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मुग़ल कालीन समाज को केवल शाही दरबारों की भव्यता और वैभव तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इतिहासकारों की दृष्टि में मुग़ल कालीन समाज के भीतर गहरी सामाजिक विषमता और स्पष्ट वर्गीय असमानता विद्यमान थी। समकालीन इतिहासकारों तथा भारत आए विदेशी यात्रियों के विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि उस युग में शासक वर्ग, सामान्य जनता, ग्रामीण समाज और जातिगत संरचना के बीच व्यापक अंतर मौजूद था। इन स्रोतों के माध्यम से हमें मुग़ल काल की सामाजिक वास्तविकताओं—जैसे अभिजात वर्ग की समृद्धि और आम जनता की कठिन जीवन परिस्थितियों—का यथार्थ चित्र प्राप्त होता है। प्रस्तुत अध्ययन इसी ऐतिहासिक दृष्टिकोण को आधार बनाकर मुग़ल कालीन समाज की वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास करता है।

भूमिका: मुग़ल कालीन समाज को समझने के स्रोत
मुग़ल कालीन जीवन स्तर कि जानकारी का स्त्रोत मुख्यत 16वी और 17वी शताब्दी में आये विदेशी यात्रियों द्वारा लिखा गया विवरण है इन वृतांतों से जो तस्वीर उभरती है उससे मालूम होता है कि शासक वर्ग का एक छोटा सा समूह भारी आडम्बर और विलासिता का जीवन जीता है उसके विपरीत जनसाधारण यानि किसान कारीगर तथा श्रमिक दयनीय दशा में जीवन व्यतीत करते है| तजकीरा ए पीर हसनू तेली नामक रचना में सूरतसिंह ने तत्कालीन शिक्षित तथा सामान्यजन के बीच व्याप्त धार्मिक प्रभाव तथा छोटी-छोटी रूढ़ियों, साथ ही मुगलकाल की नैतिक अवधारणाओं जैसे पेटी, बुर्जुआ छोटे कर्मचारियों तथा व्यापारियों की स्थिति का प्रभावशाली चित्रण किया।
मुग़ल समाज की वर्गीय संरचना
16वीं-17वीं शताब्दी में इस देश में मुगलकालीन समाज आमदनी, प्रथाओं और उपयोग की दृष्टि से अनेक वर्गों और स्तरों में विभाजित था। मजूमदार-राय चौधरी दत्त के अनुसार मुगलकालीन समाज सामन्तवादी संस्था के समान दिखता था, जिसकी चोटी पर बादशाह था। बादशाह के नीचे पदाधिकारी सरदार थेl जिन्हें विशेष सम्मान एवं अधिकार थे। सरदार के नीचे ठाटबाट के खर्चों से बचा हआ एक छोटा और मितव्ययी मध्यम वर्ग था। दोनों उच्चतर वर्गों की हालत से तुलना करने पर निचले वर्गों की हालत बुरी थी।
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मुग़ल समाज की वर्गीय संरचना
मुगलकालीन सामाजिक जीवन की एक मुख्य विशेषता हिन्दू एवं मुसलमानों का पूर्व की तुलना में एक दूसरे के अधिक निकट आना था। हिन्दू इस समाज का बहुसंख्यक वर्ग था तथा परम्परागत आधार पर विभिन्न जातियों और उपजातियों में विभाजित था।
ग्रामीण समाज और जाति व्यवस्था

एक वर्गीकरण के अनुसार ग्रामीण समुदाय के तीन घटक थे खेतिहर किसान, पंचायत और गांव का मुखिया (मुकद्दम या मण्डल)। जाति और ग्रामीण माहौल जाति और अन्य जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बंटे थे। हालांकि खेती लायक जमीन की कमी नही थी लेकिन खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी तादाद ऐसे भूमिहीन वर्ग की थी जो नीच (कमीन) समझे जाने वाले कामों में लगे थे या फिर खेतों में मजदूरी करते थे। जनगणना तो इस काल में नही होती थी पर जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनसे पता चलता है कि गावं की आबादी का एक हिस्सा एक ऐसे ही समूह का था, जिनके पास संसाधन सबसे कम थे और जाति व्यवस्था कि पाबंदियों से बंधे थे।
मुस्लिम समाज के आन्तरिक वर्ग
मध्यकालीन मुसलमान भी मुख्यत: दो वर्गो-अप (उच्च वर्ग) एवं अजलाफ (निम्न वर्ग) में विभाजित मुसलमान समुदायों में हलालखोरान जैसे नीच कामों वाले समूह गांव की हदों के बाहर ही रह सकते थे, इसी तरह जिर मल्लाहजादाओं (शाब्दिक अर्थ- नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी। समाज के निचले तबकों में जाति, गरीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था। ऐसा बीच के तबकों में नहीं था।
