सम्राट हर्षवर्धन के इतिहास के स्रोत | Sources of Harshavardhana History in Hindi

 भारत के प्राचीन इतिहास में सम्राट हर्षवर्धन (7वीं शताब्दी ई.) एक प्रतिष्ठित शासक के रूप में जाने जाते हैं। उनके शासनकाल की जानकारी हमें अनेक स्रोतों से प्राप्त होती है — जिनमें बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित जैसी साहित्यिक कृतियाँ, चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत और विभिन्न अभिलेखीय प्रमाण शामिल हैं। इन सभी स्रोतों के माध्यम से हर्ष के प्रशासनिक कौशल, सांस्कृतिक योगदान तथा धार्मिक सहिष्णुता का स्पष्ट चित्र उभरकर सामने आता है। चित्र में हर्षकालीन सांस्कृतिक जीवन तथा विद्वत परंपराओं का सजीव परिदृश्य दर्शाया गया है। प्रस्तुत विश्लेषण में हर्षकालीन सांस्कृतिक जीवन तथा विद्वत परंपराओं के सजीव परिदृश्य को ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में स्पष्ट किया गया है।

परिचय (Introduction)

सातवीं शताब्दी में वर्धन वंश ( जिसे पुष्यभूति वंश भी कहा जाता है) का उदय, उत्तर भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह वंश भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसी वंश में शक्तिशाली सम्राट हर्षवर्धन हुआ।, जिसने गुप्तों के पतन के उपरान्त उत्तर भारत में कुछ समय के लिए विकेंद्रीकरण की शक्तियों को रोककर, एक बार पुनः उत्तर भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करने का प्रयास किया।

हर्षवर्धन की प्रशंसा एक साम्राज्य निर्माता, कुशल प्रशासक, धर्म, शिक्षा और साहित्य के संरक्षक के रूप में की जाती है। हर्षवर्धन निःसंदेह अपने वंश का ही नहीं बल्कि भारत के महानतम सम्राटों में से एक था।

हर्षवर्धन के इतिहास को जानने के लिए हमारे पास प्रचुर मात्रा में साहित्यिक एवं पुरातात्विक दोनों स्रोतों की उपलब्धता है, जिनका उल्लेख हम निम्नलिखित संदर्भों के अंतर्गत कर सकते है—-

(A) साहित्यिक स्रोत (Literary Sources)

हर्षवर्धन के इतिहास को जानने के लिए साहित्यिक स्रोत एक महत्वपूर्ण साधन है। जिसके अंतर्गत देशी (स्वदेशी/भारतीय) एवं विदेशी साहित्य को रख सकते है। इनके द्वारा हर्ष के इतिहास पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है।

1. देशी साहित्य (Indigenous Literature)

(i) हर्षचरित (Harshacharita by Banabhatta)

 देशी साहित्य में उनके दरबारी कवि बाणभट्ट का “हर्षचरित“ सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन है। वाणभट्ट ने अलंकारपूर्ण शब्दों मे प्रभाकरवर्द्वन के व्यक्तित्व, हर्षवर्द्धन के जन्म, उसकी बाल्यावस्था, राजश्री का विवाह, प्रभाकरवर्धन, राज्यवर्धन और गृहवर्मन की मृत्यु, हर्षवर्धन के राज्यारोहण, राज्यश्री की खोज एवं अन्य घटनाओं का वर्णन किया है।

हर्षचरित में तत्कालीन महत्वपूर्ण राज्यों, प्रशासन, और हर्ष की धार्मिक प्रवृत्तियों का भी उल्लेख है। अनेक विद्वान वाणभट्ट के विवरण को सत्य से दूर मानते है, परन्तु हर्षवर्द्धन का समकालीन होने से उसके विवरण में अलंकरण के साथ-साथ ऐतिहासिकता का भी पुट है। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी कमजोरी तिथिक्रम का अभाव है। वाणभट्ट के अन्य ग्रंथ “कादम्बरी” और “पार्वतीपरिणय” उतने अधिक महत्व के नहीं है, जितना कि हर्षचरित। 

(ii) कादम्बरी (Kadambari)

यह भी वाणभट्ट की गद्य रचना है। यह मुख्यतः एक काव्य/कथा ग्रंथ है, परन्तु इसके द्वारा हर्षकालीन धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्था पर विशेष प्रकाश पड़ता है।

