द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) मानव इतिहास के सबसे बड़े और सबसे विनाशकारी संघर्षों में से एक था। इस पूरे घटनाक्रम, इसके पीछे के कारणों और दुनिया पर पड़े इसके दूरगामी प्रभावों को यहाँ बहुत ही आसान भाषा में, एक-एक करके समझाया गया है। युद्ध की शुरुआत से लेकर अंत तक क्या हुआ, क्यों हुआ और इसके बाद वैश्विक राजनीति में क्या-क्या बदलाव आए—इन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण आपको यहाँ मिलेगा, ताकि इसे पढ़ने के बाद आपको इस विषय को कहीं और से पढ़ने की आवश्यकता न पड़े।

द्वितीय विश्व युद्ध: एक परिचय (Introduction)
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945) आधुनिक इतिहास की सबसे व्यापक और विनाशकारी घटनाओं में से एक था। यह युद्ध मुख्यतः यूरोप से प्रारंभ होकर शीघ्र ही एशिया, अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र तक फैल गया।
इसमें विश्व की प्रमुख शक्तियाँ दो प्रमुख गुटों में विभाजित हो गईं—धुरी राष्ट्र (Axis Powers), जिनमें जर्मनी, इटली और जापान प्रमुख थे, तथा मित्र राष्ट्र (Allied Powers), जिनमें ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ (जो जून 1941 में जर्मनी के ‘ऑपरेशन बारबोसा‘ के बाद शामिल हुआ), चीन और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका (जो दिसंबर 1941 में जापान के पर्ल हार्बर हमले के बाद युद्ध में उतरा) प्रमुख बने
द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख कारण

1. वर्साय की संधि का असंतोष
प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित वर्साय की व्यवस्था ने यूरोप में स्थायी शांति स्थापित नहीं की। जर्मनी पर लगाए गए कठोर राजनीतिक,आर्थिक और सैन्य प्रतिबंधों से वहाँ असंतोष बढ़ा [28 जून 1919 को हुई वर्साय की संधि में अनुच्छेद 231 (वार गिल्ट क्लॉज) के तहत युद्ध का पूरा दोष अकेले जर्मनी पर मढ़ दिया गया था,जिससे जर्मन जनता में भारी रोष और अपमान की भावना पैदा हुई)। हिटलर और नाजी पार्टी ने इसी असंतोष का राजनीतिक लाभ उठाया और वर्साय की संधि को समाप्त करने तथा जर्मनी को पुनः शक्तिशाली बनाने का कार्यक्रम अपनाया।
2. फासीवाद और नाजीवाद का उदय
दूसरा महत्वपूर्ण कारण फासीवाद और नाजीवाद का उदय था। इटली में मुसोलिनी (जो 1922 में ‘ब्लैक शर्ट्स’ आंदोलन के ज़रिए सत्ता में आया था) तथा जर्मनी में हिटलर (जो 1933 में जर्मनी का चांसलर बना) ने आक्रामक राष्ट्रवाद, सैन्यवाद और विस्तारवाद को बढ़ावा दिया। हिटलर जर्मनी के लिए अधिक क्षेत्र प्राप्त करना चाहता था और उसने पूर्वी यूरोप में विस्तार की नीति (जिसे जर्मन भाषा में ‘लेबेन्स्राम’ यानी रहने की जगह की नीति कहा जाता है) अपनाई।
3. राष्ट्र संघ की असफलता
तीसरा कारण राष्ट्र संघ (League of Nations) की असफलता थी। जापान द्वारा मंचूरिया पर अधिकार (1931 में) और इटली द्वारा अबीसीनिया (आधुनिक इथियोपिया, 1935-36 में)पर आक्रमण के विरुद्ध राष्ट्र संघ प्रभावी कार्रवाई नहीं कर सका। इससे आक्रामक राष्ट्रों का मनोबल बढ़ा और सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था कमजोर हुई।
4. आर्थिक महामंदी और तुष्टीकरण की नीति
इसके अतिरिक्त 1929 की महामंदी (Great Depression), आर्थिक राष्ट्रवाद, हथियारों की दौड़, साम्यवाद का भय और प्रमुख शक्तियों [विशेषकर ब्रिटेन और फ्रांस] की तुष्टीकरण नीति (Policy of Appeasement – जैसे हिटलर की महत्वकांक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए 1938 में किया गया म्यूनिख समझौता) ने भी युद्ध की परिस्थितियों को मजबूत किया।
