बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का उदय: व्यापार से राजनीतिक प्रभुत्व तक

18वीं सदी के मध्य में बंगाल भारत के सभी प्रांतों में सबसे समृद्ध और सबसे महत्वपूर्ण प्रांत था। यह एक ऐसा युग था जिसने भारतीय इतिहास में एक बड़ा बदलाव ला दिया था। इस युग में जहाँ एक ओर औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य कमज़ोर हो रहा था, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिशों (ईस्ट इण्डिया कम्पनी) की ताकत में तेज़ी से वृद्धि हो रही थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने वाणिज्यिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बंगाल के राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य पर पूरी तरह से अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। आइए, इस लेख में बहुत ही सरल शब्दों में समझते हैं कि बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का उदय कैसे हुआ।

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प्रस्तावना एवं बंगाल का ऐतिहासिक महत्व

18वीं शताब्दी के मध्य तक बंगाल भारत का सबसे समृद्ध और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण प्रांत बन चुका था। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगलों की केंद्रीय सत्ता के कमजोर पड़ने के साथ ही बंगाल के नवाबों ने स्वतंत्र शासन करना शुरू कर दिया था। यहाँ की उपजाऊ भूमि, विकसित व्यापार और प्रचुर राजस्व ने यूरोपीय कंपनियों को विशेष रूप से आकर्षित किया। इसी का लाभ उठाते हुए अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने व्यापारिक प्रभाव को धीरे-धीरे राजनीतिक सत्ता में बदल दिया। 1757 में प्लासी के युद्ध से शुरू हुई यह प्रक्रिया 1765 में दीवानी अधिकार मिलने के साथ पूरी तरह से निर्णायक हो गई।

बंगाल की तत्कालीन राजनीतिक पृष्ठभूमि

बंगाल में अंग्रेजी शक्ति के उदय को समझने के लिए उसकी तत्कालीन राजनीतिक स्थिति को समझना आवश्यक है। मुगल सम्राट फर्रुखसियर के समय से 1717 के शाही फरमान के बाद (जिसे इतिहास में कंपनी का ‘मैग्नाकार्टा‘ भी कहा जाता है) बंगाल के सूबेदारों को पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त होने लगी थी। मुर्शिद कुली खाँ ने बंगाल में एक सुदृढ़ प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था स्थापित की और राजधानी को ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित कर दिया। उसके बाद शुजाउद्दीन और सरफराज खाँ के शासन के पश्चात अलीवर्दी खाँ बंगाल का नवाब बना।

अलीवर्दी खाँ ने मराठों के आक्रमणों (चौथ कर संबंधी समझौते) और अन्य समस्याओं के बावजूद बंगाल की राजनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखा। 1756 में उसकी मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी उसका नाती (दौहित्र) सिराजुद्दौला बना। उसके शासनकाल में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब के बीच संघर्ष तीव्र हो गया।

अंग्रेजों और नवाब सिराजुद्दौला के बीच संघर्ष के कारण

व्यापारिक विशेषाधिकारों का दुरुपयोग और किलेबंदी

सिराजुद्दौला के नवाब बनने के समय अंग्रेजी कंपनी कलकत्ता में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक शक्ति बन चुकी थी। कंपनी को मुगल सम्राट से प्राप्त व्यापारिक विशेषाधिकारों (दस्तक / ‘Dastak’ परमिट) का लाभ था, लेकिन उसके अधिकारी इन विशेषाधिकारों का निजी व्यापार में भी व्यापक रूप से उपयोग करते थे। इससे बंगाल सरकार के राजस्व को भारी नुकसान होता था।

इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने कलकत्ता (फोर्ट विलियम) में किलेबंदी को मजबूत करना आरम्भ कर दिया। सिराजुद्दौला ने इसे अपनी संप्रभुता के लिए चुनौती माना और किलेबंदी रोकने का आदेश दिया। अंग्रेजों ने उसके आदेश का पर्याप्त पालन नहीं किया। कंपनी ने नवाब के विरोधियों (जैसे कृष्णदास/राजवल्लभ के पुत्र) को भी शरण दी। इन घटनाओं से दोनों पक्षों के संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हो गए।

