संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखना तथा विभिन्न देशों के बीच सहयोग बढ़ाना है। द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) में हुई भारी जन-धन की हानि ने दुनिया के सामने यह स्पष्ट कर दिया था कि भविष्य में ऐसे युद्धों को रोकने के लिए सभी देशों को मिलकर प्रयास करना चाहिए। इसी उद्देश्य से 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई।
इस लेख में हम संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना, उद्देश्य, मुख्यालय, सदस्य देशों, प्रमुख अंगों और कार्यप्रणाली के बारे में जानेंगे।

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की पृष्ठभूमि (Background of UN Establishment)
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) ने विश्व राजनीति की संरचना को पूरी तरह बदल दिया। युद्ध में भारी जन-धन की हानि हुई और यह स्पष्ट हो गया कि केवल राष्ट्रीय स्तर की नीतियों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति स्थापित करने के उद्देश्य से 10 जनवरी 1920 को ‘राष्ट्र संघ’ (League of Nations) की स्थापना की गई थी, परंतु वह भी सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने में असफल रहा था। अतः द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही एक नए और अधिक प्रभावी अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना के प्रयास प्रारम्भ हो गए।
1941 के अटलांटिक चार्टर (जो अगस्त 1941 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के बीच हुआ था) ने युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था के कुछ प्रमुख सिद्धांतों को सामने रखा।
1 जनवरी 1942 को 26 देशों ने ‘संयुक्त राष्ट्र की घोषणा’ (Declaration by United Nations) पर हस्ताक्षर किए। (ध्यान दें कि ‘United Nations‘ यह नाम अमेरिकी राष्ट्रपति एफ. डी. रूजवेल्ट द्वारा दिया गया था)। इसके बाद तेहरान, डम्बार्टन ओक्स और याल्टा सम्मेलनों में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संगठन की संरचना पर विचार किया गया।
अंततः 1945 में सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र चार्टर तैयार किया गया। 26 जून 1945 को इस चार्टर पर 50 देशों ने हस्ताक्षर किए (बाद में पोलैंड के हस्ताक्षर करने से संस्थापक सदस्यों की संख्या 51 हो गई) और 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संगठन आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आया। (यही कारण है कि प्रतिवर्ष 24 अक्टूबर को ‘संयुक्त राष्ट्र दिवस‘ मनाया जाता है, और भारत 30 अक्टूबर 1945 को इसका संस्थापक सदस्य बना था)।
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख उद्देश्य (Objectives of the United Nations)
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख उद्देश्यों में अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को विकसित करना तथा अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग को बढ़ावा देना शामिल था।
इसके प्रमुख उद्देश्य थे—
- अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना (जो U.N. Charter के अनुच्छेद 1 के अंतर्गत आता है)।
- युद्ध और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को रोकने का प्रयास करना।
- राष्ट्रों के बीच समानता और सहयोग की भावना विकसित करना।
- आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं के समाधान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।
- मानवाधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रताओं को प्रोत्साहित करना।
- राष्ट्रों के बीच विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना।
इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र की भूमिका केवल युद्ध रोकने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की व्यवस्था विकसित करना भी था।
संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख संस्थाएँ (Key Organs of the UNO)

संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली इसके प्रमुख अंगों के माध्यम से संचालित होती है (U.N. Charter के अध्याय 3 में इसके 6 मुख्य अंगों का उल्लेख है):
