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पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में से एक है जिसने देश की राजनीतिक दिशा को निर्णायक रूप से बदल दिया। इस संघर्ष में मराठा साम्राज्य को गहरा झटका लगा, जिससे उसकी सैन्य और राजनीतिक शक्ति कमजोर हो गई, वहीं मुगल साम्राज्य का पतन लगभग सुनिश्चित हो गया। युद्ध के बाद उत्तर भारत की सत्ता संरचना में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले और इसी अस्थिरता ने आगे चलकर अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कीं। कारणों, युद्ध की घटनाओं और उसके दूरगामी परिणामों के आधार पर यह संघर्ष मध्यकालीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक युद्धों में गिना जाता है।

परिचय
भारत के मध्यकालीन इतिहास में पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 एक अत्यंत निर्णायक घटना के रूप में जाना जाता है। इस संघर्ष ने मराठा साम्राज्य की शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया और साथ ही मुगल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया को लगभग पूर्ण कर दिया। युद्ध के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता का खालीपन उत्पन्न हुआ, जिसका लाभ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे उठाया और भारत में अपने प्रभाव का विस्तार करना शुरू किया। इस प्रकार यह युद्ध भारतीय इतिहास में बदलते शक्ति-संतुलन और नई राजनीतिक व्यवस्था की शुरुआत का स्पष्ट प्रतीक माना जाता है।
भारत के मध्यकालीन इतिहास में पानीपत के तृतीय युद्ध का अत्यधिक महत्व है। इस युद्ध ने भारतीय राजनीति पर गहरे प्रभाव डाले। इस युद्ध ने मराठो की शक्ति को प्रबल आघात ही नही पहुंचाया, बल्कि मुगल साम्राज्य के पतन का मार्ग भी सशक्त कर दिया। भारतीय शक्तियों की दुर्बलता का लाभ उठाकर अंग्रेजो ने भारत मे अपने पाँव जमाना शुरू कर दिया।
पानीपत के तृतीय युद्ध के प्रमुख कारण

पानीपत के तृतीय युद्ध के कारणों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है—
1 मराठों का दिल्ली और पंजाब की राजनीति में हस्तक्षेप
मुगल बादशाह की दुर्बलता के कारण दरबार मे भारतीय मुसलमानों और तूरानी मुसलमानों के दो परस्पर विरोधी दल बने हुए थे। और जो शक्ति के लिए निरंतर संघर्ष करते रहते थे। उनकी राजनीति में भी मराठो को हस्तक्षेप करना पड़ा। मराठे भारतीय मुसलमान दल के समर्थक बने और वे एक प्रकार से मुगल बादशाहों को बनाने या बिगाड़ने वाले बन गए। परन्तु विदेशी मुसलमानों का दल उनसे असंतुष्ट हो गया, और उस दल ने विदेश से सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया। यह सुविधा उन्हें सहज ही प्राप्त हो गई। क्योंकि अफगानिस्तान के तत्कालीन शासक अहमदशाह अब्दाली पंजाब, मुल्तान और कश्मीर को अपने राज्य की सीमाओं में मानता था और इस उद्देश्य से भारत पर आक्रमण करने तथा दिल्ली की राजनीति में हस्तक्षेप करने को तैयार था। इस कारण मराठे, अब्दाली के विरोध में आये और पानीपत के तृतीय युद्ध हुआ।
2 नादिरशाह के आक्रमण से अब्दाली के लिए मार्ग प्रशस्त होना
1739 ई0 में नादिरशाह ने भारत पर सफल आक्रमण किया था। उसने मुगलो को पराजित करके मुगल साम्राज्य की कमजोरियों को सामने ला दिया था। इस समय अहमदशाह अब्दाली भी एक सेनानायक के रूप में नादिरशाह के साथ था। इस समय अब्दाली ने मुगल सम्राट की शक्तिहीनता, अयोग्यता, साम्राज्य की पतनोन्मुख दशा को देख लिया था और अनुभव कर लिया था। इसी अनुभव के कारण अब्दाली भी आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित हुआ। इस प्रकार नादिरशाह के आक्रमण ने भारत के द्वार अब्दाली के लिये भी खोल दिए।