कलकत्ता पर नवाब का अधिकार और क्लाइव का आगमन

1756 में सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों को कलकत्ता से (फुलटा द्वीप पर) हटना पड़ा। इसी दौरान चर्चित ‘ब्लैक होल घटना’ या काल कोठरी की त्रासदी का उल्लेख मिलता है। इसके बाद मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव और एडमिरल वॉटसन के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना पहुँची और जनवरी 1757 में अंग्रेजों ने कलकत्ता पर पुनः अधिकार कर लिया।

अलीनगर की संधि (फरवरी 1757)

कलकत्ता पर पुनः अधिकार करने के बाद अंग्रेजों और सिराजुद्दौला के बीच 9 फरवरी 1757 में अलीनगर की संधि हुई। इस संधि के द्वारा नवाब ने कंपनी के पुराने व्यापारिक अधिकारों को स्वीकार किया और अंग्रेजों को कलकत्ता की किलेबंदी तथा सिक्के ढालने (Minting Coins)] की अनुमति मिली।

लेकिन अंग्रेज इस समझौते से संतुष्ट नहीं थे। उनका उद्देश्य केवल व्यापारिक सुविधाओं की रक्षा करना नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीति में निर्णायक प्रभाव स्थापित करना भी था। इसी समय सिराजुद्दौला के दरबार में उसके विरोधियों के साथ अंग्रेजों ने संपर्क स्थापित करना शुरू किया।

प्लासी के युद्ध की पृष्ठभूमि एवं षड्यंत्र

सिराजुद्दौला के शासन से बंगाल के अनेक प्रभावशाली व्यक्ति असंतुष्ट थे। मीर जाफर (मीर बख्शी/प्रधान सेनापति), राय दुर्लभ, यार लुत्फ खाँ तथा कुछ बड़े व्यापारी एवं साहूकार (जैसे जगत सेठ, अमीचंद) अंग्रेजों के संपर्क में आए। अंग्रेजों ने इस आंतरिक असंतोष का लाभ उठाया।

रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर के साथ एक गुप्त समझौता किया। इसके अनुसार सिराजुद्दौला को हटाकर मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया जाना था। इस प्रकार अंग्रेजों ने बंगाल के आंतरिक राजनीतिक संघर्ष में सक्रिय भूमिका ग्रहण कर ली।

प्लासी का युद्ध (23 जून 1757): एक ऐतिहासिक मोड़

23 जून 1757 को प्लासी के मैदान (नदिया जिले में भागीरथी नदी के तट पर) में सिराजुद्दौला और अंग्रेजी सेना के बीच युद्ध हुआ। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव कर रहा था। सिराजुद्दौला की सेना संख्या में अंग्रेजों से बहुत अधिक थी, लेकिन उसके प्रमुख सेनापतियों (विशेषकर मीर जाफर और राय दुर्लभ) में विश्वासघात और निष्क्रियता के कारण वह अपनी पूरी शक्ति का उपयोग नहीं कर सकी। केवल मीर मदान और मोहनलाल जैसे वफादार अधिकारियों ने वीरतापूर्वक युद्ध किया।

मीर जाफर ने युद्ध के दौरान सिराजुद्दौला का प्रभावी समर्थन नहीं किया। परिणामस्वरूप सिराजुद्दौला की सेना पराजित हुई। वह युद्ध के बाद भाग गया और अंततः पकड़ा गया तथा मीर जाफर के पुत्र मीरन के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई। अंग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया।