संयुक्त राष्ट्र का संचालन उसके मुख्य अंगों के माध्यम से होता है, जैसा कि यू.एन. चार्टर के अध्याय 3 में उल्लेख किया गया है। यहां संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है:
- महासभा: महासभा संयुक्त राष्ट्र का सबसे ज्यादा व्यापक प्रतिनिधित्व वाला हिस्सा है, और इसे कई बार “विश्व की छोटी संसद” भी बोल दिया जाता है। इसमें सभी सदस्य राष्ट्र आते हैं, और हर देश अधिकतम पाँच प्रतिनिधि भेज सकता है, लेकिन उनका मत एक ही होता है। महासभा अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक मसलों और मानवता से जुड़े विचारों पर चर्चा करती है, और कई तरह के प्रस्तावों को मंजूर करती है।
- सुरक्षा परिषद: सुरक्षा परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम रखने की सबसे अहम संस्था माना जाता है, कुछ लोग इसे “दुनिया का पुलिसमैन” भी कहते हैं। कभी कभी “दुनिया का प्रहरी” वाली बात भी मिल जाती है। इसमें कुल पाँच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य भी होते हैं जो दो वर्षों के लिए चुने जाते हैं। इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र के ये प्रमुख अंग अंतरराष्ट्रीय मामलों में असर डालने , और सहयोग को बढ़ाने में काफी भूमिका निभाते हैं। स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति (Veto Power) होती है। मतलब अगर किसी अहम प्रस्ताव पर स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत आ जाए , तो उसे रोका जा सकता है। यह व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति संरचना को भी दिखाती थी।
- आर्थिक एवं सामाजिक परिषद: यह संस्था आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सहारा देती है। अभी इसमें 54 सदस्य देश हैं जिनका कार्यकाल 3 साल का रहता है। खासकर विकासशील देशों की आर्थिक, सामाजिक समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने में इस परिषद की बड़ी भूमिका रही है, और इसके बिना बात अधूरी सी हो जाती है।
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय राष्ट्रों के बीच उठने वाले कानूनी विवादों को संभालता है और निपटारा करता है। इसका मुख्यालय द हेग, नीदरलैंड्स में है। इसमें 15 न्यायाधीश होते हैं जिनका कार्यकाल 9 वर्ष का माना जाता है। (यह संयुक्त राष्ट्र का एकमात्र प्रमुख अंग है, जिसका मुख्यालय न्यू यॉर्क में नहीं है) अंतरराष्ट्रीय कानून के विकास में इसकी अलग ही अहमियत रही है।
- सचिवालय: सचिवालय संयुक्त राष्ट्र के प्रशासनिक काम काज को चलाता है। इसका नेतृत्व महासचिव करता है, (पहले महासचिव ट्रिगवे ली थे), जो अंतरराष्ट्रीय मसलों पर संवाद, और कूटनीतिक प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शीत युद्ध और संयुक्त राष्ट्र (Cold War and the United Nations)
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के तुरंत बाद विश्व राजनीति दो प्रमुख शक्ति-गुटों में विभाजित हो गई। एक ओर अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गुट था और दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी गुट। इस प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध कहा गया।
शीत युद्ध ने संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को गहराई से प्रभावित किया। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच मतभेदों के कारण सुरक्षा परिषद में कई बार निर्णय लेना कठिन हो गया। दोनों महाशक्तियाँ अपने राजनीतिक और सामरिक हितों के अनुसार वीटो शक्ति का प्रयोग करती थीं।
इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह निष्क्रिय नहीं रहा। कोरियाई युद्ध (1950–1953) के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने सामूहिक सुरक्षा की भूमिका निभाई (इसी दौरान ‘शांति के लिए एकता प्रस्ताव’ यानी Uniting for Peace Resolution, 1950 भी पारित किया गया था)। इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में युद्धविराम की निगरानी और शांति स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र के शांति-रक्षक मिशन स्थापित किए गए।
उपनिवेशवाद की समाप्ति में भूमिका (Role in Decolonization)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को गति मिली। भारत, इंडोनेशिया, घाना और अनेक अन्य देशों की स्वतंत्रता के बाद संयुक्त राष्ट्र में नए स्वतंत्र राष्ट्रों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।