3 अहमदशाह अब्दाली की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा
अहमदशाह अब्दाली एक पराक्रमी तथा महत्वाकांक्षी शासक था। नादिरशाह की मृत्यु के पश्चात वह काबुल और कंधार का स्वतंत्र शासक बन गया और यह दावा करने लगा कि वह पश्चिमी पंजाब में नादिरशाह का उत्तराधिकारी है और इसिलिये पश्चिमी पंजाब पर उसका अधिकार है। वह पंजाब जैसे उपजाऊ तथा धन सम्पन्न क्षेत्र पर अपना अधिपत्य स्थापित करना चाहता था। अपनी इसी महत्वाकांक्षा से प्ररित होकर उसने मुगलो से मुल्तान और पंजाब को छीन लिया। इस प्रकार अब्दाली को मुगल साम्राज्य की दुर्बलता का पता चला और उसे भारत और बार-बार आक्रमण करने की प्रेरणा मिली।
4 मराठों की उत्तर भारत संबंधी विदेश नीति
मराठे उत्तरी भारत मे अपने साम्राज्य का निर्माण करना चाहते थे। वे दिल्ली पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित कर मुगल साम्राज्य के रक्षक के रूप में पंजाब और उत्तरी पश्चिमी सीमांत क्षेत्र तक मराठा साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे। जब 1752 ई0 में अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब पर अधिकार किया तो वजीर सफदरजंग की प्रार्थना पर मराठो ने मुगल साम्राज्य की रक्षा के लिए सहायता देना स्वीकार कर लिया, परिणामस्वरूप 12 अप्रैल 1752 ई0 को मराठो और मुगलो के बीच मे एक संधि हुई। परन्तु इस प्रकार की नीति मराठो के लिये घातक सिद्ध हुई। इस सन्धि के कारण अब्दाली मराठो से नाराज हो गया। और उसने मराठो को दण्ड देने का निश्चय कर लिया
5 मुगल वजीर और रुहेलों का संघर्ष
मुगल सम्राट की 1748 ई0 में मृत्यु के बाद उसके बजीर और रुहेलों के बीच संघर्ष छिड़ गया। वजीर ने मराठो की मदद रुहेलों को पराजित कर दिया। अब रुहेलों ने अहमदशाह अब्दाली से मदद मांगी। उसी समय पंजाब के कुछ राजपूतो ने भी अहमदशाह को मराठो से लड़ने के लिए बुलाया। निजाम भी उनका साथ दे रहा था। इस तरह मराठो को राजपूतो, रुहेलों और दक्षिण में हैदराबाद के निजाम से भय था। इन सभी कारणों ने भी अब्दाली के भारत पर आक्रमण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
6 सूरजमल जाट की चुनौती
अहमदशाह ने भरतपुर के राजा सूरजमल जाट से भेंट मांगी तो सूरजमल ने कहा कि उत्तर भारत से मराठो को भगाकर अपनी वीरता और स्वयं को शासक सिद्ध करे तो भेंट देने को तैयार है। अतः इस चुनौती ने अब्दाली को भारत पर आक्रमण के लिए ललकारा।
7 भारतीय शक्तियों द्वारा अब्दाली को आमंत्रण
मराठो की विस्तारवाद नीति के कारण भारत के अनेक राज्य मराठो के शत्रु हो गये थे। इन विरोधी शक्तियों ने अहमदशाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। इनमे वसी उल्ला, नजीब खां, मीर मुगलानी, शुजाउद्दौला आदि प्रमुख थे। वसी उल्ला नामक मुस्लिम नेता ने इस्लाम खतरे में है बतलाया और भारतीय पठानों को प्रेरणा दी कि वे इसकी रक्षा करे। इस प्रकार इन भारतीय शक्तियों के निमंत्रण से अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने की प्रेरणा मिली।
8 तत्कालीन कारण
पंजाब पर मराठों का अधिकार
उत्तरी भारत पर मराठो की धाक जमाने का कार्य पेशवा ने अपने भाई रघुनाथ राव को सौंपा। उसने 1757 ई0 में दिल्ली तक धावा मारा और नजीबुउद्दौला को परास्त कर सन्धि के लिए विवश किया। अपने मित्र इमाद-उल-मुल्क को दिल्ली का वजीर बनाकर वापस लौट गया। इसके बाद उसने मल्हारराव होल्कर के साथ पंजाब पर आक्रमण किया। पंजाब अहमदशाह अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह के अधिकार में था। मराठो ने तैमूरशाह को पराजित करके पंजाब, सरहिन्द, लाहौर पर अधिकार कर लिया। यह सब अब्दाली के लिए असहाय था। अतः अब्दाली और मराठो के बीच संघर्ष अनिवार्य था।
पानीपत का तृतीय युद्ध (14 जनवरी 1761 ई.)
