को संगठित करके उनमे एक नई शक्ति का सृजन किया। उन्होंने एक शक्तिशाली राज्य का निर्माण किया। उनकी शासन व्यवस्था सुसंगठित थी जो भ्रष्टाचार और पक्षपात रहित थी। उनके शासन प्रबंध का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है–
केंद्रीय प्रशासन (अष्टप्रधान व्यवस्था)

शिवजी का केंद्रीय शासन स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश था। किन्तु वे प्रजा की भलाई का पूरा ध्यान रखते थे। अतः उन्हें दयालु एवं निरंकुश शासक कह सकते हैं। उन्होंने शासन संबंधी कार्यो में परामर्श लेने के लिये “अष्टप्रधान” की व्यवस्था की थी। इन्हें किसी भी रूप में मंत्रिमंडल की संज्ञा नही दी जा सकती थी। ये मंत्री सचिव के रूप में कार्य करते थे। और उन्हें प्रत्यक्ष रूप से निर्णय लेने का कोई अधिकार नही था, इनकी भूमिका मात्र सलाहकार के रूप में थी। इनमें “पेशवा” का पद सर्वोच्च था। जो प्रधानमंत्री कहलाता था। इसका कार्य अन्य मंत्रियों के कार्यों की देखभाल करना तथा उनकी अनुपस्थिति में शासन का संचालन करना था। दूसरा मजूमदार अथवा अमात्य था जो राजस्व विभाग का संचालन करता था। तीसरा, वाक्यानवीस अथवा मंत्री था,जो राजा की प्रतिदिन की गतिविधियों एवं दरबार की घटनाओं का विवरण रखता था। चौथा शुरूनवीस अथवा सचिव था, जो पत्र-व्यवहार का कार्य सम्पन्न करता था। पांचवा दबीर अथवा सुमन्त था,जो परराष्ट्र मंत्री के रूप में कार्य करता था। तथा इसके साथ ही गुप्तचर विभाग भी उसके अधीन था। छठवां, सर-ए-नौबत अथवा सेनापति था,जो सैन्य विभाग का प्रधान संचालक था। सातवां पण्डितराव अथवा थानाध्यक्ष कहलाता था, जो धर्म एवं दान विभाग का प्रधान होता था। इसका कार्य अधर्मियों एवं दुश्चरित्रो को दण्डित कर जन-आचरण को उच्च बनाना था। आठवां न्यायधीश था,जो न्याय विभाग के प्रधान के रूप में कार्य करता था तथा राज्य के अंतर्गत सभी न्यायाधीश उसके अधीन होते थे। इनके अतिरिक्त सार्वजनिक कल्याण के लिये अठारह विभाग थे तथा प्रत्येक विभाग का एक पृथक मंत्री होता था। शिवजी के अधीन पण्डितराव और न्यायधीश को छोड़कर शेष सभी मंत्रियों को युद्ध के समय सैन्य संचालन का कार्य करना पड़ता था।
Must Read It: शिवाजी महाराज का उदय: 17वीं शताब्दी में मराठा शक्ति के उत्कर्ष के कारण और नेतृत्व
प्रांतीय प्रशासन
यद्यपि शिवजी का राज्य अस्थिर था, उसकी कोई निश्चित सीमा न थी। किन्तु प्रशासन की सुविधा एवं समुचित संचालन के उद्देश्य से उसने अपने राज्य को उत्तरी प्रान्त, दक्षिणी प्रान्त,दक्षिणी-पूर्वी प्रान्त तथा सुदूर दक्षिणी प्रान्त में विभाजित किया था। प्रान्त के प्रमुख प्रान्तपति (राज्यपाल) होता था। राजा ही उसकी नियुक्ति और पदच्युति कर सकता था। यह अपने प्रान्त के प्रशासन के लिए उत्तरदायी था। प्रांतीय प्रशासन केंद्रीय प्रशासन के ही समान था।
स्थानीय प्रशासन
