बंगाल विभाजन 1905: कारण, ऐतिहासिक घटनाक्रम और परिणाम

1905 में बंगाल का विभाजन भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। उस समय के वाइसराय का निर्णय भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई दिशा में ले गया। हालाँकि बंगाल का विभाजन ब्रिटिश सरकार ने प्रशासनिक सुधार के रूप में पेश किया था लेकिन वास्तव में इसके पीछे के सभी कारण राजनीतिक थे। इस लेख में हम बंगाल के विभाजन के सभी कारणों और परिणामों पर चर्चा करेंगे इस ब्रिटिश कदम का जो समुदायों को बांटने का था परिणाम ठीक इसके विपरीत रहा और इसने स्वदेशी आंदोलन जैसे आंदोलनों को जन्म दिया।

1. बंगाल विभाजन के मुख्य कारण और प्रशासनिक तर्क

बीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल ब्रिटिश भारत का सबसे बड़ा और समृद्ध प्रांत था, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1,89,000 वर्ग मील तथा कुल जनसंख्या लगभग 7 करोड़ 85 लाख थी। इस समय बंगाल में पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार, ओडिशा (उस समय बांग्लादेश को ‘पूर्वी बंगाल’ कहा जाता था और बिहार-ओडिशा बंगाल प्रेसीडेंसी के ही भाग थे) शामिल थे। 1874 में असम बंगाल से अलग हो गया था (असम को 1874 में एक पृथक मुख्य आयुक्त (Chief Commissioner) के अधीन किया गया था)। लॉर्ड कर्जन के अनुसार, बंगाल प्रेसिडेंसी का क्षेत्रफल और जनसंख्या इतनी अधिक थी कि अकेले एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के लिए उस पर कुशल प्रशासन चला पाना असंभव था, इसलिए प्रशासनिक असुविधा का तर्क देकर विभाजन का प्रस्ताव रखा गया। यद्यपि तत्कालीन गवर्नर जनरल/वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल के विभाजन का प्रमुख कारण “प्रशासनिक असुविधा” बताया; परन्तु वास्तविक कारण प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक था।

परंतु प्रशासनिक असुविधा का तर्क केवल एक मुखौटा था। इसके पीछे के वास्तविक उद्देश्य पूरी तरह से राजनीतिक थे:

  • राष्ट्रीय चेतना का दमन: बंगाल उस समय भारतीय राष्ट्रीय चेतना का केन्द्र बिन्दु था तथा बंगालियों में प्रबल राजनीतिक जागृति थी जिसे दबाने के लिए कर्ज़न इस राजनीतिक एकजुटता को समाप्त करना चाहता था।
  • फूट डालो और राज करो की नीति: इस विभाजन का मुख्य उद्देश्य हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच धार्मिक आधार पर खाई पैदा करना था, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना कमजोर हो सके। पश्चिमी बंगाल प्रांत में बिहार और ओडिशा को शामिल करके बंगाली भाषियों को हिंदी और उड़िया भाषियों की तुलना में अल्पसंख्यक बना देना भी अंग्रेजों की एक सोची-समझी रणनीति थी। इस प्रकार बंगाल विभाजन के पीछे प्रशासनिक सुविधा के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना को कमजोर करने और राजनीतिक एकता में बाधा डालने के उद्देश्य भी थे।

2. महत्वपूर्ण तिथियाँ और ऐतिहासिक घटनाक्रम

दिसम्बर 1903 में बंगाल विभाजन के प्रस्ताव की खबर फैलने पर चारों ओर व्यापक विरोध शुरू हो गया। भारी जन-विरोध के बावजूद लॉर्ड कर्ज़न ने 20 जुलाई 1905 को बंगाल विभाजन की आधिकारिक घोषणा कर दी। इसके विरोध में 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में आयोजित ऐतिहासिक बैठक में स्वदेशी आंदोलन की घोषणा की गई। इसी बैठक में ऐतिहासिक ‘बहिष्कार प्रस्ताव‘ (Boycott Resolution) पारित किया गया।

बंगाल विभाजन 16 अक्टूबर 1905 को प्रभावी (लागू) हुआ। इस दिन को पूरे बंगाल में ‘शोक दिवस‘ के रूप में मनाया गया। रवींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर सम्पूर्ण बंगाल में इस दिन को ‘राखी दिवस‘ (जिसे ‘मैत्री दिवस’ भी कहा गया) के रूप में मनाया गया। लोगों ने उपवास रखा, नंगे पाँव जुलूस निकाला, गंगा स्नान किया, जुलूस के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाए गए और आपसी सौहार्द व एकता के प्रतीक के रूप में एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधी।