प्लासी का युद्ध सैन्य दृष्टि से सीमित था। इसे युद्ध से अधिक एक राजनीतिक षड्यंत्र माना जाता है (K.M. Panikkar ), लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसका अत्यंत व्यापक प्रभाव पड़ा। इस युद्ध के बाद अंग्रेजी कंपनी बंगाल की राजनीति में निर्णायक शक्ति बन गई। कंपनी को भारी धनराशि, व्यापारिक सुविधाएँ (24 परगना की जमींदारी) और राजनीतिक प्रभाव प्राप्त हुआ।

मीर जाफर का शासन (1757–1760)

मीर जाफर अंग्रेजों की सहायता से नवाब बना था। इसलिए वह कंपनी की आर्थिक एवं राजनीतिक मांगों से स्वतंत्र होकर शासन नहीं कर सका। अंग्रेजी कंपनी तथा उसके अधिकारियों को बड़ी मात्रा में धन और अन्य सुविधाएँ (उपहार व घूस के रूप में) प्राप्त हुईं। इससे बंगाल के राजकोष पर भारी दबाव पड़ा।

मीर जाफर की आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ती गईं। वह अंग्रेजों की बढ़ती मांगों को पूरा करने में असमर्थ होने लगा। परिणामस्वरूप 1760 की शांतिपूर्ण क्रांति (1760 की संधि के माध्यम से) के माध्यम से अंग्रेजों ने उसे हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को बंगाल का नवाब बना दिया।

मीर कासिम का प्रशासनिक सुधार एवं अंग्रेजों से संघर्ष

मीर कासिम अंग्रेजों के सहयोग से नवाब तो बना, लेकिन शीघ्र ही उसने कंपनी के बढ़ते हस्तक्षेप का विरोध करना शुरू कर दिया। वह एक स्वतंत्र एवं मजबूत प्रशासन स्थापित करना चाहता था।

उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित की ताकि अंग्रेजों के प्रभाव से दूर रह सके और सेना में यूरोपीय पद्धति से सुधार किए। उसने प्रशासनिक एवं वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया। अंग्रेजों को प्राप्त व्यापारिक विशेषाधिकारों के कारण बंगाल सरकार को राजस्व की भारी हानि हो रही थी। मीर कासिम ने इस समस्या को दूर करने के लिए आंतरिक व्यापार पर से सभी प्रकार के चुंगी कर हटा दिया, जिससे अंग्रेजों और भारतीय व्यापारियों के बीच व्यापारिक असमानता को समाप्त किया जा सके।

अंग्रेजों ने इसे अपने व्यापारिक हितों के विरुद्ध माना। दोनों पक्षों के बीच संघर्ष बढ़ा और 1763 में युद्ध प्रारम्भ हो गया (कटवा, गिरिया और सोहा के युद्धों में) । मीर कासिम को कई स्थानों पर पराजय मिली और वह बंगाल से निकलकर अवध चला गया।

बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764)

मीर कासिम ने अंग्रेजों के विरुद्ध अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से सहायता प्राप्त की। इस प्रकार अंग्रेजों के विरुद्ध तीन शक्तियों का यह त्रिगुट  (Alliance) का गठबंधन बना।

22 अक्टूबर 1764 को बक्सर के मैदान में अंग्रेजी सेना और संयुक्त भारतीय सेना के बीच निर्णायक युद्ध हुआ, जो बक्सर का युद्ध के नाम से जाना जाता हैं। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया। अंग्रेजों ने संयुक्त सेना को पराजित कर दिया।

बक्सर की विजय का महत्व प्लासी से भी व्यापक था कहा जाता है कि जहाँ प्लासी ने अंग्रेजों को बंगाल का मालिक बनाया, वहीं बक्सर ने उन्हें संपूर्ण भारत की महाशक्ति के मार्ग पर ला खड़ा किया । प्लासी में अंग्रेजों ने मुख्यतः बंगाल के राजनीतिक षड्यंत्र और आंतरिक विभाजन का लाभ उठाया था, जबकि बक्सर में उन्होंने बंगाल, अवध और मुगल सम्राट से जुड़ी संयुक्त शक्ति को युद्ध के मैदान में अपनी सैन्य श्रेष्ठता से पराजित किया। इस विजय के बाद बंगाल में अंग्रेजी शक्ति को सैन्य एवं राजनीतिक आधार प्राप्त हो गया।