प्रत्येक प्रान्त राजस्व के आधार पर महलो (जिलों) में विभक्त था, इसका प्रमुख अधिकारी महलदार या तरफदार होता था। जिला अनेक मौजो में विभाजित था। कमविसदर नामक अधिकारी दो अथवा तीन ग्रामो का प्रशासन देखता था। प्रत्येक ग्राम में पाटिल नामक अधिकारी की नियुक्ति की गयी थी। ग्राम ही प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी।
न्याय-व्यवस्था
शिवजी ने न्याय के क्षेत्र में एक उच्च आदर्श का प्रतिमान स्थापित किया था। उसके सम्पूर्ण राज्य में हिन्दू और मुस्लिम जनता में बिना किसी भेदभाव के अपने धार्मिक रीति-रिवाजों को सम्पादित करने की अनुमति प्रदान की गयी थी। शिवजी की न्याय व्यवस्था दोहरी थी, दीवानी न्यायालय हिन्दुओ की स्मृतियों के आधार पर तथा मुस्लिमों का न्याय उनके धार्मिक ग्रंथों के आधार पर किया जाता था। फौजदारी न्याय में दोनों के लिए समान दंड का विधान था। न्याय का प्रधान न्यायाधीश होता था। छोट-छोटे झगड़ो का फैसला करने के लिऐ ग्रामो में ग्राम पंचायते थी। शिवजी ने जहाँ कुरान का सम्मान किया वही वे गीता के सम्मान से भी पीछे नही रहे।
भू-राजस्व व्यवस्था
शिवजी की भूमि व्यवस्था मालिक अम्बर एवं मौर्यो की व्यवस्था पर आधारित थी। शिवजी ने भूमि मापने के लिए काठी एवं छड़ी का प्रयोग किया। भूमि मापने की सबसे छोटी इकाई को “चाबर” कहा जाता था, जो मराठी भाषा का शब्द है। शिवजी ने 1679 ई0 में भू-सर्वेक्षण करवाकर कुल अवाज का 33% राजस्व के रूप में लिया, जो कालान्तर में 40% हो गया। कर निर्धारण में दोहरी नीति अपनाई। बंजर भूमि से अल्प कर लिया। शिवजी ने जमीदारी एवं जागीरदारी व्यवस्था का विरोध करते हुए रैयतवाड़ी व्यवस्था को अपनाया। उनकी आय के प्रमुख साधन राजस्व कर,चौथ, एवं सरदेशमुखी थे। चौथ विदेशियों के आक्रमण से रक्षा करने के एवज,(बदले) में लिया जाने वाला कर था(1/4)। सरदेशमुखी में आय का 10% भाग वसूला जाता था। शिवजी के भूमि सुधारो से किसानों की दशा अच्छी हो गयी और राज्य की आय बढ़ी। जो उसके कुशल प्रशासक होने का परिचय देता है।
सैन्य-व्यवस्था

शिवजी की सैन्य व्यवस्था ऐसी सुगठित शिक्षित एवं अनुशासित थी कि वह 17 वी सदी में अजय हो गयी थी। शिवजी उच्च कोटि के सेनानायक थे और उनके अंदर सेनानायक के अनेक गुण मौजूद थे क्योंकि वे युद्ध की योजना स्वयं ही बनाते थे और उसको अन्त तक गोपनीय रखते थे। और आवश्यकता पड़ने पर ही उसे खोलते थे। शिवजी में अदभुत संगठन शक्ति थी । वे अपने सैनिकों के लिए आदर्श थे और युद्ध मे उनके साथ कठिन परिश्रम करते थे। इन्होंने सर-ए-नौबत अर्थात सेनापति को नाममात्र का ही बनाये रखा। उसको सेना की भर्ती करना, वेतन बाटना एवं सेना को संगठित करने जैसे कार्यो को सौंपा। उन्होंने अपनी सेना समानता एवं सन्तुलन के आधार पर निर्मित किया था। सेना को पैदल, पागा और सिलेहदार में विभाजित किया गया था। मध्ययुग में वे ही सर्वप्रथम शासक थे जिन्होंने समय की आवश्यकता के कारण, दरिया सारंग के नेतृत्व में जल बेड़े (जल सेना) का निर्माण किया था।
Must Read It: पानीपत का तृतीय युद्ध 1761: मराठों की हार ने भारत का भविष्य कैसे बदल दिया?