इस प्रकार 20 जुलाई 1905 को विभाजन की घोषणा, 7 अगस्त 1905 को बहिष्कार प्रस्ताव और 16 अक्टूबर 1905 को विभाजन लागू होना इस घटनाक्रम की प्रमुख तिथियाँ थीं।

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3. संयुक्त बंगाल के विभाजन से संबंधित रुझान और आँकड़े

विभाजन के बाद, संयुक्त बंगाल को पूर्वी बंगाल एवं असम तथा पश्चिमी बंगाल दो प्रांतों में विभाजित किया गया:

 (क) पूर्वी बंगाल और असम (Eastern Bengal and Assam)

  • शामिल क्षेत्र: इसमें असम, पूर्वी बंगाल के प्रमुख प्रभाग जैसे राजशाही, ढाका, चटगांव तथा त्रिपुरा की पहाड़ी रियासत को शामिल किया गया।
  • मुख्यालय (राजधानी): इस प्रांत का मुख्यालय (राजधानी) ढाका था और इसके प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर सर बेमफिल्ड फुलर थे।
  • जनसंख्या एवं क्षेत्रफल: पूर्वी बंगाल और असम की कुल जनसंख्या 3 करोड़ 10 लाख थी, जबकि क्षेत्रफल 1,06,540 वर्ग मील था।
  • धार्मिक आँकड़े: इसमें 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान तथा 1 करोड़ 20 लाख हिंदू थे (इसे मुस्लिम बहुल प्रांत के रूप में स्थापित किया गया था)।

 (ख) पश्चिमी बंगाल (Western Bengal)

  • शामिल क्षेत्र: इसमें पश्चिमी बंगाल का हिस्सा, बिहार और उड़ीसा (ओडिशा) शामिल थे।
  • मुख्यालय (राजधानी): इस प्रांत का मुख्यालय कलकत्ता (कोलकाता) था तथा इसके प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंड्रयू फ्रेजर थे।
  • कुल जनसंख्या एवं क्षेत्रफल: इस प्रांत की जनसंख्या 5 करोड़ 40 लाख थी और कुल क्षेत्रफल 1,41,580 वर्ग मील था।
  • धार्मिक आँकड़े: इसमें 4 करोड़ 20 लाख से 4 करोड़ 50 लाख के बीच एवं 90 लाख मुसलमान थे (यह हिंदू बहुल क्षेत्र था)।

इस विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल तथा असम की राजधानी ढाका बनी। पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की संख्या अधिक थी, जबकि पश्चिमी हिस्से में हिंदू बहुसंख्यक थे। इस क्षेत्रीय पुनर्गठन ने बंगाल विभाजन के राजनीतिक और सामुदायिक प्रभावों को और स्पष्ट कर दिया।

4. स्वदेशी आंदोलन का प्रसार और इसके दूरगामी परिणाम

बंगाल विभाजन के विरोध में पूरा देश एकजुट हो गया और इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक जन-आंदोलन में बदल दिया।

 (क) आंदोलन का देशव्यापी नेतृत्व

  • महाराष्ट्र: बाल गंगाधर तिलक व उनकी पुत्री केतकर ने महाराष्ट्र में इसका प्रचार किया।
  • पंजाब व उत्तर प्रदेश: अजीत सिंह, लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, जयपाल और गंगाराम ने इन क्षेत्रों में आंदोलन को पहुँचाया।
  • दिल्ली: सैयद हैदर रज़ा ने दिल्ली में इस आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • मद्रास प्रेसिडेंसी: चिदंबरम पिल्लै, सुब्रह्मण्यम अय्यर, आनंद चारलू और टी.एम. नायर जैसे नेताओं ने मद्रास प्रेसिडेंसी में इसका नेतृत्व किया।
  • अन्य क्षेत्र: उत्तर भारत में रावलपिंडी, कांगड़ा, मुल्तान और हरिद्वार में स्वदेशी आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा।

 (ख) बहिष्कार, स्वदेशी संस्थाएँ और संगठन

बंग-भंग आन्दोलन को सबसे अधिक सफलता विदेशी माल के बहिष्कार आन्दोलन से मिली। विदेशी वस्त्रों और वस्तुओं की होली जलाई गई तथा भारतीय उद्योगों, राष्ट्रीय शिक्षा परिषदों और स्वदेशी बैंकों की स्थापना को बढ़ावा दिया गया।

