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मुगल काल में फ़ारसी साहित्य का विकास भारतीय सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास का एक उज्जवल अध्याय है। यह केवल दरबारी भाषा नहीं थी, बल्कि काव्य, इतिहास, प्रशासन और दर्शन में भी इसका व्यापक उपयोग हुआ। बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब ने फ़ारसी भाषा और साहित्य को संरक्षण दिया और विद्वानों एवं कवियों को प्रोत्साहित किया। अकबर के शासनकाल को फ़ारसी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है, जबकि शाहजहाँ और औरंगजेब ने नए साहित्यिक प्रयोगों को बढ़ावा दिया।

प्रस्तावना
मुगल काल में फ़ारसी साहित्य का विकास भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। फ़ारसी भाषा केवल राजकीय या दरबारी भाषा नहीं रही, बल्कि यह प्रशासन, इतिहास-लेखन, काव्य, दर्शन और अनुवाद साहित्य का प्रमुख माध्यम बनी। भारत की स्थानीय भाषाओं, विशेषकर हिन्दी और प्राकृतों के प्रभाव में आकर फ़ारसी ने यहाँ एक विशिष्ट रूप लिया और समृद्ध साहित्यिक परंपरा का निर्माण किया। इस दौरान फ़ारसी साहित्य ने न केवल भाषा और शैली को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और कला पर भी गहरा प्रभाव डाला।
भारत में फ़ारसी भाषा की प्रारंभिक पृष्ठभूमि
भारत में फ़ारसी भाषा का विकास भारतीय भाषाओं और बोलियों के अंतर्गत हुआ। भारत मे लाहौर फ़ारसी साहित्य के विकास का महत्वपूर्ण केन्द्र था। मसूदशाह के दरबार मे (1030 ई0 -1040 ई0) लाहौर में फ़ारसी के प्रारंभिक कवियों में अब्दुल्ला रुजबेह था। उसके बाद कवि अब्दुल फराज रूमी विख्यात हुआ। अब्दुल गहनी के कथनानुसार फ़ारसी भाषा की उत्पत्ति हमारे देश में हिन्दी और स्थानीय प्राकृत के प्रभाव के अंतर्गत हुई। यह आरम्भ से उच्च वर्ग तक अमीरों की भाषा थी जिनके द्वारा फ़ारसी भाषा को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त था। यह साहित्य- संतों, कवियों, दार्शनिकों आदि द्वारा समृद्धशील हुआ।
दिल्ली सल्तनत काल में फ़ारसी साहित्य
दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद फ़ारसी भाषा को राज भाषा का दर्जा दिया गया। इस प्रकार दिल्ली और उसके आस-पास के स्थानों में फ़ारसी भाषा का प्रचार बढ़ने लगा। दिल्ली के सुल्तानों, अमीरों, मुस्लिम शासकों तथा प्रान्त के उच्च वर्ग के लोगो ने फ़ारसी साहित्य को प्रोत्साहन तथा संरक्षण प्रदान किया। क़ुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर सिकन्दर लोदी तक प्रत्येक सुल्तान के दरबार में फ़ारसी लेखकों, कवियों, दार्शनिकों, शास्त्रज्ञों का जमाव रहता था
भारत में मुगलकाल की स्थापना से फ़ारसी साहित्य की अधिक उन्नति हुई। तैमूर के वंशज सभी शासक विद्वान थे और विद्या का प्रचार करते थे। इस काल ने मुगल युग के लिए एक मजबूत साहित्यिक आधार तैयार किया।
बाबर और मुगल कालीन फ़ारसी साहित्य

मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर तुर्की और फ़ारसी का जन्मजात कवि तथा उच्च कोटि का लेखक था। डॉ0 जफर भी उससे सहमत है कि मुगल वंश का प्रथम शासक स्वयं एक विद्वान तथा विद्या प्रेमी था। बाबर द्वारा रचित तुजुक-ए-बाबरी/ बाबरनामा (मेमॉयर्सऑफ बाबर) मातृभाषा तुर्की में लिखी गई रचना है। यह ग्रंथ अपने आप में पूर्ण नही है बाबर ने 1508-1519 ई0, 1520-1525 ई0 और 1529-1530 ई0 के मध्य की घटनाओं का वर्णन नही किया है परंतु तब भी यह एक अमूल्य ग्रंथ है। मुगल काल मे ही इसका अनुवाद चार बार पर्शियन (फ़ारसी भाषा) में किया गया। हुमायूँ के शासन काल मे जैन खां और पायन्दा हसन ने, अकबर के समय मे अब्दुर्रहीम खान-खाना ने, और शाहजहाँ के समय मे मीर अबू तालिब तुरबती ने इसका अनुवाद किया। विभिन्न यूरोपीय भाषाओं, मुख्यतः फ़्रांसीसी और अंग्रेजी भाषा मे भी इसके विभिन्न अनुवाद हुए है। इनमे श्रेष्ठ अनुवाद श्रीमती बेवरिज का अंग्रेजी में किया गया अनुवाद है, जो मूल तुर्की भाषा से किया गया है। तुजुक-ए-बाबरी से ज्ञात होता है कि बाबर को प्रकृति से अधिक लगाव था, वह प्रकृति प्रेमी भी था। उसने फ़ारसी में एक नई काव्य “शैली मुबायन” का भी विकास किया। बाबर के साथ मध्य एशिया के बहुत कवि और इतिहासकार भी भारत आये थे। कवियों में विशेष उल्लेखनीय नादिर समरकंदी, अब्दुल वाहिद फरीजी, ताहिर ख़्वान्दी थे। इतिहासकारों में मिर्जा हैदर दोगलत तथा जैन उल आब्दीन ख़्वाफी प्रसिद्ध थे। प्रसिद्ध ग्रंथ “तारीख-ए-रशीदी” की रचना मिर्जा हैदर दोगलत ने की। मौलाना अब्दुल रहमान जानी रहस्यवादी श्रेष्ठ कवि तथा फ़ारसी भाषा का महान हास्य कवि भी था। सुलेमान शाह जो बाबर का चचेरा भाई भी था, तुर्की तथा फ़ारसी में अनेक कविताएँ लिखी। सुल्तान इस्माइल आदिलशाह ने भी अनेक कविताएँ लिखी। शेख जैनउद्दीन मुल्ला साहिब, ख्वांदामीर आदि भी उच्च कोटि के कवि थे। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम स्वयं उच्च कोटि की लेखिका थी और उसने “हुमायूँनामा” की रचना की। राजनीतिक घटनाओं के अतिरिक्त इस पुस्तक में सामाजिक रीति रिवाजों का विवरण मिलता है। हुमायूँ के जीवन, उसकी लड़ाइयों, उसके दुःख और संकट आदि का वर्णन बेगम ने विस्तार से किया है।
हुमायूँ और फ़ारसी विद्या
बाबर का पुत्र हुमायूँ भले ही अपनी राजनीतिक योजनाओ में असफल हो गया हो परन्तु वह एक सुसंस्कृत विद्वान था और वह अपने दरबार में कवि, दार्शनिक, संत, महात्मा सभी को समुचित आदर देता था। भूगोल व खगोलशास्त्र में उसको विशेष अभिरुचि थी। वह पुस्तकों का इतना प्रेमी था कि युद्ध यात्रा के समय भी वह अपने साथ एक पुस्तकालय लेकर चलता था। अपने दरबार मे हुमायूँ ने अनेक विद्वानों को शरण दिया। हुमायूँ ने स्वयं मसनवी तथा रुबाइयाँ लिखी और हुमायूँ नाम से उसने एक दीवान की रचना की। हुमायूँ ने ख्वांदामिर (खोंदमीर) को भी प्रश्रय तथा प्रोत्साहन दिया जिसने “कानून-ए-हुमायूँनी” की रचना की। कानून-ए-हुमायूँनी, हुमायूँ के काल का एक समसामायिक ग्रंथ है। इस ग्रंथ में लेखक ने जो घटनाएं बयान की है वे स्वयं उसकी आँखों देखी थी। अतः उसका बयान विश्वसनीय है। इस रचना में हुमायूँ की शासन-व्यवस्था का अदभुत विवरण मिलता है। हुमायूँ के उसूल, उसके शासन संबंधी अनुभव और नई-नई दरबार की रस्में जो लेखक ने खुद देखी थी, विस्तार से बयाँ की है।