(iii) हर्षवर्धन द्वारा लिखित ग्रंथ (Plays Written by King Harsha)

 हर्ष स्वयं अपना इतिहासकार था (अर्थात अपनी कृतियों में तत्कालीन युग का प्रतिनिधित्व करता था)। वह एक उच्च कोटि का विद्वान और लेखक था। उसकी गणना सफल कवि एवं नाट्यकारों में की जाती है। हर्ष के प्रसिद्ध ग्रंथ– नागानन्द, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली है। इनके द्वारा हर्षकालीन धार्मिक, सामाजिक तथा राजप्रासादों के जीवन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

(iv) आर्यमंजुश्रीमूलकल्प (Arya Manjusri Mula Kalpa)

 यह एक प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ है। सर्वप्रथम टी. गणपतिशास्त्री ने 1925 ई0 में प्रकाशित किया। इसमे 1000 श्लोक है। जिनके अंतर्गत ई0पू0 सातवी शताब्दी से आठवीं शताब्दी ई0 तक का प्राचीन भारत का इतिहास वर्णित है। महायान बौद्ध धर्म के इस ग्रंथ से भी हर्ष कालीन इतिहास जानने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है। (इसमें हर्ष का उल्लेख ‘ह’ अक्षर से किया गया है)।

2. विदेशी यात्रियों का विवरण (Foreign Travelers’ Accounts)

(i) ह्वेनसांग का यात्रा विवरण

विदेशी साहित्य में हर्षवर्द्धन के इतिहास को जानने के लिए चीनी यात्री ह्वेनसांग का यात्रा विवरण महत्वपूर्ण स्रोत है। ह्वेनसांग एक बौद्ध भिक्षु था। धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वह भारत आया था। वह 630 ई0 में यहां पहुंचा तथा 644 ई0 तक यहां रहा। उसने हर्षवर्द्धन से भेंट भी की। हर्षवर्द्धन के विषय मे, उसके दिग्विजय, प्रशासन, धार्मिक नीति का उल्लेख उसके ग्रंथसी0यू0की0 (Records of the western world) में मिलता है। इस ग्रंथ की रचना उसने चीन वापस पहुंचकर 646 ई0 में की। बाद में इस यात्रा विवरण के आधार पर ह्वई-ली/Hwui Li ने ह्वेनसांग की जीवनी (Life of Hsuan Tsang) लिखी। यद्यपि इसमे ह्वेनसांग द्वारा वर्णित अनेक बातों की पुनरावृत्ति है तथापि अनेक नये तथ्य भी प्रकाश में आते है।

(ii) इत्सिंग (Yijing / I-Tsing)

एक अन्य चीनी यात्री इत्सिंग था, जो 671 ई. से 695 ई.के बीच भारत मे रहा। उसने भी अपना यात्रा विवरण लिखा है। इनके यात्रा विवरण एवं अन्य चीनी स्रोतों से न सिर्फ हर्षवर्धन के शासन पर, बल्कि 7वी शताब्दी के भारतीय इतिहास एवं संस्कृति की अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इसका अंग्रेजी अनुवाद जापानी विद्वान जे. ताकाकासु ( J. Takakusu) ने  “A Record of the Buddhist Religion Provided in India and the Malay Archipelago” नाम से किया है।

(iii) अल-बरूनी (Al-Biruni)

यद्यपि अल-बरूनी मध्यकालीन विद्वान था, किंतु उसने प्राचीन साक्ष्यों का संदर्भ दिया है। यह एक मुस्लिम विद्वान था। फारस का यह विद्वान महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण के समय उसके साथ आया था। वह पहला मुस्लिम लेखक था, जिसने भारत की संस्कृति एवं परम्पराओ के बारे में विस्तृत अध्ययन किया। जिसका वर्णन उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “तहक़ीक़-ए-हिन्द” (Kitab-ul-Hind) में किया। इस ग्रंथ से हर्षकालीन इतिहास एवं संस्कृति पर भी प्रकाश पड़ता है।

(B) पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Sources)