इन देशों ने संयुक्त राष्ट्र के मंच का उपयोग उपनिवेशवाद, नस्लीय भेदभाव और विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध अपनी आवाज उठाने के लिए किया। महासभा में विकासशील देशों की संख्या बढ़ने से विश्व राजनीति में महाशक्तियों के अतिरिक्त नवस्वतंत्र देशों का महत्व भी बढ़ा (जिसे बाद में गुटनिरपेक्ष आंदोलन यानी NAM और G-77 के रूप में भी एक नई दिशा मिली)।
इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र ने उपनिवेशवाद के प्रश्न को एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के रूप में स्थापित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संयुक्त राष्ट्र और महाशक्तियों की राजनीति (UNO and Superpower Politics)
शीत युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र एक ओर अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मंच था, तो दूसरी ओर यह महाशक्तियों की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी क्षेत्र बन गया। अमेरिका और सोवियत संघ दोनों संयुक्त राष्ट्र के मंच का उपयोग अपने विचारों और नीतियों के समर्थन के लिए करते थे।
सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति के कारण महाशक्तियों के हितों को विशेष महत्व प्राप्त था। इससे संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र कार्रवाई की क्षमता कई बार सीमित हुई। फिर भी महासभा के माध्यम से छोटे और विकासशील देशों को अपनी समस्याएँ वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिला।
इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र की राजनीति को गहराई से समझने के लिए महाशक्तियों की शक्ति-स्पर्धा और छोटे देशों की सामूहिक कूटनीति, दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
शांति स्थापना में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका (Role in Peacekeeping Operations)

संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख उपलब्धियों में शांति-रक्षा अभियानों (Peacekeeping Operations) का विकास शामिल है (इनकी शांति सेनाओं को ‘ब्लू हेलमेट्स’ कहा जाता है और इनका पहला अभियान 1948 में मध्य पूर्व में शुरू हुआ था)। इन अभियानों का उद्देश्य संघर्षरत पक्षों के बीच युद्धविराम की निगरानी करना, शांति प्रक्रिया को सहायता देना और संघर्ष के पुनः आरंभ होने की संभावना को कम करना था।
संयुक्त राष्ट्र के शांति-रक्षक विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किए गए (भारत इस शांति सेना में सबसे बड़े सैन्य योगदानकर्ताओं में से एक रहा है)। इन अभियानों ने यह स्थापित किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय सामूहिक रूप से संघर्षों को नियंत्रित करने और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास कर सकता है।
हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र की सफलता प्रत्येक संघर्ष में समान नहीं रही। जहाँ सदस्य राष्ट्रों और प्रमुख शक्तियों के बीच आम सहमति बनी, वहाँ संयुक्त राष्ट्र ने अधिक प्रभावी ढंग से कार्य किया; लेकिन राजनीतिक मतभेदों और आपसी टकराव की स्थिति में उसकी भूमिका सीमित होकर रह गई।
आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र में भूमिका (Role of Specialized Agencies)
कुछ ऐसा है कि युद्धोत्तर दौर में , आर्थिक व सामाजिक विकास भी वैश्विक राजनीति का एक बड़ा हिस्सा बन गया। संयुक्त राष्ट्र की अलग अलग संस्थाएं और एजेंसियां शायद स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा , बाल कल्याण तथा आर्थिक विकास जैसी चीजों में अभूतपूर्व काम कर रही थीं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO, मुख्यालय: जिनेवा) ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में, UNESCO (मुख्यालय: पेरिस) ने शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में , UNICEF (मुख्यालय: न्यू यॉर्क) ने बाल कल्याण के क्षेत्र में, और FAO (मुख्यालय: रोम) ने खाद्य तथा कृषि सम्बन्धी उलझनों में अंतरराष्ट्रीय तालमेल को न सिर्फ बढ़ाया बल्कि उसे एक नई गति भी दी।