कृषक जातियों की सामाजिक गतिशीलता
17वीं सदी में मारवाड़ में लिखी गई रचना मारवाड़ परगना ही विगत में राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती हैं। इसके मुताबिक जाट भी किसान थे लेकिन जाति व्यवस्था में उनकी स्थिति राजपूतों के मुकाबले नीची थी। 17वीं सदी में राजपूत होने का दावा वृंदावन (उत्तरप्रदेश) के इलाके में गौरव समुदाय ने भी किया बावजूद इसके कि वे जमीन की जुताई के काम में लगे थे। पशुपालन और बागबानी में बढतें लाभ की वजह से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियां सामाजिक स्तर में ऊपर उठी। पूर्वी भारत में, पशुपालक और मछुआरी जातियां जैसे- सदगोप व कैवर्त भी किसानों की सामाजिक स्थिति पाने लगी।
पंचायत व्यवस्था और सामाजिक नियंत्रण
पंचायतों में छोटे और नीच कार्य करने वाले खेतिहर मजदूरों को कोई स्थान नहीं मिलता था।पंचायत का एक बड़ा काम यह तसल्ली करना था कि गांव में रहने वाले अलग अलग समुदायों के लोग अपनी जाति विवाह मण्डल की मौजूदगी में होते थे। निष्कषतः जाति की अवहेलना रोकने के लिए गांव के मुखिया की जिम्मेदारी में से एक था। पंचायतों को जुर्माना लगाने व जातिगत रिवाज की अवहेलना करने पर समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्यादा गम्भीर दण्ड देने का अधिकार था। ग्राम पंचायत के अतिरिक्त गांव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी। राजस्थान में जाति पंचायत अलग जातियों के लोगों के बीच झगड़ओ का निपटारा करती, राज्य अधिकांश मामलों में इन फैसलों को मानता था।
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किसान प्रतिरोध और सामाजिक संघर्ष
पश्चिमी भारत-विशेषत: राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों के संकलित दस्तावेजों में ऐसी कई अर्जियां हैं जिनमें पंचायत ऊँची जातियों या राज्य के अधिकारियों के खिलाफ जब उगाही या बेगार वसूली की शिकायत की गई है। सामान्यत: ये अर्जियां ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग लगाते थे। अत्यधिक कर की मांगों के मामले में पंचायत अक्सर समझौते कर लेती थी। जहां समझौते नही हो पाते थे वहां किसान विरोध के रास्ते अपनाते थे जैसे कि गांव छोड़कर भाग जाना जो कर को लेकर होने वाली प्रतियोगिता के कारण खेतिहरों के हाथ एक बड़ा प्रभावी हथियार था। ग्रामीण जनसामान्य का जीवन स्तर भारतीय गांव और आर्थिक दृष्टि से नितान्त वर्ग मे विभाजित था। भूमि के वितरण में बहुत असमानता थी, यद्यपि खेती लायक काफी जमीन बंजर पड़ी थी, जिसे पूंजी, श्रम और संगठन से आबाद किया जा सकता था।
विदेशी यात्रियों के विवरणों में जनसाधारण की दशा

16वीं सदी के प्रारम्भ में बारबोसा ने कोरोमण्डल तट के बारे में लिखा है कि यद्यपि यह क्षेत्र सब तरह से साधन सम्पन्न था, फिर भी यदि वर्षा नहीं होती थी तो दुर्भिक्ष से बहुत से लोग मौत के मुंह में चले जाते थे और बच्चे एक-एक रुपये से भी कम कीमत पर बेचे दिए जाते थे। एक पीढी बाद कोरिया ने उस तट की आबादी के अत्यन्त क्षीण हो जाने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के भक्षण का उल्लेख किया है। बदायूंनी ने आगरा और दिल्ली के आसपास ऐसे ही दृश्य का वर्णन किया है। 