शेख अमान उल्ला पानीपती ने कसीदा लिखे और उसकी कविता मधुर तथा सरल थी। शेख अब्दुल वाहिद विलग्रामी दरबारी कवि गदायी की भांति हिन्दी तथा फ़ारसी का कवि था। उसे गजल में भी विशेष रुचि थी। मोहम्मद-इब्न-ए-अशरफल हुसैनी ने 22 अध्यायों में “जवाहिरनामा-ए-हुमायूँनी” की रचना की। मीर अलाउद्दौला कजविंनी ने एक मुख्य ऐतिहासिक ग्रथ “नाफ़यिस-उल-मसिर” की रचना की। जौहर आफतावची ने “ताजकिरातुल वाकयात” की रचना की। जौहर हुमायूँ का पुराना नौकर था और अच्छे और बुरे समय में उसके साथ रहा। बायजीद ब्यात ने अकबर के आग्रह पर “तजकिरा-ए-हुमायूँ” की रचना की। मौलाना जामिन विलग्रामी ने मसनवी तथा कसीदा लिखे। हुमायूँ ने स्वयं कुछ पद्यों की रचना की थी। हुमायूँ को भी तुर्की, फ़ारसी, साहित्य, दर्शन, ज्योतिष, गणित आदि का अच्छा ज्ञान था। मिर्जा हैदर दोगलत, जो बिलग्राम (कन्नौज का युद्ध) के युद्ध में स्वयं उपस्थित था वह हुमायूँ का प्रसंशक भी था, ने “तारीख-ए-रसीदी” की रचना की। अब्बास खां सरवानी ने “तारीख-ए-शेरशाही” की रचना की, जो मूलतः सूर वंश का इतिहास है, किन्तु लोदियों का भी इसमें कुछ वर्णन मिलता है। लेखक अपनी पुस्तक बहलोल लोदी के जिक्र से शुरू करता है। प्रारम्भ का भाग इतना प्रभावशाली नही है जितना कि 1538 के बाद का भाग है। चौसा के युद्ध के मुकाबलों में बिलग्राम की लड़ाई का वर्णन काफी विस्तार से किया गया है। मुगलों के भागने और शेरशाह द्वारा उनका पीछा करने का वर्णन संक्षेप में दिया गया है। अहमद यादगार ने “तारीख-ए-शाही” की रचना की। यह किताब बहलोल लोदी के काल से शुरू होती है और हेमू के कत्ल पर खत्म होती हैं। यह पुस्तक 1614 ई0 के लगभग जहाँगीर के काल मे पूरी हुई। मिसेज वैवरिज ने इस किताब के बारे में कहा है कि “इस किताब के सबसे महत्वपूर्ण भाग में बाबर के आखिर के दो सालो का विवरण है यह हिस्सा बाबरनामा में पाए जाने वाले अंतरालों को पूरा करता है।“
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अकबर के दरबार में फ़ारसी साहित्य का स्वर्ण युग

मध्यकालीन भारत के इतिहास में अकबर का शासन काल सभ्यता एवं संस्कृति के पुनरुथान का काल था। डॉ0 ईश्वरी प्रसाद का मत भी इस सन्दर्भ में समीचीन प्रतीत होता है, वह लिखते हैं “अकबर का शासन काल हिन्दू मुस्लिम कला और साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है। इस काल में हिन्दू और मुसलमानो की विलक्षण प्रतिभा सर्वोच्च शिखर पर पहुँची और साहित्य भंडार को खूब समृद्ध किया, जिस पर किसी भी देश को गर्व हो सकता है।“ हिन्दी तथा फ़ारसी साहित्य को शाही संरक्षण समान रूप से प्राप्त था और बादशाह दोनो का ही समान आदर करता था। बादशाह अकबर धर्म सहिष्णु, उदार तथा विद्या प्रेमी था। फ़ारसी के अनेक विद्वान भारत मे आये जिन्होंने अकबर के दरबार को सुशोभित किया। अकबर के शासन काल मे फ़ारसी साहित्य का अधिक विकास हुआ।