साहित्यिक स्रोतों के अतिरिक्त हर्षवर्धन के इतिहास को जानने के लिए पुरातात्विक स्रोत भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमे हर्षवर्द्धन के दो महत्वपूर्ण अभिलेख (बासखेड़ा ताम्रपत्र, मधुबन ताम्रपत्र) पुलकेशिन द्वितीय का एहोल अभिलेख, समकालीन राजाओं के प्रशस्ति-पत्र,मोहरों/सिक्कों आदि को शामिल किया गया है:

1. बांसखेड़ा ताम्रपत्र (Banskhera Copper Plate – 628 AD)

 यह अभिलेख उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में बांसखेड़ा नामक स्थान पर मिला है। जिस पर हर्ष संवत 22 अर्थात 628 ई0 की तिथि अंकित है। इस लेख से पता चलता है कि हर्ष ने अहिच्छत्र भुक्ति के अंतर्गत अंगदीय विषय के पश्चिमी मार्ग से मिला हुआ मर्कटसागर ग्राम को भट्टबालचंद्र तथा भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मणों को दान दिया था।

इससे हर्षकालीन शासन के अनेक प्रदेशो तथा पदाधिकारियो के नाम ज्ञात होते है। साथ ही साथ राज्यवर्द्वन द्वारा मालवा के शासक देवगुप्त पर विजय तथा गौंड नरेश शशांक द्वारा उसकी हत्या की जानकारी इस अभिलेख में मिलती है।इस ताम्रपत्र पर हर्ष के स्वयं के सुंदर हस्ताक्षर ‘मम महाराजधिराज श्री हर्षस्य’ उत्कीर्ण हैं।

2. मधुबन ताम्रपत्र अभिलेख (Madhuban Copper Plate – 631 AD)

यह अभिलेख उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद (आजमगढ़) की घोषी तहसील के मधुबन नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। इस अभिलेख की भाषा संस्कृत तथा लिपि ब्राह्मी है। इस ताम्रपत्र अभिलेख में हर्ष संवत 25 अर्थात 631 ई0 की तिथि अंकित है। इसमें हर्षवर्द्धन के राज्यकाल की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओ और प्रशासनिक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है

3. एहोल अभिलेख (Aihole Inscription of Pulakeshin II)

चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख से भी इस वंश के संबंध में जानकारी मिलती है। जिसकी तिथि 634 ई. है। इसमें हर्ष और पुलकेशिन द्वितीय के मध्य होने वाले युद्ध का वर्णन है। इसमें पुलकेशिन द्वितीय द्वारा हर्ष की सेना को पराजित करने का दावा किया गया है औरहर्ष के ‘हर्ष’ (आनंद) के खो जाने का काव्यात्मक उल्लेख है।

इस विजय की पुष्टि बाद के निरपन, करनूल और तोगरचेडु दानपत्र अभिलेख से भी होती है। इस अभिलेख की रचना पुलकेशिन के दरबारी कवि रविकीर्ति ने की थी।

4. सिक्के एवं मुद्राएँ (Coins and Seals)

पुराविद कृष्णदत्त वाजपेयी ने हर्षकालीन एक स्वर्ण सिक्का प्रकाशित किया है, जिसके मुख भाग पर ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज श्रीहर्ष देव’ अंकित है। एवं पृष्ठ भाग पर ‘उमा महेश्वर’ की आकृति अंकित है (जो हर्ष के शैव मतानुयायी होने का प्रमाण देती है)।

इसके अतिरिक्त, नालंदा से मिट्टी की (मृण्मय) तथा सोनीपत (हरियाणा) से ताँबे की मोहरें प्राप्त हुई हैं। इन पर खुदे लेखों से महाराज राज्यवर्धन प्रथम से लेकर हर्षवर्धन तक की वंशावली मिलती है। सोनीपत से प्राप्त मोहरों में हर्षवर्धन नाम अंकित है।

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निष्कर्ष (Conclusion)

उपर्युक्त विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि हर्ष का इतिहास जानने के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं। उन साधनों के आधार पर इस महान सम्राट के शासनकाल के विषय में अनेक महत्वपूर्ण बातों का ज्ञान प्राप्त होता है। लेकिन देखा जाय तो ये सब तथ्य पूर्णतः प्रामाणिक नहीं हैं। जब तक अनुसंधान द्वारा उसके विषय में प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हो जाते,तब तक हर्ष के इतिहास को पूर्णतः प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है। लेकिन उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर यह आवश्यक कहा जा सकता है कि इस महान सम्राट का इतिहास गौरवशाली रहा होगा। जब हम बाणभट्ट के विवरण, ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत तथा बांसखेड़ा, मधुबन व एहोल जैसे अभिलेखों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हर्षवर्धन का काल प्राचीन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण युग था।

विद्यार्थियों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. हर्षवर्धन के इतिहास के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं?