1560 के दशक में सीजर फ्रेडरिक ने गुजरात में बच्चों की बिक्री का उल्लेख किया है। लिन शाटेन जब गोआ में था तब उसने देखा कि बेचने के लिए बच्चे लाए जा रहे हैं और वयस्क लोग गुलामी की तलाश में घूमते फिर रहे हैं। सामान्य अवस्था से सम्बन्धित साक्ष्यों में निकितन व निकोलो कोंटी के विवरण महत्वपूर्ण है। निकितन ने 15वीं सदी के प्रारम्भ में दक्कन और विजयनगर की यात्रा कि थी, उसके अनुसार देश की आबादी, जरूरत से ज्यादा है, लेकिन जो लोग देहात में रहते हैं. वे बड़ी दयनीय अवस्था में हैं, जबकि दरबारी लोग अत्यन्त समृद्ध हैं और विलासिता में डूबे रहते हैं। मालाबार तट की अत्यन्त गरीबी के बारे में बारबोसा बताता है कि आम लोगों के खाने के लिए जहाजों में जो चावल आता था, वह बहुत घटिया किस्म का था। बारथेमा ने कालीकट तथा अन्य स्थानों के घरों के घटियापन का उल्लेख किया है और उसकी कीमत प्रति घर आधा ड्यूकाट या ज्यादा से ज्यादा एक- दो ड्यूकाट बताई है। आर. सेवेल राजस्व प्रणाली के सम्बन्ध में नुनिज के कथन को उदधत करने के बाद कहता है- यह वक्तव्य एक सर्वर्था बाहरी स्रोत से आता है, इसलिए इससे आम धारणा की प्रबल पुष्टि होती है कि हिन्दू शासन के अधीन सामन्त और सरदार लोग दक्षिण भारत की रैय्यत पर भारी अत्याचार करते थे। लिन शाटेन ने 1580 और 1590 के बीच पश्चिमी तट की अवस्था का वर्णन किया है। उसने गोवा में रहने वाले आम भारतीयों की दरिद्रता की बहुत निश्चित तसलीफें पेश की है और देहाती लोगों के जीवन का जो चित्रण किया है, वह तो और भी दयनीय है। वे लोग बहुत गरीबी में जीते हैं, नंगे रहते हैं और इतने गरीब हैं कि सिर्फ एक पेनी के लिए कोड़ों की मार खाने में भी नहीं हिचकेंगे और ये इतना खाते हैं कि लगता है मानों हवा पीकर जीते हैं हाकिंस, जिसने 1610 के आसपास अपना कुछ समय आगरा में बिताया था, ने साम्राज्य में फैली अराजकता का कारण ग्रामीण लोगों पर किए जाने वाले अत्याचार को बताया है और ये लोग जागीरदारों के हाथों तबाह होते रहते हैं जो अपनी जागीरों के अपने हाथों से निकल जाने के पहले ही अधिक से अधिक पैसा बना लेने के लिए उतावले रहते हैं। सालबैंक बताता है कि मुगल बादशाह की कुछ प्रजा बहुत धनी है, लेकिन साधारण लोग इतने गरीब हैं कि उनमें से अधिकांश नंगे ही रहते हैं। जोर्डाइन, जिसने सूरत से आगरा तक के क्षेत्र का अवलोकन किया था, अपने अनुभव को साझा करता है कि भारत के लोग समुद्र में मछलियों की तरह रहते हैं, बड़ी मछलियां छोटी का भक्षण करती है। टॉमस रो इसी बात को विस्तार से कहता है-“भारत के लोग उसी प्रकार रहते हैं, जैसे समुद्र में मछलियां, बड़ी छोटी को खाती हैं। क्योंकि पहले तो मालिक काश्तकार कृषक मजदूरों को लूटता है। फिर सभ्यजन उन काश्तकारों को लूटते हैं, सभ्यजनों में से भी जो बड़े हैं, वे छोटों को लूटते हैं और राजा सबको लूटता है। पाइराई पश्चिमी तट के आम लोगों के बारे में लिखता है कि वे सभी प्रदेशों में तिरस्कृत, नीच और अधम अवस्था में थे, ठीक गुलामों की तरह। 1624 के आसपास डेलावले ने सूरत की ऐसी ही झांकी पेश की। लगभग हर सम्पन्न आदमी किस प्रकार नौकरों-चाकरों से भरी पूरी विशाल गृहस्थी चलाता था, इसका स्पष्टीकरण देते हुए वह बताता है कि लोगों की संख्या विशाल थी, मजदूरी बहुत कम थी और गुलाम रखने में लगभग कोई खर्च नहीं पड़ता था। डीलायट ने सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य के बारे में अंग्रेज, डच और पुर्तगाली स्रोतों से प्राप्त जानकारी का सार प्रस्तुत किया है- इन क्षेत्रों में आम लोगों की अवस्था अत्यन्त दयनीय है, मजदूरी की दरें बहुत कम है मजदूरों को एक ही वक़्त नियमित रूप से भोजन मिल पाता था, घर बहुत बुरी दशा में होते थे। फर्नीचर तो होते ही नहीं थे लोगो के पास ठंढ के मौसम में शरीर को गर्मी पहुचाने के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं थे इस तरह से इतिहासकारों ने मुग़ल कालीन समाज का चित्रण किया है और बताते है कि उस समय का समाज कितना कठिन हुआ करता था एक वर्ग को छोड़कर बाकी के समाज का जीवन लगभग कठिन ही था ।
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निष्कर्ष