इस युग की यह प्रारम्परा सी हो गयी थी कि लोग अपने पीछे पत्रों का संकलन छोड़ जाते थे, जिनको साहित्य शैली की दृष्टि से आदर्श समझा जाता था। अबुल फजल तथा अन्य लेखकों के पत्रों का संकलन मिला है, जिससे अकबर के शासनकाल में फ़ारसी साहित्य की प्रगति पर प्रकाश पड़ता है। अकबर के दरबार में अनेक कवि, लेखक, विद्वान, कलाकार तथा इतिहासकार थे। इस काल का सबसे प्रसिद्ध लेखक अबुल फजल था, वह कवि, निबंधकार, आलोचक, इतिहासकर तथा साहित्यकार भी था। वह एक दक्ष गद्यकार था जिसके अंदर विभिन्न प्रकार की ज्ञान राशि संचित थी। अबुल फजल जिसने अपनी प्रसिद्ध रचना “आइन-ए-अकबरी” में लिखता है कि दरबार में हजारो कवि मौजूद थे। जिनमें से अनेक ने दीवान पूरा कर लिया था। अथवा मसनवियों की रचना की थी। अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में 59 उच्च कोटि के कवियों का उल्लेख किया है। जिसमे शेख अबुल फैज फैजी अकबर का श्रेष्ठ राज्य कवि था। फैजी, खुशरो के पश्चात भारतमें फ़ारसी का सर्वश्रेष्ठ कवि था। जिसे सम्राट अकबर ने मालिक-उश-शोअरा की उपाधि से सम्मानित किया था।
अकबर के शासन काल में गद्य के क्षेत्र में भी अनेक उच्च कोटि की रचनाएं हुई, जिनमें बहुत से ग्रंथ इतिहास पर भी लिखे गए। मुल्ला दाऊद ने “तारीख-ए-अल्फ़ी “की रचना की। अबुल फजल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “अकबरनामा” तथा “आइन-ए-अकबरी” की रचना की। ब्लाकमैन के अनुसार अबुल फजल अपने युग का सर्वश्रेष्ठ विद्वान था। निजामुद्दीन अहमद की “तबकात-ए-अकबरी,” जौहर द्वारा रचित “तजकिरात-उल-वाकयात” महत्वपूर्ण ग्रंथ है। प्रसिद्ध विद्वान अब्दुल कादिर बदांयूनी ने “मुन्तख़ब-उल-तवारीख” की रचना की जी जहाँगीर के काल में प्रकाशित हुआ। अहमद यादगार ने “तारीख-ए-सलातीन-ए-अफगाना”, मुहम्मद कासिम हिन्दूशाह ने “तारीख-ए-फरिश्ता”, नूरुलहक ने “जबदत-उत,-तवारीख”, आसदवेग ने “वाकयात” आदि रचनाएँ की। शेख अब्दुल हक ने “तारीख-ए-हकीकी” की रचना की जो मुस्लिम दास वंश के सुल्तानों से लेकर अकबर के समय तक का इतिहास है। मुहम्मद अब्दुल वकी की रचना “मासीर-ए-रहीमी” सम्राट के शासनकाल की महत्वपूर्ण घटनाओं का विस्तृत इतिहास है।
जहाँगीर और आत्मकथात्मक फ़ारसी साहित्य
अकबर के उत्तराधिकारियों के शासनकाल में फ़ारसी साहित्य का विकास होता रहा। जहाँगीर के समय में भी फ़ारसी साहित्य की अधिक उन्नति हुई। जहाँगीर स्वयं एक विद्वान और आलोचक था। उसने स्वयं अपनी आत्मकथा लिखी और उसका नाम “तुजुक-ए-जहाँगीरी” रखा। इस आत्मकथा में उसके शासनकाल की 17 वर्ष की घटनाओं का उल्लेख है। जहाँगीर के आदेशानुसार कालान्तर में मोतमिद खां इसको लिखता रहा और यह आत्मकथा जहाँगीर के दैनिक जीवन का वास्तविक चित्रण करती है। डॉ0 बेनी प्रसाद के अनुसार मोतमिद खां ने जहाँगीर के शासन काल 17 वे वर्ष से लेकर 19 वे वर्ष तक का इतिहास लिखा। इसमें कुछ घटनाओं के विवरण का वास्तविक उल्लेख नही किया गया है जैसे उसके पिता के प्रति विद्रोह, शेर अफगान का वध, नूरजहाँ से जहाँगीर का विवाह, खुशरो की मृत्यु आदि।