मराठो की शक्ति को कुचलने के लिए अहमदशाह अब्दाली एक विशाल सेना के साथ भारत आया और पंजाब पर आक्रमण कर दिया। यहां से मराठो को मार भगाया। जब इस घटना की सूचना पेशवा को मिली तो उसने अपने पुत्र विश्वास राव और अपने भाई सदाशिव राव भाऊ की अध्यक्षता में उसका सामना करने के लिए एक विशाल सेना भेजी गायकवाड़, सिंधिया,तथा होल्कर भी अपनी सेनाओं के साथ उनकी सहायता के लिए चल पड़े। पानीपत के मैदान में दोनो सेनाये आमने सामने आ डटी। कुछ दिनों तक दोनों ओर की सेनाऐ आक्रमण की प्रतीक्षा करती रही।अंत मे रसद के अभाव में मराठो ने सुबह अब्दाली की सेना पर आक्रमण कर दिया। दोनों सेनाओ में घमासान युद्ध हुआ। पेशवा का पुत्र विश्वास राव मारा गया। सदाशिव राव भाऊ भी वीरगति को प्राप्त हुआ। दोनो सेनापतियों की मृत्यु से मराठा सेना में भगदड़ मच गई। अब्दाली की सेना ने मराठा सेना का पीछा किया और उसके शिविर को बुरी तरह लूटा। इस प्रकार पानीपत के युद्ध मे मराठो की पराजय हुई और विजय माला अब्दाली के गले मे पड़ी। इतिहासकार ने लिखा है कि “पानीपत के युद्ध ने मराठो की रीढ तोड़ दी। महाराष्ट्र में कोई भी ऐसा घर नही बचा था, जिसका कोई लाल इस युद्ध मे काम न आया हो।”
पानीपत के तृतीय युद्ध के परिणाम

पानीपत के तृतीय युद्ध के परिणाम भारतीय इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है। इस युद्ध के परिणामो को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत देखा जा सकता है—–
1 अपार जन-हानि
इस युद्ध मे मराठो की बहुत अधिक जन क्षति हुई। अनुमानतः मराठो के एक लाख सैनिक मारे गये। यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि इस युद्ध मे मराठा जाति की एक पीढ़ी का अंत हो गया। इस युद्ध मे मराठो की जन-क्षति के संबंध में सर यदुनाथ सरकार ने लिखा है कि “इस युद्ध मे सम्पूर्ण मराठा जाति पर विपत्ति टूट पड़ी और महाराष्ट्र में एक भी ऐसा घर नही था, जिसमे एक की और कुछ में प्रधान की क्षति पर शौक न मनाया गया हो।”
2 मुगल साम्राज्य का निर्णायक पतन
इस युद्ध से मुगल साम्राज्य का भी पतन हो गया। मुगल सम्राट केवल नाममात्र के रह गए और चारो ओर स्वतंत्र राज्य स्थापित हो गए।
3 सिक्ख, निजाम और हैदर अली का उत्थान
ये तीनो ही मराठो से परेशान थे। मुगल और मराठे दोनो ही कमजोर हो चुके थे। अतः सिक्खों का पंजाब में उत्कर्ष हुआ और उन्होंने अहमदशाह अब्दाली द्वारा स्थापित सत्ता का विरोध किया। मराठो के शत्रु निजाम ने भी अपनी शक्ति और संगठन मजबूत किया। उधर हैदर अली ने निजाम-मराठो के संघर्ष का लाभ उठाकर उनके मराठा प्रदेशो पर और निजाम के प्रदेशो पर अधिकार कर लिया। इससे तीनो में संघर्ष भी बढ़ गये।
4 ब्रिटिश सत्ता के उदय का मार्ग प्रशस्त
व्यापार के उद्देश्य से आये अंग्रेजों ने मुगल साम्राट के नबावों की कमजोरियों का और विघटन का लाभ उठाकर नबावों को बनाना और हटाना आरम्भ कर दिया।सन 1761 के पश्चात मराठो में फूट डालकर उन्हें भी सहायक संधि मानने के लिए विवश कर दिया। अब उन्हें भारत मे चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा। इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना भारत मे हो गई।
5 मराठा संघ का विघटन
इस युद्ध के परिणामस्वरूप मराठा संघ का अंत हो गया तथा मराठा सरदारों में आपसी द्वेष उत्पन्न हो गया। सिंधियां, भोसले, होल्कर तथा गायकवाड़ आदि ने अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।
6 पेशवा बालाजी बाजीराव का निधन
मराठो की पराजय का आघात बालाजी बाजीराव के ह्रदय पर इतना अधिक लगा कि पांच महीने के भीतर ही उसका निधन हो गया तथा पेशवाओ की शक्ति का अत्यधिक ह्रास हो गया।
7 उत्तर भारत से मराठा प्रभाव की समाप्ति