युद्ध का आरंभ
हिटलर ने 1938 में ऑस्ट्रिया का जर्मनी में विलय किया [इतिहास में इस राजनीतिक विलय को ‘अंशलुस’(Anschluss) कहा जाता है] तथा चेकोस्लोवाकिया के सूडेटेन क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त किया। इसके बाद उसकी विस्तारवादी नीति और अधिक स्पष्ट हो गई।
अगस्त 1939 में जर्मनी और सोवियत संघ के बीच जर्मन-सोवियत अनाक्रमण संधि (जिसे मोलोटोव-रिबेंट्रॉप पैक्ट कहा जाता है) हुई।
1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया (जर्मनी ने इस हमले में ‘ब्लिट्जक्रेग‘ यानी तीव्र गति वाले तड़ित युद्ध की रणनीति का प्रयोग किया)।
3 सितंबर 1939 को ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसी के साथ द्वितीय विश्व युद्ध का औपचारिक आरंभ हुआ।
युद्ध का विस्तार और प्रमुख चरण
1. यूरोप और सोवियत संघ का मोर्चा
युद्ध के प्रारंभिक चरण में जर्मनी ने तीव्र गति से पश्चिमी यूरोप के कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। फ्रांस 1940 में जर्मनी के सामने पराजित हुआ। ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। 1940 में ब्रिटेन का युद्ध (Battle of Britain) हुआ, जिसमें जर्मनी ब्रिटेन को निर्णायक रूप से पराजित नहीं कर सका।
1941 में हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया (इस गुप्त सैन्य अभियान का कोड नाम ‘ऑपरेशन बारबोसा‘था,जो जून 1941 में शुरू हुआ)। इससे युद्ध का पूर्वी मोर्चा अत्यंत व्यापक हो गया।
2. प्रशांत मोर्चा और अमेरिका का प्रवेश
इसी वर्ष 7 दिसंबर 1941 को जापान ने पर्ल हार्बर पर अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर अचानक हमला किया। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका युद्ध में शामिल हो गया और युद्ध का स्वरूप वास्तव में वैश्विक हो गया।
3. युद्ध का निर्णायक मोड़ (1942–1945)
1942–43 के बाद युद्ध की दिशा मित्र राष्ट्रों के पक्ष में बदलने लगी। सोवियत संघ ने स्टालिनग्राद में जर्मन सेना को गंभीर पराजय दी (1942-43 का स्टालिनग्राद का युद्ध इतिहास के सबसे खूनी और निर्णायक मोड़ों में से एक माना जाता है) ।
उत्तरी अफ्रीका में भी (विशेषकर एल अलामीन के निर्णायक युद्ध में) धुरी राष्ट्रों को पीछे हटना पड़ा।
1944 में (6 जून 1944 को) मित्र राष्ट्रों ने फ्रांस के नॉरमैंडी तट पर डी-डे अभियान (कोड नाम: ऑपरेशन ओवरलॉर्ड) शुरू किया। पश्चिम और पूर्व दोनों दिशाओं से जर्मनी पर दबाव बढ़ा।
4. धुरी राष्ट्रों का आत्मसमर्पण
अप्रैल 1945 में सोवियत सेना बर्लिन पहुँची और 30 अप्रैल 1945 को हिटलर ने आत्महत्या कर ली। मई 1945 (8 मई 1945-V-E Day /यूरोप में विजय दिवस) में जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया।
एशिया में जापान के विरुद्ध युद्ध जारी रहा। अगस्त 1945 में अमेरिका ने हिरोशिमा (6 अगस्त को ‘लिटिल बॉय’ नाम का परमाणु बम) और नागासाकी (9 अगस्त को ‘फैट मैन’ नाम का परमाणु बम)पर परमाणु बम गिराए। इसके बाद 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण की घोषणा की और 2 सितंबर 1945 को औपचारिक हस्ताक्षर के साथ द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया।
द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव
1. व्यापक जन-धन की हानि
युद्ध का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव भारी जन-धन की हानि थी। करोड़ों सैनिकों और नागरिकों की मृत्यु हुई (अनुमानतः दुनिया भर में 7 से 8 करोड़ लोग मारे गए) तथा बड़ी संख्या में लोग घायल और विस्थापित हुए। यूरोप के अनेक नगर,औद्योगिक क्षेत्र,सड़कें,रेलवे और बंदरगाह नष्ट हो गए। युद्ध ने अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