जहाँगीर बुद्धि तथा चरित्र में अपने महान पिता के समकक्ष न था। किन्तु वह साहित्यिक रुचि रहित भी न था। उसकी शिक्षा मौलाना मीरकलां मुहद्दिस तथा मिर्जा अब्दुर्रहीम जैसे सुयोग्य विद्वानों के अधीन हुई थी। उसे फ़ारसी का अच्छा ज्ञान था, वह तुर्की से भी भली भांति परिचित था। वह एक उच्च कोटि का साहित्यिक प्रेमी था और उसने अपने दरबार में साहित्य की प्रगति को प्रोत्साहन दिया। इलियट तथा डाउसन ने लिखा है कि जहाँगीर की तुजुक-ए-जहाँगीरी अत्यधिक महत्वपूर्ण तथा आनन्दप्रद कृति है। जिसकी रचना के लिए जहाँगीर पूर्णतः उत्तरदायी है। उसकी आत्मकथा स्पष्टवादिता,सरसता, और शैली की सजीवता की दृष्टि से बाबरनामा के बाद स्थान पाति है। इस काल में मोतमिद खां के द्वारा सुप्रसिद्ध ग्रंथ “इकबलनामा-ए-जहाँगीरी” की रचना हुई जो कि जहाँगीर के शासनकाल के इतिहास का प्राथमिक स्रोत है। जहाँगीर के शासन काल में कुरान पर भाष्य लिखे गये तथा कविता की भी अधिक उन्नति हुई। जहाँगीर के दरबार मे कवि रत्नों में मिर्जा गियास वेग, मोतमिद खां, नियामत उल्ला खां, नजीरी, नकीब खां, अब्दुल हक देहलवी अधिक प्रसिद्ध थे, जो उच्च कोटि के विद्वान थे।
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शाहजहाँ और दरबारी फ़ारसी काव्य
शाहजहाँ ने भी विद्वानों को संरक्षण तथा प्रोत्साहन देने की नीति अपनाई। डॉ0 बनारसी प्रसाद सक्सेना ने भी इसकी पुष्टि की है। वह लिखते है कि शाहजहाँ ने भी अपने शासनकाल में अनेक विद्वानों, लेखकों एवं कवियों को संरक्षण दिया था। इस परंपरा में उसने अपने पूर्वजों का अनुकरण किया। शाहजहाँ के दरबार में कलीम को राजकवि नियुक्त किया गया। चन्द्रभान ब्राह्मण, हाजी मोहम्मद जान, अबू तालिब कलीम आदि सुप्रसिद्ध कवियों में थे। अबू तालीब कलीम जो दरबार का उच्च कोटि का कवि था, सकिनामा तथा मसनवियों और कसीदों की रचनाएं की थी। शाहजहाँ के काल में कसीदा लिखने का अधिक विकास हुआ। इस काल में सदाई गीलानी फ़ारसी का कवि था। अमीन कजनिवी ने “बदशाहनामा” की रचना की जो सरल और सुंदर ढंग से लिखी हुई रचना है। दरबारी कवि अब्दुल हमीद लाहौरी ने भी “बादशाहनामा” की रचना की जो दो भागों में मिलाता है। जलालउद्दीन तवतवी(तुरबती) ने दूसरा “बादशाहनामा” लिखा जो अधिक महत्वपूर्ण नही है। इनायत खां ने “शाहजहाँनामा” और मोहम्मद साहेल खम्बू ने “अमल-ए साहेल” की रचना की।
शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह भी उच्च कोटि का साहित्य-प्रेमी तथा विद्वान था। उसे फ़ारसी, अरबी तथा संस्कृत का अच्छा ज्ञान था। उसने सूफी दर्शन पर कई ग्रंथो की रचना की तथा मुस्लिम संतो की जीवनियां लिखी। “मज्म-उल-बैहरीन”,“सफीनत-उल-औलिया”,“सकीनत-अल-औलिया”आदि की रचना दाराशिकोह ने की। दाराशिकोह ने भगवतगीता, उपनिषद, योगवाशिष्ठ आदि का फ़ारसी में अनुवाद किया। शाहजहाँ के शासनकाल में बहुत से कवि फारस से आये। दाराशिकोह के निरीक्षण में अनेक संस्कृत ग्रंथो का भी फ़ारसी में अनुवाद किया गया।