उत्तर: हर्षवर्धन के शासनकाल की जानकारी हमें दो प्रकार के स्रोतों से प्राप्त होती है — साहित्यिक और पुरातात्त्विक।
साहित्यिक स्रोतों में वाणभट्ट की हर्षचरित और कादम्बरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त स्वयं हर्ष द्वारा लिखित नाटक रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागानन्द से भी उसके युग की झलक मिलती है।
पुरातात्त्विक साक्ष्यों में बांसखेड़ा ताम्रपत्र (628 ई.), मधुबन ताम्रपत्र (631 ई.), एहोल अभिलेख (634 ई.) और सोनीपत की ताम्र मुहरें प्रमुख हैं।

2. हर्षचरित से हर्ष के शासनकाल के बारे में क्या ज्ञात होता है?

उत्तर: वाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित हर्षवर्धन के जीवन की विस्तृत जीवनी के रूप में जानी जाती है। इसमें उसके परिवार, युवावस्था, युद्धों, धार्मिक नीतियों, शासन प्रणाली और दानशील स्वभाव का वर्णन किया गया है।
यद्यपि इसकी भाषा अत्यंत अलंकारपूर्ण है, फिर भी यह ऐतिहासिक दृष्टि से विश्वसनीय मानी जाती है क्योंकि लेखक स्वयं हर्ष का समकालीन था।

3. ह्वेनसांग के विवरण से हर्षकालीन भारत की क्या छवि उभरती है?

उत्तर: चीनी यात्री ह्वेनसांग लगभग 630 ईस्वी में भारत आया और लगभग 14 वर्षों तक यहाँ रहा। अपनी प्रसिद्ध रचना सी-यू-की (Records of the Western World) में उसने हर्षवर्धन के कन्नौज की धर्मसभा, प्रयाग के महामोक्ष परिषद, नालंदा विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण तथा तत्कालीन समाज का अत्यंत पारदर्शी और सजीव विवरण दिया है। उसके अनुसार, हर्षवर्धन एक न्यायप्रिय, उदार और धर्मनिष्ठ शासक था, जो सभी मतों का सम्मान करता था।

4. बांसखेड़ा और मधुबन अभिलेखों से क्या जानकारी प्राप्त होती है?

उत्तर: बांसखेड़ा अभिलेख (628 ई.) और मधुबन अभिलेख (631 ई.) हर्षकाल के महत्वपूर्ण प्रशासनिक दस्तावेज हैं। इनसे ज्ञात होता है कि हर्ष ने विभिन्न क्षेत्रों में भूमि दान किए तथा उसके शासन में अनेक अधिकारी और पदनाम प्रचलित थे। इन अभिलेखों से स्पष्ट है कि हर्ष का शासन संगठित, सुव्यवस्थित और दानशील प्रवृत्ति वाला था।

5. साहित्य के क्षेत्र में हर्षवर्धन का योगदान क्या था?

उत्तर: हर्षवर्धन स्वयं एक कुशल लेखक और विद्वान शासक था। उसने संस्कृत भाषा में तीन नाटक — रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागानन्द — की रचना की। इन नाटकों के माध्यम से हर्षकालीन समाज, संस्कृति और नैतिक मूल्यों की झलक मिलती है। इससे यह सिद्ध होता है कि हर्ष केवल एक वीर सम्राट ही नहीं, बल्कि एक कला-प्रेमी और साहित्य-संवेदनशील व्यक्ति भी था।

  1. शर्मा, रामशरण (R.S. Sharma) (2007): भारत का प्राचीन इतिहास (Ancient India), राजकमल प्रकाशन / एनसीईआरटी, नई दिल्ली।
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Dr. Om Prakash Singh, Assistant Professor and Head of History Department at Constituent Government College Thakurdwara

Dr. Om Prakash Singh

Assistant Professor & Head, Department of History

Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)

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