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इलाहाबाद की संधि (1765) और दीवानी अधिकार

बक्सर की विजय के बाद अंग्रेजों की स्थिति अत्यंत मजबूत हो गई। 1765 में रॉबर्ट क्लाइव (जो पुनः गवर्नर बनकर आया था) और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के बीच इलाहाबाद की प्रथम संधि हुई। इसके अंतर्गत मुगल सम्राट ने 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन के बदले कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान की।

दीवानी का अर्थ इन प्रांतों में राजस्व वसूलने तथा दीवानी मामलों के प्रशासन से संबंधित अधिकार प्राप्त करना था। इस प्रकार अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल के विशाल राजस्व पर नियंत्रण प्राप्त हो गया।

यह घटना बंगाल में अंग्रेजी शक्ति के विकास में निर्णायक थी। अब कंपनी केवल व्यापारिक संस्था नहीं रही, बल्कि वह राजस्व प्राप्त करने वाली राजनीतिक शक्ति बन गई। बंगाल की आय से कंपनी अपनी सेना का खर्च चलाने तथा भारत के अन्य क्षेत्रों में विस्तार करने में सक्षम हुई।

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बंगाल में द्वैध शासन (Dual System of Government: 1765–1772)

दीवानी प्राप्त करने के बाद क्लाइव ने बंगाल में द्वैध शासन व्यवस्था स्थापित की। इसके अंतर्गत कंपनी को दीवानी अर्थात राजस्व वसूली का अधिकार प्राप्त था, जबकि नवाब के पास नाममात्र रूप से निजामत अर्थात कानून-व्यवस्था और आपराधिक प्रशासन की जिम्मेदारी बनी रही।

इस व्यवस्था में वास्तविक शक्ति (उत्तरदायित्वहीन अधिकार) कंपनी के हाथों में थी, जबकि प्रशासनिक उत्तरदायित्व (अधिकारहीन उत्तरदायित्व) नवाब के नाम पर बना रहा। इस प्रकार कंपनी ने बिना प्रत्यक्ष प्रशासनिक उत्तरदायित्व स्वीकार किए बंगाल के राजस्व पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

द्वैध शासन ने कंपनी को आर्थिक लाभ तो दिया, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुईं (जैसे कृषि का पतन, व्यापार में गिरावट और 1770 का भयंकर अकाल)। वास्तविक सत्ता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के बीच विभाजन के कारण शासन में भारी अव्यवस्था बढ़ी। आगे चलकर 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन को समाप्त कर कंपनी के प्रत्यक्ष प्रशासन की दिशा में कदम उठाया।

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निष्कर्ष: बंगाल में अंग्रेजी शक्ति के उदय का ऐतिहासिक महत्व

बंगाल में अंग्रेजी शक्ति का उदय भारतीय इतिहास की निर्णायक घटनाओं में से एक था। 1757 का प्लासी युद्ध अंग्रेजों को बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली शक्ति बनाने वाला महत्वपूर्ण चरण था। 1764 का बक्सर युद्ध उनकी सैन्य शक्ति और राजनीतिक प्रभुत्व को अधिक मजबूत करने वाला निर्णायक चरण बना। 1765 में दीवानी अधिकार प्राप्त होने के साथ अंग्रेजों को स्थायी आर्थिक आधार मिल गया।

बंगाल की आय ने अंग्रेजी कंपनी को अपनी सेना बनाए रखने तथा भारत के अन्य क्षेत्रों (जैसे मैसूर, मराठा और सिख राज्यों) में राजनीतिक एवं सैन्य विस्तार करने में सहायता दी। इस प्रकार बंगाल अंग्रेजी सत्ता के विस्तार का प्रमुख आर्थिक आधार बन गया।

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1. प्लासी का युद्ध (1757) भारतीय इतिहास में इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