औरंगज़ेब और फ़ारसी साहित्य
औरंगजेब के शासन काल में फ़ारसी साहित्य की अत्यधिक उन्नति हुई। औरंगजेब न्यायशास्त्र और धर्मशास्त्र का अच्छा विद्वान था। डॉ0 ईश्वरी प्रसाद ने इसका समर्थन करते हुए लिखा है कि औरंगजेब धर्मान्ध सुन्नी होते हुए भी उच्च कोटि का विद्वान और धर्मशास्त्र तथा इस्लामी न्यायशास्त्र में सुविज्ञ था। औरंगजेब की विशेष रुचि कविता में न थी परन्तु उसने स्वयं फ़ारसी में कविताये लिखी औरंगजेब के शासनकाल में लगभग 45 कवियों को संरक्षण प्राप्त था। औरंगजेब की पुत्री जैबुन्निसा स्वयं एक कवियत्री थी और उसने भी लेखकों को संरक्षण तथा प्रोत्साहन दिया था। उसकी “दीवान-ए-मरूफी” स्वयं उसकी काव्यगत विशेषताओं का संकेत करती हैं। औरंगजेब की काव्य में रुचि न थी अतः वह अपने युग का इतिहास लिखे जाने के विरुद्ध था। परन्तु उसके द्वारा प्रोत्साहन तथा संरक्षण न मिलने के कारण भी उसके युग मे कई महत्वपूर्ण ग्रंथो की रचना हुई। खाफी खां ने “मंतख़ब-उल-लुबाव’” की रचना की, मिर्जा मोहम्मद काजिम ने “आलमगीरनामा” लिखा, साकी मुस्ताद खां ने “मासिर-ए-आलमगीरी”, ईश्वरदास नागर ने “फतुहात-ए-आलमगीरी” तथा भीमसेन कायस्थ ने “नुस्ख-ए-दिलकुशा”, सुजनराय भंडारी ने “खुलासत-उत-तवारीख” की रचना की। औरंगजेब के शासन काल में मुस्लिम विधि का एक वृहत ग्रंथ “फतबा-ए-आलमगीरी” की रचना हुई। यह कानून की उच्च कोटि की पुस्तक थी जिसें मुस्लिम उलेमाओं की एक मंडली ने अथक परिश्रम से पूर्ण किया था। आकिल खां राजी तथा खाफी खां की काव्यगत विशेषताओं के फलस्वरूप उन्हें दरबार में अधिक सम्मान प्राप्त हुआ।
फ़ारसी में महत्वपूर्ण ग्रंथों के अनुवाद
मुगल सम्राट अकबर ने अनुवाद विभाग की स्थापना की। इस विभाग में संस्कृत, अरबी, तुर्की, एवं ग्रीक भाषाओं की अनेक कृतियों का अनुवाद फ़ारसी भाषा में किया गया। फ़ारसी मुगलों की राजकीय भाषा थी।
मुगल काल में अनुवादित प्रमुख ग्रंथ
| ग्रंथ / पुस्तक का नाम | फ़ारसी में अनुवादित नाम | अनुवादक का नाम |
| महाभारत | राज्मनामा | अब्दुल कादिर बदांयूनी एवं नकीब खां |
| रामायण | (मूल नाम से ही) | अब्दुल कादिर बदांयूनी एवं नकीब खां |
| ज्योतिष ग्रंथ (तजक व तुजुक) | जहान-ए-जफर | मुहम्मद खां गुजराती |
| पंचतंत्र | अनवर-ए-सुहैल / यार-दानिश | अबुल फजल तथा मौलाना हुसैन फैज |
| अथर्ववेद | (मूल नाम से ही) | हाजी इब्राहिम सरहिन्दी |
| कालिया दमन | अयगर दानिश | अबुल फजल |
| राजतरंगिणी | (मूल नाम से ही) | मौलाना शेरा |
| लीलावती (गणित) | (मूल नाम से ही) | फैजी |
| भागवत पुराण | (मूल नाम से ही) | राजा टोडरमल |
| नलदमयंती | (मूल नाम से ही) | फैजी |
| सिंहासन बत्तीसी | (मूल नाम से ही) | अब्दुल कादिर बदांयूनी |
| मुजाम-उल-बुलदान (भूगोल) | (मूल नाम से ही) | मुल्ला अहमद टटवी, कासिम वेग एवं शेख मुनव्वर |
| अल्लोपनिषद | (मूल नाम से ही) | फैजी (अकबर के निर्देश पर) |
