भारत में फ्रांसीसियों का आगमन (Arrival of French in India) और कर्नाटक युद्ध

आधुनिक भारतीय इतिहास के इस महत्वपूर्ण अध्याय “भारत में फ्रांसीसियों का आगमन” (Advent of French in India) को इस लेख में बेहद सरल और सहज भाषा में समझाया गया है, ताकि पढ़ते ही सारे कॉन्सेप्ट्स आसानी से समझ आ जाएं।

यहाँ आपको फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना, भारत में उनकी व्यापारिक कोठियों के विकास, अंग्रेजों के साथ हुए तीनों प्रसिद्ध कर्नाटक युद्धों और अंततः फ्रांसीसियों की पराजय के प्रमुख कारणों पर विस्तृत और स्पष्ट जानकारी मिलेगी।

यह लेख विशेष रूप से UPSC, State PCS, UGC-NET और SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए तैयार किया गया है, ताकि वे बिना उलझे कम समय में इसका बेहतर और त्वरित रिवीजन (Quick Revision) कर सकें।

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन

फ्रांसीसियों ने भारत में सबसे अंत में प्रवेश किया। इनसे पहले यहाँ पर पुर्तगाल, अंग्रेज, डच और डेन लोग अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कर चुके थे। फ्रांस के सम्राट लुई 14वें के मंत्री ‘कोल्बर्ट‘ के सहयोग से 1664 में भारत में ‘फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी‘ की स्थापना हुई। फ्रांसीसी कम्पनी सरकार के संरक्षण तथा उसके द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता पर निर्भर थी, इसलिए इसे सरकारी व्यापारिक कम्पनी भी कहा गया।

भारत में फ्रांसीसियों की पहली कोठी (फैको केरो द्वारा) सूरत में 1668 में स्थापित की गई। गोलकुण्डा रियासत के सुलतान से अधिकार पत्र प्राप्त करने के बाद फ्रांसीसियों ने अपनी दूसरी व्यापारिक कोठी की स्थापना 1669 में मुसलीपट्टम में की। 1673 में फ्रांसिस मार्टिन ने ‘पांडिचेरी‘ की नींव डाली। बंगाल के तत्कालीन नवाब (शाइस्ताखां) ने 1674 में फ्रांसीसियों को एक जगह दी जहाँ पर 1690-92 के मध्य चन्द्रनगर की सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी कोठी की स्थापना की गई। 1693 को फ्रांसीसियों के कब्जे से हच्चो ने पांडिचेरी को छीन लिया, जो 1697 में सम्पन्न रिजविक समझौते के बाद पुनः वापस फ्रांसीसियों को मिल सका।

फ्रांसीसियों ने 1721 में मारीशस, 1725 में मालाबार तट पर स्थित माहीं एवं 1739 को कारीकल पर अपना अधिकार जमा लिया। 1742 से पूर्व फ्रांसीसियों का मूल उद्देश्य व्यापारिक लाभ कमाना था परन्तु 1742 के बाद डूप्ले के पांडिचेरी का गवर्नर नियुक्त होने पर राजनीतिक लाभ व्यापारिक लाभ से महत्वपूर्ण हो गया। डूप्ले की इस महत्वाकांक्षा ने ही फ्रांसीसियों का भारत में पतन कर दिया।

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व्यापारिक कम्पनियों के मध्य संघर्ष

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–1748)

यह युद्ध आस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध से प्रभावित था जो 1740 से ही प्रारम्भ था। चूँकि यूरोप में फ्रांस और ब्रिटेन एक दूसरे के प्रबल विरोधी थे अतः भारत में भी इस विरोध का असर पड़ा जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेज और फ्रांसीसी सेना में 1746 में युद्ध प्रारम्भ हो गया।

तत्कालीन पांडिचेरी का गवर्नर (फ्रांसीसी) डूप्ले युद्ध के पक्ष में नहीं था। उसने सीधे अंग्रेज अधिकारियों से बात की पर कोई समाधान न निकल सका। अंग्रेज अधिकारी (बर्नेठ) द्वारा कुछ फ्रांसीसी जहाजों पर कब्जा कर लेने के उपरान्त डूप्ले ने मारीशस के गवर्नर (ला बुर्दने) के सहयोग से मद्रास का घेरा डाल दिया। 21 सितम्बर 1746 को मद्रास ने आत्मसमर्पण कर दिया परन्तु डूप्ले अपने लक्ष्य फोर्ट ‘सेन्ट डेविड‘ को जीतने में असफल रहा।