उत्तर: 23 जून 175 7में हुआ प्लासी का युद्ध सैनिक दृष्टिकोण से भले ही एक छोटा संघर्ष था, लेकिन भारतीय इतिहास में इसके राजनीतिक परिणाम बहुत दूरगामी रहे। इस युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की पराजय हुई और अंग्रेजों की कठपुतली के रूप में मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया। इससे ईस्ट इण्डिया कंपनी को भारी धन और 24 परगना की जमींदारी मिल गई। जिसने बंगाल में ब्रिटिश राजनीतिक प्रभुत्व और साम्राज्य विस्तार की नींव रखी।

2. बक्सर के युद्ध (1764) और प्लासी के युद्ध (1757) के प्रभाव में क्या मुख्य अंतर था?

उत्तर: प्लासी का युद्ध मुख्य रूप से बंगाल के भीतर के राजनीतिक षड्यंत्र और आंतरिक कलह का परिणाम था, तो इसके विपरीत, 1764 में हुआ  बक्सर का युद्ध अंग्रेजों की वास्तविक सैन्य श्रेष्ठता को साबित करने वाला युद्ध था। इस युद्ध में अंग्रेजों ने बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को पराजित किया था। बक्सर की विजय ने ईस्ट इण्डिया कंपनी को संपूर्ण भारत की सर्वोच्च शक्ति के रूप में लाकर खड़ा कर दिया।

3. 1765 की इलाहाबाद की संधि का क्या महत्व था?

उत्तर: उत्तर: भारतीय शक्तियों को 1764 में बक्सर की लड़ाई में पराजित करने के बाद 1765 में रॉबर्ट क्लाइव और मुगल सम्राट शाह अलाम द्वितीय के बीच इलाहाबाद में एक संधि की गई थी। इस संधि के अनुसार मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की ‘दीवानी’ (राजस्व वसूलने और दीवानी न्याय का अधिकार) के अधिकार दे दिये।। अर्थात् इस संधि ने कंपनी को उस क्षेत्र में दीवानी अधिकार दे दिए थे। उस समय तक कंपनी एक वाणिज्यिक उद्यम थी लेकिन इस संधि के बाद वह एक राजनीतिक और कर संग्रह करने वाली शक्ति बन गयी।

4. बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली (Dual System) क्या थी और इसे किसने समाप्त किया?

उत्तर: रॉबर्ट क्लाइव द्वारा शुरू की गई द्वैध शासन प्रणाली (1765–1772) एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें शासन के दो केंद्र थे। इस शासन प्रणाली में कंपनी के पास ‘दीवानी’ (राजस्व अधिकार) था और नवाब के पास ‘निजामत’ (प्रशासन और कानून-व्यवस्था) का नाममात्र दायित्व था। इस शासन प्रणाली की विशेषता यह थी कि इसमें वास्तविक शक्ति कंपनी के पास थी जबकि उत्तरदायित्व नवाब का था।  द्वैध शासन प्रणाली ने बंगाल की अर्थव्यवस्था और कृषि का भारी नुकसान पहुँचाया। अंततः 1772 में वारेन हेस्टिंग्स  ने इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

5. मीर कासिम ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर क्यों स्थानांतरित की थी?

उत्तर: मीर कासिम एक कुशल शासक थे जो स्वतंत्र और मजबूत प्रशासक बनने के लिए उत्सुक थे। मुर्शिदाबाद कलकत्ता से बहुत निकट था जहां ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी प्रशासन में हस्तक्षेप और दबाव डालते थे। इसलिए उन्होंने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर तक स्थानांतरित की ताकि खुद को अंग्रेजों की साजिशों और प्रभाव से दूर कर सकें और एक संगठित सेना और पारदर्शी प्रशासन को स्थापित किया जा

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Dr. Om Prakash Singh, Assistant Professor and Head of History Department at Constituent Government College Thakurdwara

Dr. Om Prakash Singh

Assistant Professor & Head, Department of History

Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)

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