2. यूरोप की शक्ति में गिरावट और दो महाशक्तियों का उदय
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप की पारंपरिक राजनीतिक और आर्थिक शक्ति कमजोर हो गई। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे पुराने साम्राज्यवादी राष्ट्र आर्थिक कठिनाइयों से प्रभावित हुए। इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दो प्रमुख महाशक्तियों के रूप में उभरे। इस प्रकार विश्व राजनीति का शक्ति-संतुलन यूरोप से हटकर अमेरिका और सोवियत संघ के बीच केंद्रित होने लगा (जिससे वैश्विक स्तर पर द्विध्रुवीय राजनीति (Bipolarity) और शीत युद्ध के दौर की शुरुआत हुई)।
3. संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की स्थापना

राष्ट्र संघ की विफलता के अनुभव से सीख लेते हुए युद्ध के बाद एक अधिक प्रभावी अंतरराष्ट्रीय संस्था की आवश्यकता महसूस की गई। 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) की स्थापना हुई (सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में 51 संस्थापक देशों के हस्ताक्षर के साथ)। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच सहयोग विकसित करना तथा भविष्य के युद्धों को रोकने में सहायता करना था।
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4. शीत युद्ध (Cold War) का आरंभ
युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक और राजनीतिक मतभेद तेजी से बढ़े। अमेरिका पूँजीवादी और उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रमुख प्रतिनिधि था, जबकि सोवियत संघ समाजवादी व्यवस्था का नेतृत्व कर रहा था। दोनों महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ,लेकिन राजनीतिक,आर्थिक,सैन्य [जैसे पश्चिमी देशों द्वारा नाटो (NATO – 1949) और सोवियत गुट द्वारा वारसा पैक्ट (1955) जैसे सैन्य गठबंधन बनाए गए] और वैचारिक प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुई। इसे शीत युद्ध कहा गया।
5. उपनिवेशवाद का पतन और भारत पर प्रभाव
द्वितीय विश्व युद्ध ने यूरोपीय साम्राज्यवाद को कमजोर कर दिया। एशिया और अफ्रीका के उपनिवेशों में राष्ट्रीय आंदोलनों को नई शक्ति मिली। भारत,इंडोनेशिया,वियतनाम तथा अनेक अन्य देशों में स्वतंत्रता आंदोलनों ने गति प्राप्त की। आने वाले दशकों में एशिया और अफ्रीका के अनेक देश स्वतंत्र हुए।
भारत के लिए भी युद्ध अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ [युद्ध के समय भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो थे,और युद्धकालीन परिस्थितियों के कारण ही भारत में क्रिप्स मिशन (1942) तथा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) का सूत्रपात हुआ था]। युद्ध के बाद ब्रिटिश शासन की आर्थिक एवं राजनीतिक क्षमता कमजोर हुई और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक गति मिली। अंततः 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ।
6. जर्मनी और जापान में परिवर्तन
जापान में भी राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन हुए। अमेरिकी अधीनता(कमांडर जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व में) में वहाँ सैन्यवाद को सीमित किया गया और नई लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था विकसित हुई। जापान ने युद्धोत्तर काल में अपने आर्थिक पुनर्निर्माण की दिशा में अभूतपूर्व प्रगति की।