इस आन्दोलन ने जनजागरण के लिए स्वयंसेवी संगठनों की सहायता ली। इसमें सबसे महत्वपूर्ण संगठन था “स्वदेश बांधव समिति”। इस समिति का नेतृत्व बरीसाल / वारिसाल के एक शिक्षक अश्विनी कुमार दत्त ने किया, जिसकी 159 शाखाएँ फैली हुई थीं। इस आंदोलन की एक बड़ी विशेषता यह थी कि इसने ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘आत्मशक्ति’ (Self-Reliance) का नारा दिया।

 (ग) राष्ट्रीय शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

स्वदेशी आन्दोलन के समय बंगाल में राष्ट्रीय शिक्षा को फैलाने में सबसे बड़ा योगदान “डॉन सोसाइटी” (Dawn Society) ने किया। यह विद्यार्थियों का संगठन था, जिसके सचिव मुकेश चन्द्र मुखर्जी / सतीश चंद्र मुखर्जी थे।

  • राष्ट्रीय शिक्षा का विकास: राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में सबसे पहले 8 नवम्बर 1905 को रंगपुर नेशनल स्कूल की स्थापना की गई। रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन की तर्ज पर 14 अगस्त 1906 को बंगाल नेशनल कॉलेज और स्कूल खोले गए। नेशनल कॉलेज के प्रथम प्रिंसिपल अरविन्द घोष बने। 15 अगस्त 1906 को सर गुरुदास बनर्जी की अध्यक्षता में “राष्ट्रीय शिक्षा परिषद” (National Council of Education) की स्थापना की गई।
  • सांस्कृतिक प्रभाव: स्वदेशी आन्दोलन का सबसे अधिक प्रभाव सांस्कृतिक क्षेत्र पर पड़ा। रवींद्रनाथ टैगोर, द्विजेंद्रलाल राय, मुकुंद दास, सैयद अबू मोहम्मद के लिखे गीत आन्दोलनकारियों के लिये प्रेरणा स्रोत बन गए। रवींद्रनाथ टैगोर ने आन्दोलन को गति देने के लिए ‘आमार सोनार बांग्ला‘ गीत की रचना की, जो 1971 ई. में बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना; जबकि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का ‘वंदे मातरम्‘ इस आंदोलन का मुख्य मंत्र बन गया।
  • कला एवं विज्ञान: कला के क्षेत्र में अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय कला को अजंता की चित्रकला से प्रेरणा लेकर पुनर्जीवित किया और उन्होंने प्रसिद्ध ‘भारत माता‘ का चित्र बनाया। विज्ञान के क्षेत्र में जगदीश चंद्र बोस, प्रफुल्ल चंद्र राय आदि की सफलताओं ने आन्दोलन को और अधिक गौरवान्वित किया।

इस महान आंदोलन का नेतृत्व सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष (लाल-बाल-पाल और अरविंद) जैसे नेताओं ने किया। स्वदेशी आंदोलन का उद्देश्य केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना नहीं था, बल्कि भारतीय उद्योगों, स्वदेशी उत्पादन और राष्ट्रीय शिक्षा को प्रोत्साहित करना भी था।

5. बंगाल विभाजन का रद्द होना (1911) (Annulment of Partition of Bengal)

बंगाल विभाजन के विरोध में फैले जन-आक्रोश और राष्ट्रीय आंदोलन के दबाव में आकर अंततः ब्रिटिश सरकार को बंगाल विभाजन रद्द करने का निर्णय लेना पड़ा।

दिसम्बर 1911 ई. में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी का भारत आगमन हुआ। 12 दिसम्बर 1911 को आयोजित भव्य ‘दिल्ली दरबार’ में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय ने सम्राट की ओर से बंगाल विभाजन को रद्द करने की ऐतिहासिक घोषणा की।

इसी अवसर पर निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए:

  1. राजधानी का स्थानांतरण: भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया, जो 1912 में प्रभावी हुआ।
  2. प्रशासकीय पुनर्गठन: प्रशासनिक पुनर्गठन: अन्य प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत, बिहार और उड़ीसा (ओडिशा) दोनों को बंगाल से अलग करके एक नया प्रांत बनाया गया और असम को एक अलग मुख्य आयुक्त प्रांत के रूप में पुनर्गठित किया गया।