इस वजह से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का दायरा सिर्फ सैन्य और राजनीतिक मामलों तक सीमित नहीं रहा। अब विकास , और मानव कल्याण दोनों, वैश्विक एजेंडे में अनिवार्य हिस्सा की तरह जुड़ गए।
मानवाधिकार और संयुक्त राष्ट्र (Human Rights and the UN)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए अमानवीय अत्याचारों ने मानवाधिकारों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बना दिया। संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights – UDHR) को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया (इसीलिए प्रतिवर्ष 10 दिसंबर को ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस’ मनाया जाता है)।
इस घोषणा ने जीवन, स्वतंत्रता, समानता और मानवीय गरिमा जैसे मौलिक अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया। आगे चलकर मानवाधिकारों से संबंधित अनेक अंतरराष्ट्रीय समझौते और संस्थागत व्यवस्थाएँ विकसित हुईं।
संयुक्त राष्ट्र की सीमाएँ (Limitations of the UN)
संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली में कई सीमाएँ और कुछ विसंगतियाँ भी साफ दिखाई दीं, और ईमानदारी से कहें तो कई बार मामला अटक ही जाता है। सबसे अहम बात सुरक्षा परिषद की वीटो व्यवस्था थी। वहां, खासकर स्थायी सदस्यों के बीच मतभेद होने पर, किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर निर्णय लेना बेहद कठिन हो जाता था, जैसे कि रास्ता ही बंद हो रहा हो।
दूसरी बड़ी सीमा वाली बात ये है कि संयुक्त राष्ट्र के पास अपनी कोई स्वतंत्र स्थायी सैन्य शक्ति नहीं है। किसी भी टकराव में सैन्य कार्रवाई या शांति स्थापना के लिए उसे हमेशा सदस्य देशों के सहयोग और उनके बल-प्रवाह पर ही निर्भर रहना पड़ता है , और ये निर्भरता कई बार समय के साथ असर भी बदल देती है।
तीसरी समस्या महाशक्तियों की आपसी राजनीति रही। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच लगातार टकराव ने, कई मौकों पर, संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता और निर्णय लेने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया। कई प्रस्ताव बस कागज पर रह जाते हैं , और असल में आगे बढ़ना नामुमकिन सा हो जाता है।
इसके अलावा सदस्य देशों के अलग अलग राष्ट्रीय हित, बढ़ती आर्थिक असमानताएँ और राजनीतिक मतभेद, संयुक्त राष्ट्र के निर्णयों के सही क्रियान्वयन में बार बार रुकावट बनते रहे। और ठीक इसी वजह से, कभी कभी संगठन का लक्ष्य और जमीन की हकीकत दोनों अलग अलग दिशा में चलने लगते थे।
वैश्विक राजनीति में संयुक्त राष्ट्र का महत्व (Significance in Global Politics)
इन तमाम सीमाओं और चुनौतियों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र ने युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था को एक संस्थागत और सुव्यवस्थित रूप देने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है, भले ही यह प्रक्रिया हमेशा आसान नहीं रही हो। उसने राष्ट्रों को बातचीत, संवाद और कूटनीति के ज़रिए अपने आपसी मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीके से रखने एक स्थायी मंच दिया।
संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से सामूहिक सुरक्षा, बहुपक्षीय कूटनीति, मानवाधिकार, सतत विकास, अंतरराष्ट्रीय कानून, और शांति-रक्षा जैसे विचार, आज वैश्विक राजनीति के स्थायी और अनिवार्य हिस्से बन चुके हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदलती विश्व राजनीति में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को महाशक्तियों के दबाव और प्रभाव से अलग करके नहीं देख सकते, फिर भी यह संस्था अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संवाद और सहयोग की ऐसी व्यवस्था गढ़ने में काफी हद तक सफल रही, जिसने युद्धोत्तर विश्व राजनीति को एक ठोस संस्थागत आधार प्रदान किया।
स्व-मूल्यांकन एवं अभ्यास प्रश्न
1. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना कब हुई थी?
उत्तर: 24 अक्टूबर 1945 को।
2. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना किस उद्देश्य से की गई थी?
उत्तर: दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाये रखने, और देशों के बीच सहयोग को बढ़ाने हेतु।
3. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर पर हस्ताक्षर कब और कहाँ किए गए थे?