पानीपत के तृतीय युद्ध में पराजित होने के बाद पंजाब, दो-आब आदि प्रदेश मराठो के अधिकार से निकल गए। इस प्रकार उत्तर भारत मे मराठो के प्रभाव की समाप्ति हो गई।
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8 अहमदशाह अब्दाली की शक्ति का भी ह्रास
पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठो की पराजय अवश्य हुई थी परन्तु अहमदशाह अब्दाली की स्वयं की शक्ति भी इतनी घट गई कि उसके विरुद्ध अफगानों ने विद्रोह कर दिया परंतु वह उन्हें दबा नही सका और पंजाब में सिक्खों का उदय हुआ। इससे उसकी दशा और गिर गई।
निष्कर्षत
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पानीपत के इस युद्ध ने यह निर्णय नहीं किया कि भारत पर कौन राज्य करेगा, अपितु यह तय कर दिया कि भारत पर कौन शासन नही करेगा। मराठो की पराजय के बाद ब्रिटिश सत्ता के उदय का रास्ता करीब-करीब साफ हो गया। अप्रत्यक्ष रूप से सिक्खों को भी मराठो की पराजय का फायदा हुआ। इस युद्ध ने मुगल सम्राट को लगभग निर्जीव सा कर दिया, जैसा कि बाद के कुछ वर्ष सिद्ध करते है। पानीपत के युद्ध के सदमे को न सह पाने के कारण बालाजी बाजीराव की कुछ दिन बाद मृत्यु हो गई।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: पानीपत का तृतीय युद्ध कब और किनके बीच लड़ा गया?
उत्तर: पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी 1761 ईस्वी को लड़ा गया था। यह ऐतिहासिक संघर्ष मराठा संघ और अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली (अहमद शाह दुर्रानी) के नेतृत्व वाली शक्तियों के बीच हुआ। यह युद्ध उत्तर भारत की सत्ता को लेकर हुआ एक निर्णायक टकराव था।
प्रश्न 2: पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 क्यों लड़ा गया?
उत्तर: पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 मराठों के उत्तर भारत में लगातार बढ़ते राजनीतिक और सैन्य प्रभाव के कारण हुआ। मराठा मुगल दरबार की राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे थे, जिससे अहमदशाह अब्दाली चिंतित हो गया। इसके अतिरिक्त, अब्दाली की भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा और मराठों द्वारा दिल्ली तक प्रभाव बढ़ाना इस युद्ध के प्रमुख कारण बने।
प्रश्न 3: पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की हार के मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर: मराठों की पराजय के पीछे कई कारण जिम्मेदार थे। उन्हें उत्तर भारत में रसद और भोजन की भारी कमी का सामना करना पड़ा। स्थानीय राजाओं और शक्तियों, जैसे जाटों और राजपूतों का अपेक्षित सहयोग उन्हें नहीं मिला। लंबी आपूर्ति लाइनों के कारण सेना कमजोर होती गई और युद्ध के दौरान प्रमुख सेनानायकों की मृत्यु ने मराठा नेतृत्व को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया।
प्रश्न 4: पानीपत के तृतीय युद्ध का सबसे बड़ा परिणाम क्या माना जाता है?
उत्तर: इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम मराठा शक्ति का गंभीर रूप से कमजोर हो जाना था। मराठे, जो भारत की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर थे, अचानक रक्षात्मक स्थिति में आ गए। इसके साथ ही भारत में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर प्रदान किया।
प्रश्न 5: क्या पानीपत का तृतीय युद्ध मुगल साम्राज्य के अंत का कारण बना?
उत्तर: हाँ, पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मुगल साम्राज्य की वास्तविक शक्ति लगभग समाप्त हो गई। मुगल सम्राट केवल नाममात्र का शासक रह गया और प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह कमजोर पड़ गया। इस युद्ध ने मुगल साम्राज्य के पतन को अंतिम रूप देने में निर्णायक भूमिका निभाई।