बंगाल के विभाजन को रद्द किए जाने के बावजूद, प्रशासन में सुधार जारी थे। वर्ष 1912 में, बिहार और उड़ीसा को दो अलग-अलग प्रांत घोषित किया गया और उसी वर्ष राजधानी को बंगाल से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय प्रभावी हुआ। विभाजन को रद्द करने के अलावा, ब्रिटिश सरकार ने बंगाल और उसके आसपास के क्षेत्रों की प्रशासनिक सीमा में स्थायी परिवर्तन किए थे।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

लॉर्ड कर्ज़न द्वारा तैयार की गई विभाजन नीति के बाद, बंगाल को दो प्रांतों में विभाजित किया गया, लेकिन अंततः इससे ब्रिटिश सरकार द्वारा अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए। बंगाल विभाजन से उपजे आक्रोश ने स्वदेशी आंदोलन को एक ऐसी रफ्तार दी, जिसने आम भारतीय को सीधे आजादी की लड़ाई से जोड़ दिया। जनता के इसी विरोध का असर था कि 1911 में ब्रिटिश सरकार को विभाजन का फैसला वापस लेना पड़ा। इस घटना ने साफ कर दिया कि संगठित जन-विरोध औपनिवेशिक सत्ता के बड़े से बड़े निर्णयों को बदलने की क्षमता रखता है। वास्तव में, इस दौर ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा, व्यापक जन-आधार और आत्मनिर्भरता का मजबूत संदेश दिया।


1. बंगाल विभाजन की घोषणा कब हुई और यह कब से लागू हुआ?

उत्तर: बंगाल के विभाजन की आधिकारिक घोषणा उस समय के वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न ने 20 जुलाई 1905 को की थी। उसके बाद 16 अक्टूबर 1905 को पूरे बंगाल में विभाजन लागू हुआ।

2. बंगाल विभाजन का मुख्य और वास्तविक कारण क्या था?

उत्तर: “प्रशासनिक असुविधा” ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल के विभाजन के लिए आधिकारिक तौर पर दी गई व्याख्या थी। लेकिन असली मकसद बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को कमज़ोर करना,स्वतंत्रता आंदोलन का गढ़ तोड़ना और हिंदू और मुस्लिमों के बीच ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति लागू करना था।

3. 16 अक्टूबर 1905 को पूरे बंगाल में किस रूप में मनाया गया था?

उत्तर: लोगों ने उस दिन (16 अक्टूबर 1905 जब विभाजन लागू हुआ) को बंगाल में ‘शोक दिवस’ के रूप में मनाया। रविन्द्रनाथ टैगोर के सुझाव के अनुसार लोगों ने इस दिन को ‘राखी दिवस’ (दोस्ती दिवस) के रूप में मनाते हुए एक दूसरे को राखी भेंट करके साथ और एकता का प्रतीक बनाया।

4. बंगाल विभाजन के विरोध में कौन-सा प्रमुख आंदोलन शुरू हुआ था?

उत्तर: बंगाल के विभाजन के विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन’ या ‘बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन’ की शुरुआत हुई। इस आंदोलन की घोषणा 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल में हुई बैठक में सार्वजनिक की गई और प्रतिभागियों ने अन्य देशों में निर्मित सभी वस्तुओं का बहिष्कार करने और भारत में निर्मित उत्पादों का समर्थन करने का संकल्प लिया।

5. बंगाल विभाजन को कब और किसके द्वारा रद्द किया गया?

उत्तर: बंगाल के विभाजन के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों और सक्रिय आंदोलनों के जवाब में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को विभाजित करने का अपना निर्णय बदल दिया। यह बदलाव 12 दिसंबर, 1911 को हुआ। उसी दिन दिल्ली में राष्ट्रीय दरबार आयोजित हुआ, जिसमें राजा जॉर्ज पंचम भी उपस्थित थे। सरकार ने घोषणा की कि भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किया जाएगा।

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  5. सुमित सरकार (1973), द स्वदेशी मूवमेंट इन बंगाल 1903-1908, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (People’s Publishing House), नई दिल्ली।
Dr. Om Prakash Singh, Assistant Professor and Head of History Department at Constituent Government College Thakurdwara

Dr. Om Prakash Singh

Assistant Professor & Head, Department of History

Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)

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