इसी युद्ध में ‘सेन्ट टोमे’ नाम का एक युद्ध फ्रांसीसी सेना एवं कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन के मध्य लड़ा गया, जिसका परिणाम फ्रांसीसियों के पक्ष में रहा। आस्ट्रिया का उत्तराधिकार युद्ध 1748 में हुई ‘एलाशापेल की संधि‘ (Treaty of Aix-la-Chapelle) के द्वारा समाप्त हुआ। इसी संधि के तहत प्रथम कर्नाटक युद्ध समाप्त हुआ और संधि में निश्चित की गई शर्तों के अनुसार फ्रांसीसियों ने मद्रास को अंग्रेजों को वापस किया।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749–1754)

कर्नाटक के प्रथम युद्ध की सफलता से डूप्ले स्वयं को महत्वाकांक्षी समझने लगा था। कर्नाटक का दूसरा युद्ध हैदराबाद तथा कर्नाटक के सिंहासन के विवादास्पद उत्तराधिकारियों के कारण हुआ। फ्रांस तथा ब्रिटिश कम्पनियों ने एक दूसरे के विरोधी गुट को समर्थन देकर इसे भड़काना शुरू किया।

इसी युद्ध में अर्काट का घेरा 1751 में क्लाइव के नेतृत्व में डाला गया और क्लाइव की इसमें मिली सफलता उसकी प्रथम कूटनीतिक विजय मानी जाती है। यहाँ पर युद्ध की विस्तृत व्याख्या न करते हुए इतना बताना ही पर्याप्त होगा कि डूप्ले को व्यक्तिगत रूप से इसमें अपूर्णीय क्षति हुई, फ्रांसीसी क्षति तो हुई ही। डूप्ले को इस असफलता के बाद वापस बुला लिया गया।

भारत में फ्रांसीसी प्रदेश का अगला गवर्नर ‘गोडेहू‘ को बनाया गया जो 1754 में भारत पहुँचा। भारत आकर इसने इंग्लैंड की कम्पनी के साथ संधि का प्रयास किया जिसके फलस्वरूप जनवरी 1755 में पांडिचेरी की संधि हुई। दोनों पक्ष युद्ध विराम पर सहमत हो गए। कुल मिलाकर इस युद्ध में अंग्रेजों की स्थिति मजबूत रही।

कर्नाटक का तीसरा युद्ध (1758–1763)

यह युद्ध आस्ट्रिया और प्रसा में 1756 में शुरू हुए ‘सप्तवर्षीय’ युद्ध का ही एक अंश था। सप्तवर्षीय युद्ध में फ्रांस ने आस्ट्रिया को तथा इंग्लैण्ड ने प्रसा को समर्थन देना शुरू किया जिसके परिणामस्वरूप भारत में फ्रांसीसी और अंग्रेजी सेना में युद्ध प्रारम्भ हो गया।

1757 में फ्रांसीसी सरकार ने ‘काउन्ट लाली’ को इस संघर्ष से निपटने के लिए भारत भेजा, दूसरी ओर बंगाल पर कब्जा कर लेने के कारण अंग्रेज आर्थिक रूप से काफी मजबूत हो गए थे और इसी मजबूती के कारण अंग्रेज दक्खन को जीत पाने में सफल रहे। लाली ने 1758 में ‘फोर्ट सेन्ट डेविड’ को अपने अधिकार में ले लिया परन्तु उसका तंजौर पर अधिकार करने का सपना पूरा नहीं हो सका जिसका उसकी व्यक्तिगत एवं फ्रांस की छवि पर बुरा असर पड़ा।

लाली ने बुसी को हैदराबाद से बुलवाया ताकि वह अपनी स्थिति को इस युद्ध में मजबूत कर सके, परन्तु 1760 में अंग्रेजी सेना ने ‘सर आयरकूट’ के नेतृत्व में ‘वांडीवाश की लड़ाई‘ (Battle of Wandiwash) में फ्रांसीसियों को बुरी तरह शिकस्त दी। बुसी को अंग्रेजी सेना ने कैद कर लिया। 1761 में ही फ्रांसीसियों से अंग्रेजों ने ‘पांडिचेरी’ को छीन लिया उसके पश्चात् जिन्जी तथा माहीं पर भी अंग्रेजों का कब्जा हो गया।

वांडीवाश का युद्ध फ्रांसीसियों के लिए निर्णायक युद्ध था। फ्रांसीसियों की समझ में यह बात पूर्ण रूप से आ चुकी थी कि वे कम से कम भारत में ब्रिटिश कम्पनी के रहते सफल नहीं हो सकते चाहे वह उत्तर-पूर्व हो या पश्चिम या फिर दक्षिण भारत। 1763 में सम्पन्न हुई पेरिस संधि के द्वारा अंग्रेजों ने चन्द्रनगर को छोड़ कर शेष अन्य प्रदेश, जो फ्रांसीसियों के अधिकार में 1749 तक थे, वापस कर दिये। इनके पास ये क्षेत्र भारत के आजाद होने तक रहे।