मुगल महिलाओं का फ़ारसी साहित्य में योगदान

मुगल शहजादियों के साहित्यिक कार्यों में दिए गए योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता है। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम सुसंस्कृत महिला थीं। जिसने हुमायूँनामा की रचना की सुल्ताना सलीमा जो हुमायूँ की बहन गुलरुख की बेटी थी, माहम अनगा, नूरजहाँ, मुमताजमहल, और जहाँआरा बेगम भी सुसंस्कृत महिलाएँ थी, और साहित्य तथा कला में विशेष अभिरुचि रखती थीं। औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा एक प्रतिभाशाली कवयित्री थी। जो अरबी तथा फ़ारसी में असाधारण दक्षता रखती थीं। इसने “दिवान-ए-मरूफी” की रचना की जिससे उनकी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय मिलता है।
मुगल उत्तरकाल और फ़ारसी साहित्य
औरंगजेब के उत्तराधिकारी भी फ़ारसी साहित्य को संरक्षण एवं प्रोत्साहन देते रहे। मुहम्मद शाह रंगीला (713-1748 ई0) तक के शासन काल में फ़ारसी भाषा को राज्याश्रय मिलता रहा। परन्तु मोहम्मद शाह के बाद जो शासक हुए वे फ़ारसी बोलने व समंझने में स्वयं कुशल न थे और वे फ़ारसी के स्थान पर उर्दू में अभिरुचि लेने लगे और फ़ारसी का स्थान उर्दू को सहज प्राप्त हो गया। परन्तु 18 वी शताब्दी में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ने फ़ारसी में अधिक पुस्तकें लिखी जिनमे कुछ पुस्तकें सूफी सम्प्रदाय पर तथा कुछ इतिहास पर थी, किन्तु उनका साहित्यिक महत्व अधिक नही था। फ़ारसी में भी ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी जाती रही। सर्वप्रथम तो इन्हें स्थानीय राजवंशो से संरक्षण तथा सहायता मिलती रही और कालान्तर में ईस्ट इण्डिया कंपनी के अधिकारियों और गवर्नरों ने भी सहायता दी। इस युग मे प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथो में मोहम्मद अली अंसारी द्वारा रचित “तवारीख-ए-मुजफ्फरी”, हरिचरनदास कृत “तवारीख-ए-चहार गुलजारे शुजाई”, गुलाम हुसैन द्वारा रचित “सियरुल मुताखरीन”, गुलाम अली नकवी द्वारा रचित “इमादुस-सआदत”, सुल्तान अली सफ़वी कृत “मदन-उस-सआदत”, खैरुद्दीन रचित “इबरतनामा” और मुर्तजा हुसैन विलग्रामी द्वारा रचित “हदिकुल अकालीम” आदि उल्लेखनीय है।
निष्कर्ष
मुगल काल में फ़ारसी साहित्य ने भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य को गहन रूप से प्रभावित किया। यह केवल राजदरबार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय और ईरानी सांस्कृतिक संवाद की एक स्थायी और समृद्ध विरासत के रूप में उभरा। फ़ारसी साहित्य ने भाषा, काव्यशैली, इतिहास-लेखन और अनुवाद में नए आयाम स्थापित किए और भारतीय साहित्यिक परंपरा को एक वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान किया। इसने मुगल समाज की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध किया और साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत छोड़ी।
FAQs (Frequently Asked Questions)
1: मुगल काल में फ़ारसी भाषा का क्या महत्व था?