निष्कर्ष (Conclusion)
उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि शिवजी में महान प्रशासक, कुशल सेनानायक तथा श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ आदि समस्त गुण मौजूद थे और इन्हीं गुणों के परिणामस्वरूप शिवजी एकीकृत मराठा साम्राज्य की स्थापना करने में सफल रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: छत्रपति शिवाजी महाराज को एक महान प्रशासक क्यों माना जाता है?
उत्तर: छत्रपति शिवाजी महाराज को एक महान प्रशासक इसलिए माना जाता है क्योंकि उन्होंने सुव्यवस्थित और जनहितकारी प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की। उनके शासन में केंद्रीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तर पर स्पष्ट प्रशासनिक ढाँचा विकसित किया गया। अष्टप्रधान परिषद के माध्यम से उन्होंने शासन को संगठित रूप दिया, जबकि अंतिम निर्णय स्वयं राजा लेते थे। उनकी न्याय व्यवस्था निष्पक्ष थी और भ्रष्टाचार पर कठोर नियंत्रण रखा जाता था। भूमि सुधार, किसान संरक्षण और जनकल्याणकारी नीतियों के कारण उनका शासन प्रजा के विश्वास पर आधारित था। इसी कारण छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान प्रशासक एवं सेनानायक के रूप में इतिहास में प्रतिष्ठित हैं।
प्रश्न 2: शिवाजी महाराज की सैन्य नीति की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: शिवाजी महाराज की सैन्य नीति अत्यंत व्यावहारिक, अनुशासित और रणनीतिक थी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध पद्धति को प्रभावी रूप से अपनाया, जिससे सीमित संसाधनों के बावजूद शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया जा सका। उनकी सेना स्थायी और वेतनभोगी थी, जिससे सैनिकों में निष्ठा और अनुशासन बना रहता था। दुर्गों को उन्होंने सैन्य शक्ति का आधार बनाया और समुद्री सुरक्षा के लिए एक संगठित नौसेना की स्थापना की, जो भारत के मध्यकालीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।
प्रश्न 3: अष्टप्रधान व्यवस्था क्या थी?
उत्तर: अष्टप्रधान व्यवस्था शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित एक उच्चस्तरीय प्रशासनिक परिषद थी, जिसमें आठ प्रमुख मंत्री शामिल होते थे। प्रत्येक मंत्री को वित्त, सेना, न्याय, विदेश नीति जैसे विशिष्ट विभागों की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। ये मंत्री राजा को सलाह देते थे, किंतु शासन का अंतिम निर्णय लेने का अधिकार शिवाजी महाराज के पास ही सुरक्षित रहता था। यह व्यवस्था प्रशासनिक संतुलन, जवाबदेही और कार्यकुशलता का उत्कृष्ट उदाहरण थी।
प्रश्न 4: शिवाजी महाराज की भू-राजस्व व्यवस्था की विशेषता क्या थी?
उत्तर: शिवाजी महाराज की भू-राजस्व व्यवस्था किसान-हितैषी और न्यायपूर्ण थी। उन्होंने भूमि का वैज्ञानिक ढंग से मापन करवाकर उपज के अनुसार कर निर्धारित किया। बिचौलियों की भूमिका समाप्त कर किसानों से सीधे कर वसूली की रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की गई। इससे किसानों का शोषण कम हुआ, कृषि को प्रोत्साहन मिला और राज्य की आय में स्थिर वृद्धि हुई। प्राकृतिक आपदाओं के समय करों में छूट देना उनकी संवेदनशील प्रशासनिक सोच को दर्शाता है।
प्रश्न 5: मध्यकालीन भारतीय इतिहास में शिवाजी महाराज का क्या योगदान था?
उत्तर: मध्यकालीन भारतीय इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विदेशी और दमनकारी शक्तियों को चुनौती देकर एक स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की। उनका शासन राजनीतिक स्वाधीनता, कुशल प्रशासन और संगठित सैन्य शक्ति पर आधारित था। उन्होंने आत्मसम्मान, स्वराज्य और सुशासन की अवधारणा को साकार किया। उनके प्रयासों ने न केवल मराठा शक्ति को सुदृढ़ किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा भी दी।