युद्ध के बाद जर्मनी का विभाजन हुआ। पश्चिमी भाग में पश्चिमी शक्तियों [अमेरिका,ब्रिटेन और फ्रांस] के प्रभाव वाला क्षेत्र तथा पूर्वी भाग में सोवियत प्रभाव वाला क्षेत्र विकसित हुआ। आगे चलकर 1949 में पश्चिम जर्मनी/ जर्मनी संघीय गणराज्य [Federal Republic of Germany (FRG)] और पूर्वी जर्मनी/ जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य [German Democratic Republic (GDR)] अलग-अलग राज्यों के रूप में अस्तित्व में आए।
7. युद्ध अपराध और मानवाधिकार
नाजी शासन द्वारा किए गए अत्याचारों तथा यहूदियों और अन्य समूहों के व्यापक नरसंहार (जिसे इतिहास में‘होलोकॉस्ट'(Holocaust) के रूप में जाना जाता है) ने विश्व समुदाय को गहराई से प्रभावित किया।
युद्ध के बाद न्यूरेंबर्ग न्यायाधिकरण (Nuremberg Trials, 1945-46) के माध्यम से प्रमुख नाजी युद्ध अपराधियों पर मुकदमे चलाए गए। इससे अंतरराष्ट्रीय कानून में युद्ध अपराध और मानवता के विरुद्ध अपराध जैसे सिद्धांतों को अधिक महत्व मिला।
10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR) को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वीकार किया। इस प्रकार युद्ध के अनुभवों ने मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय अवधारणा को और अधिक मजबूत किया।
8. आर्थिक पुनर्निर्माण (मार्शल योजना)
युद्ध के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने की अत्यंत आवश्यकता सामने आई। इसके समाधान के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने मार्शल योजना (Marshall Plan,1948) के ज़रिए पश्चिमी यूरोप को काफी बड़ी आर्थिक मदद प्रदान की। इस सहायता से यूरोपीय देशों का आर्थिक पुनर्गठन हुआ और उनके बीच आपसी सहयोग का रास्ता साफ हुआ। यही आर्थिक एकीकरण आगे चलकर यूरोपीय संघ (EU) के गठन की मजबूत नींव साबित हुआ।
निष्कर्ष
द्वितीय विश्व युद्ध ने विश्व राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। इसके परिणामस्वरूप यूरोप का प्रभुत्व कमजोर हुआ, अमेरिका और सोवियत संघ महाशक्तियों के रूप में उभरे, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई और शीत युद्ध की शुरुआत हुई। इसके साथ ही एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के विरुद्ध चल रहे राष्ट्रीय आंदोलनों को भी एक नई गति मिली। इस प्रकार 1939–1945 का यह युद्ध केवल एक सैन्य टकराव नहीं था, बल्कि इसने बीसवीं शताब्दी की नई विश्व-व्यवस्था के निर्माण की आधारभूमि तैयार की।
प्रामाणिक संदर्भ पुस्तकें एवं अध्ययन स्रोत
- अर्जुनदेव(2009), आधुनिक विश्व का इतिहास, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT), नई दिल्ली।
- राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT), विश्व इतिहास के कुछ विषय, कक्षा 12, NCERT, नई दिल्ली।
- E. H. Carr (1947), International Relations Between the Two World Wars,1919–1939, Macmillan,London।
- A. J. P. Taylor (1961), The Origins of the Second World War, Hamish Hamilton, London।
- Gerhard L. Weinberg (1994), A World at Arms: A Global History of World War II,Cambridge University Press,Cambridge।
- Ian Kershaw (2007), Fateful Choices: Ten Decisions That Changed the World,1940–1941, Allen Lane, London।

Dr. Om Prakash Singh
Assistant Professor & Head, Department of History
Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)
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