मुगल काल में फ़ारसी भाषा का अत्यधिक महत्व था। यह केवल राजकीय भाषा या दरबारी माध्यम नहीं थी, बल्कि प्रशासन, न्याय, इतिहास-लेखन, काव्य और अनुवाद साहित्य का मुख्य आधार बनी। फ़ारसी के माध्यम से न केवल शासन व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित हुई, बल्कि भारतीय समाज में साहित्य और कला के विकास को भी दिशा मिली। दरबार में विद्वानों, कवियों और इतिहासकारों ने फ़ारसी में महत्वपूर्ण रचनाएँ कीं, जिससे यह भाषा सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गई।
2: बाबर ने फ़ारसी साहित्य में क्या योगदान दिया?
बाबर ने फ़ारसी साहित्य में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने अपनी आत्मकथा “तुजुक-ए-बाबरी” (बाबरनामा) लिखी, जिसे बाद में कई बार फ़ारसी में अनूदित किया गया। इसके माध्यम से न केवल उनके जीवन और सैन्य अभियानों का लेखन हुआ, बल्कि उन्होंने फ़ारसी में नई काव्य शैली “शैली मुबायन” का विकास भी किया। बाबर की यह रचना मुगल इतिहास और साहित्य के लिए एक स्थायी धरोहर बनी।
3: अकबर के शासनकाल में फ़ारसी साहित्य क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: अकबर के समय को फ़ारसी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। उन्होंने विद्वानों और कवियों को संरक्षण प्रदान किया और संस्कृत, अरबी तथा तुर्की ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद कराया। इसने भारतीय साहित्य में बहुभाषी संवाद को प्रोत्साहित किया और नई रचनात्मक शैली एवं साहित्यिक प्रयोगों को जन्म दिया। अकबर के दरबार में फ़ारसी साहित्य केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था।
4: मुगलकालीन महिलाओं का फ़ारसी साहित्य में योगदान क्या था?
मुगलकालीन महिलाओं ने भी फ़ारसी साहित्य में अपनी छाप छोड़ी। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने “हुमायूँनामा” लिखकर इतिहास-लेखन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वहीं औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा ने अपनी रचनाओं “दीवान-ए-मरूफी” के माध्यम से फ़ारसी काव्य में अपनी प्रतिष्ठा बनाई। इन महिलाओं की रचनाओं ने फ़ारसी साहित्य की विविधता और समृद्धि को और बढ़ाया।
5: फ़ारसी साहित्य का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव कैसे रहा?
फ़ारसी साहित्य केवल मुगल दरबार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारतीय समाज और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। हिंदी, संस्कृत और स्थानीय भाषाओं के साथ इसके संपर्क ने सांस्कृतिक और साहित्यिक संवाद को समृद्ध किया। फ़ारसी के माध्यम से नए विचार, काव्य शैली और इतिहास-लेखन की विधाएँ भारतीय साहित्य में प्रवेश कर गईं, जिससे समग्र सांस्कृतिक परिदृश्य और भी अधिक विविध और समृद्ध हुआ।
Suggested Reading / References:
- Abul Fazl. The Ain-i-Akbari. Translated by H. Blochmann and H. S. Jarrett. Calcutta: Asiatic Society of Bengal, 1873–1894.
- Chandra, Satish. Medieval India: From Sultanat to the Mughals, Part II: Mughal Empire (1526–1748). New Delhi: Har-Anand Publications, 1999.
- Habib, Irfan. The Agrarian System of Mughal India, 1556–1707. New Delhi: Oxford University Press, 1999.
- Srivastava, A. L. Akbar the Great, Vol. II: Administration and Government. Agra: Shiva Lal Agarwala & Company, 1962.

Dr. Om Prakash Singh
Assistant Professor & Head, Department of History
Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)