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फ्रांसीसियों की पराजय के प्रमुख कारण

फ्रांसीसियों की पराजय के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं जैसे—

  1. यूरोप के प्रति अधिक ध्यान: फ्रांसीसी अत्यधिक महत्वाकांक्षा के तहत यूरोप में अपनी प्राकृतिक सीमा इटली, बेलजियम तथा जर्मनी तक बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे थे, भारत के प्रति वे उतने गंभीर नहीं थे। फ्रांसीसी सरकार का यूरोपीय राजनीति में अधिक उलझना उनकी हार का एक मुख्य कारण बना।
  2. कम्पनियों का स्वरूप: दोनों कम्पनियों में गठन तथा संरक्षण की दृष्टि से काफी अंतर था। फ्रांसीसी कम्पनी जहाँ पूर्ण रूप से राज्य पर निर्भर थी, वहीं ब्रिटिश कम्पनी व्यक्तिगत स्तर पर कार्य कर रही थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी और स्वतंत्र इकाई थी, जबकि फ्रांसीसी कंपनी पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में थी जिससे निर्णय लेने में देरी होती थी।
  3. नौसेना की कमजोरी: फ्रांसीसी नौसेना अंग्रेजी नौसेना की तुलना में काफी कमजोर थी। समुद्र पर नियंत्रण न होने के कारण फ्रांस समय पर अपनी सेना को भारत में आर्थिक और सैन्य मदद नहीं पहुँचा पाया।
  4. आर्थिक स्थिति: भारत में बंगाल पर अधिकार कर अंग्रेजी कम्पनी ने अपनी स्थिति को आर्थिक रूप से काफी मजबूत कर लिया था, दूसरी ओर फ्रांसीसियों को पांडिचेरी से उतना लाभ कदापि नहीं हुआ जितना अंग्रेजों को बंगाल से हुआ।
  5. नेतृत्व का स्तर: डूप्ले तथा बुस्सी द्वारा फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व उतना उच्च स्तर का नहीं था जितना क्लाइव, साउण्डर्स व लारेन्स का नेतृत्व। डूप्ले के उत्तरदायित्व को भी यदि फ्रांसीसियों की पराजय का कारण माना जाय तो अतिशयोक्ति न होगा, वह राजनीतिक षडयंत्र में इतना उलझ गया था कि उसे वहाँ से वापस लौटना भी काफी कठिन मालूम हो रहा था और इन सबका सम्मिलित प्रभाव फ्रांसीसियों के भारतीय व्यापार पर पड़ा।

एक नजर में: प्रमुख घटनाएं, युद्ध और संधियां (Quick Revision Table)

निष्कर्ष (Conclusion)

निष्कर्षतः, भारत में फ्रांसीसियों का आगमन व्यापार के उद्देश्य से हुआ था, लेकिन यूरोपीय राजनीति और डूप्ले की महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें क्षेत्रीय राजनीति में धकेल दिया। यद्यपि फ्रांसिस मार्टिन और डूप्ले जैसे योग्य गवर्नरों ने भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य की नींव मजबूत करने का प्रयास किया, परंतु फ्रांसीसी कंपनी का पूर्णतः सरकारी नियंत्रण में होना, नौसेना की कमजोरी और बंगाल पर अंग्रेजों का आर्थिक कब्जा उनकी हार के सबसे बड़े कारण बने। वांडीवाश के युद्ध (1760) के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भारत में अब अंग्रेजों को चुनौती देने वाली कोई यूरोपीय शक्ति नहीं बची थी और फ्रांसीसियों का प्रभाव केवल कुछ सीमित क्षेत्रों (जैसे पांडिचेरी, माहीं, कारीकल) तक ही सिमट कर रह गया।

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  4. सतीश चंद्रा (Satish Chandra, 2018): आधुनिक भारत का इतिहास (Modern India). ओरिएंट ब्लैकस्वॉन (Orient BlackSwan).
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  6. बी. एल. ग्रोवर एवं अलका मेहता (B. L. Grover & Alka Mehta, 2018): आधुनिक भारत का इतिहास: एक नवीन मूल्यांकन (A New Look at Modern Indian History). एस. चांद पब्लिकेशन (S. Chand).

Dr. Om Prakash Singh, Assistant Professor and Head of History Department at Constituent Government College Thakurdwara

Dr. Om Prakash Singh

Assistant Professor & Head, Department of History

Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)

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