इस प्रकार इतिहासकारों की दृष्टि में मुग़ल कालीन समाज समानता पर आधारित न होकर गहरी असमानताओं से युक्त था। समकालीन इतिहासकारों और विदेशी यात्रियों के विवरण यह स्पष्ट करते हैं कि समाज स्पष्ट रूप से विभिन्न वर्गों में विभाजित था। एक सीमित शासक और अभिजात वर्ग अत्यधिक वैभव, ऐश्वर्य और सुविधाओं का उपभोग कर रहा था, जबकि समाज का विशाल बहुसंख्यक वर्ग—विशेष रूप से किसान, श्रमिक और सामान्य जनता—गरीबी, अभाव और शोषणपूर्ण परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहा था। इस प्रकार मुग़ल कालीन समाज की वास्तविक स्थिति वैभव और दरिद्रता के तीव्र विरोधाभास को उजागर करती है, जिसे इतिहासकारों ने अपने लेखन में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: मुग़ल कालीन समाज की जानकारी के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर: मुग़ल कालीन समाज की जानकारी हमें अनेक ऐतिहासिक स्रोतों से प्राप्त होती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण समकालीन इतिहासकारों द्वारा लिखी गई कृतियाँ हैं, जैसे अबुल फ़ज़ल की आइन-ए-अकबरी और अकबरनामा। इसके अतिरिक्त, 16वीं और 17वीं शताब्दी में भारत आए विदेशी यात्रियों—जैसे फ्रांसिस बर्नियर, टॉमस रो और निकोलाओ मनुची—के यात्रा वृत्तांत भी समाज की वास्तविक स्थिति को समझने में सहायक हैं। साहित्यिक रचनाएँ, दरबारी अभिलेख, फारसी ग्रंथ और प्रशासनिक दस्तावेज भी मुग़ल समाज के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षों पर प्रकाश डालते हैं।
प्रश्न 2: क्या मुग़ल समाज समान था?
उत्तर: नहीं, मुग़ल समाज समान नहीं था, बल्कि यह गहरी असमानताओं से भरा हुआ था। समाज मुख्यतः विभिन्न वर्गों में विभाजित था। शासक वर्ग, जिसमें सम्राट, अमीर, मनसबदार और उच्च अधिकारी शामिल थे, अत्यधिक वैभव और सुख-सुविधाओं का जीवन जीते थे। इसके विपरीत, समाज का अधिकांश हिस्सा—जैसे किसान, मजदूर और कारीगर—अभाव, गरीबी और कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन करता था। इस प्रकार सामाजिक और आर्थिक विषमता मुग़ल समाज की एक प्रमुख विशेषता थी।
प्रश्न 3: मुग़ल काल में किसान वर्ग की स्थिति कैसी थी?
उत्तर: मुग़ल काल में किसान समाज का सबसे बड़ा वर्ग था और संपूर्ण कृषि व्यवस्था उसी पर आधारित थी। इसके बावजूद किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। भूमि का स्वामित्व कुछ ही लोगों के हाथों में केंद्रित था, जबकि अधिकांश किसान भूमिहीन या अल्पभूमि धारक थे। उन्हें भारी करों का बोझ उठाना पड़ता था, जिससे उनकी आय का बड़ा हिस्सा करों में चला जाता था। अकाल, प्राकृतिक आपदाएँ और प्रशासनिक कठोरता के कारण किसान अक्सर कर्ज़, भूख और शोषण का शिकार बनते थे।
प्रश्न 4: मुग़ल काल में जाति व्यवस्था का क्या प्रभाव था?
उत्तर: मुग़ल कालीन समाज में जाति व्यवस्था का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। यद्यपि मुग़ल शासक मुस्लिम थे, फिर भी भारतीय समाज की पारंपरिक जातिगत संरचना बनी रही। जाति के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा, पेशा, रहन-सहन और जीवन स्तर निर्धारित होता था। उच्च जातियों को अधिक सम्मान और अवसर प्राप्त थे, जबकि निम्न जातियों को सामाजिक भेदभाव और सीमित अधिकारों का सामना करना पड़ता था। इस व्यवस्था ने सामाजिक गतिशीलता को काफी हद तक बाधित किया।
प्रश्न 5: विदेशी यात्रियों ने मुग़ल समाज के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर: विदेशी यात्रियों ने मुग़ल समाज का यथार्थ और कभी-कभी अत्यंत कठोर चित्र प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में व्यापक गरीबी, बार-बार पड़ने वाले अकाल, बाल-विक्रय, दास प्रथा और आम जनता की असहाय स्थिति का उल्लेख किया है। यात्रियों के अनुसार, शाही वैभव और जनता की दुर्दशा के बीच भारी अंतर था। उनके विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि मुग़ल काल में सामाजिक असमानता अत्यधिक थी और जनसाधारण का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था।