उत्तर: 26 जून 1945 को सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में।
4. ‘संयुक्त राष्ट्र’ (United Nations) नाम किसने दिया था?
उत्तर: अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने।
5. संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय कहाँ स्थित है?
उत्तर: न्यूयॉर्क शहर (अमेरिका) में।
6. संयुक्त राष्ट्र संघ में वर्तमान में कितने सदस्य देश हैं?
उत्तर: संयुक्त राष्ट्र संघ में वर्तमान में 193 सदस्य देश हैं। दक्षिण सूडान 14 जुलाई 2011 को इसका सदस्य बना था। इसके बाद से सदस्य देशों की संख्या 193 ही है।
संयुक्त राष्ट्र संघ में दो गैर-सदस्य प्रेक्षक राज्य भी हैं— होली सी (Holy See) और फिलिस्तीन राज्य। इन्हें सदस्य देशों से अलग माना जाता है।
7. संयुक्त राष्ट्र संघ का आधिकारिक दिवस कब मनाया जाता है?
उत्तर: प्रत्येक वर्ष 24 अक्टूबर को।
8. संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में प्रत्येक सदस्य देश को कितने मत प्राप्त होते हैं?
उत्तर: प्रत्येक सदस्य देश को एक मत प्राप्त होता है।
9. संयुक्त राष्ट्र संघ के कितने प्रमुख अंग हैं?
उत्तर: छह प्रमुख अंग हैं।
10. संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में कुल कितने सदस्य होते हैं?
उत्तर: 15 सदस्य।
11. सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य देशों के नाम लिखिए।
उत्तर: अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन।
12. सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की विशेष नकारात्मक शक्ति क्या कहलाती है?
उत्तर: वीटो शक्ति (Veto Power)।
13. संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी कौन होता है?
उत्तर: महासचिव (Secretary-General)।
14. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय कहाँ स्थित है?
उत्तर: द हेग, नीदरलैंड्स में।
15. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कुल कितने न्यायाधीश होते हैं?
उत्तर: 15 न्यायाधीश, जिनका कार्यकाल नौ वर्ष होता है।
16. संयुक्त राष्ट्र संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर: आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC)।
17. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर: जिनेवा, स्विट्जरलैंड में।
18. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) का मुख्यालय कहाँ स्थित है?
उत्तर: न्यूयॉर्क, अमेरिका में।
19. यूनेस्को (UNESCO) का मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर: पेरिस, फ्रांस में।
20. संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर: अरबी, चीनी, अंग्रेज़ी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश।
विद्यार्थियों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न- संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO)
उत्तर: संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के बाद दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाये रखने तथा आगे चलकर तीसरे विश्व युद्ध को रोकने की सोच के साथ, इसकी स्थापना की गई थी।
उत्तर: संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय न्यू यॉर्क (अमेरिका) में है। लेकिन इसके कुछ अंतर्राष्ट्रीय अंग और एजेंसियां जैसे जिनेवा (स्विट्जरलैंड), पेरिस (फ्रांस) और द हेग (नीदरलैंड्स) जैसे शहरों में भी स्थित हैं।
उत्तर: भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का संस्थापक सदस्य रहा, और इसे 30 अक्टूबर 1945 को आधिकारिक रूप से इसमें शामिल किया गया था।
उत्तर: सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन। इन सबके पास ‘वीटो शक्ति’ (Veto Power) होती है, यानी अगर इनमें से कोई एक देश किसी जरूरी प्रस्ताव के खिलाफ वोट कर दे, तो प्रस्ताव पास नहीं हो पाता, भले बाकी सभी पक्ष समर्थन में हों।
उत्तर: यह दिवस हर साल 24 अक्टूबर को ‘संयुक्त राष्ट्र दिवस’ (United Nations Day) के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1945 में संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक चार्टर लागू हुआ था।
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Dr. Om Prakash Singh
Assistant Professor & Head, Department of History
Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)
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