भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 में उत्तर प्रदेश के दलित सेनानियों का योगदान अविस्मरणीय रहा है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभ ही उत्तर प्रदेश से हुआ, जिसने कालान्तर में भारत की स्वतंत्रता के मार्ग को प्रशस्त किया। अभी तक भारतीय समाज में यह धारणा रही है कि दलित समाज के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए लड़ी गई किसी भी लड़ाई में योगदान नहीं दिया है। स्वतंत्रता के बाद यह वर्ग केवल अपनी सुविधाओं, आरक्षण की पूर्ति और सत्ता में भागीदारी ही माँगता रहा है; इस वर्ग ने आजादी के लिए कोई त्याग या बलिदान नहीं किया—मेरे द्वारा प्रस्तुत यह लेख ऐसे लोगों की इस धारणा को निर्मूल कर देगा। यह लेख दर्शाता है कि दलित समाज के लोगों ने न केवल 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम में, बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ी गई प्रत्येक लड़ाई में अन्य समुदायों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस लेख में केवल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलित सेनानियों के योगदान को प्रस्तुत किया गया है।

मुख्य शब्द (Keywords): दलित, 1857 का संग्राम, उत्तर प्रदेश का इतिहास, मातादीन भंगी, वीरांगना झलकारी बाई, ऊदा देवी पासी, बांके चमार, स्वतंत्रता सेनानी।
परिचय (Introduction)
उत्तर प्रदेश भारत का एक विशिष्ट राज्य है। प्राचीन समय में “ब्रह्मर्षि-देश” के नाम से ज्ञात इस राज्य को जनवरी 1950 ई. में “उत्तर प्रदेश” का नाम प्राप्त हुआ था। इसका वर्तमान भौगोलिक विस्तार 23°52′ उत्तरी अक्षांश से 31°28′ उत्तरी अक्षांश तथा 77°30′ पूर्वी देशान्तर से 84°39′ पूर्वी देशान्तर तक है।
गंगा-यमुना दोआब में अवस्थित इस हिन्दी भाषी राज्य को उत्तर वैदिक काल में ख्याति प्राप्त रही है। यहाँ ‘काशी, कोसल एवं वत्स’ जैसे महाजनपद एवं ‘श्रावस्ती, साकेत, कौशाम्बी एवं वाराणसी’ जैसे बुद्धकालीन महानगर स्थित थे। गुप्त शासकों, सम्राट हर्ष, तुर्कों, मुगलों एवं अंग्रेजों—सभी ने इसके महत्त्व को समझा था। यहीं पर जैन, बौद्ध एवं सनातन हिन्दू धर्म का पुष्पन-पल्लवन हुआ था। यहाँ सारनाथ, कुशीनगर, पावा, अयोध्या, प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन, देवा शरीफ, फतेहपुर सीकरी जैसे तीर्थ स्थल एवं वशिष्ठ, विश्वामित्र, एकलव्य तथा कबीरदास, सूरदास एवं तुलसीदास जैसी विभूतियाँ हुई हैं।
यहाँ की सामाजिक व्यवस्था वर्ण व्यवस्था से प्रभावित रही है। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य को छोड़कर शूद्र की स्थिति निम्न मानी जाती थी। कालांतर में अनेक वर्णसंकर जातियों के सम्मिलन से निम्न वर्ग की जनसंख्या निरंतर बढ़ती गई एवं चाण्डाल, डोम, हादी इत्यादि की अस्पृश्यों में गणना होने लगी। आधुनिक काल तक आते-आते समाज का स्पष्टतः उच्च व निम्न वर्ग में विभाजन हो चुका था। निम्न वर्गीय जातियों को ही प्रायः दलित जातियों के रूप में अभिहीत किया गया है।
“दलित” शब्द की अवधारणा:
‘दलित’ शब्द अंग्रेजी के ‘Depressed’ का समानार्थी है, जिसका अर्थ दबाया गया या नीचे किया गया होता है। अभिप्राय यह है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से जो जातियां पीछे रह गईं और जिनका समुचित विकास न हो सका, वे दलित जातियां मानी गईं। डॉ. माता प्रसाद जी ने (2007 में) दलित जातियों में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों, घुमन्तू एवं बंजारा जातियों तथा पिछड़ी एवं अत्यधिक पिछड़ी जातियों को सम्मिलित किया है। इस प्रकार ये लगभग 50% भारतीय जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती हैं।
शोध के मुख्य उद्देश्य (Research Objectives)
- उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों का विश्लेषण करना।
- 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश के दलितों के योगदान पर प्रकाश डालना।
- उत्तर प्रदेश के दलितों की भूमिका का जातिगत, धार्मिक एवं लैंगिक आधारों पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना।
- उत्तर प्रदेश के दलितों पर तत्कालीन राजनीतिक एवं राष्ट्रीय घटनाओं के प्रभाव का अध्ययन करना।
- उत्तर प्रदेश के दलितों पर अंग्रेजी नीतियों एवं कूटनीतिक चालों के प्रभाव का मूल्यांकन करना।
1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि और दलित चेतना
भारत में सदियों से जाति-प्रथा, छुआ-छूत, अस्पृश्यता, असंगठन तथा पारस्परिक द्वेष-भाव के परिणामस्वरूप विदेशियों ने यहाँ राज किया। सेठ अमीरचंद और मीर जाफर जैसे देशद्रोहियों ने भारत को गुलाम बनाये रखने में अंग्रेजों का साथ दिया। दलित (अछूत) वर्ग ने अपनी दीन-हीन दशा में जीवन यापन करते हुए भी मातृभूमि के लिए कभी सौदा नहीं किया। देशद्रोह का ऐसा एक भी आरोप अछूत वर्ग पर कभी नहीं लगा। समस्त भारतीय समाज के साथ वह भी पूर्ववत दासता भरी जिंदगी व्यतीत करता रहा। देश में जब भी आवश्यकता पड़ी, इस वर्ग ने आगे बढ़कर देशहित में अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया।
मई 1857 से प्रारम्भ होकर 1858 ई. तक चले भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कितने भारतीय शहीद हुए, इसकी सटीक गणना करना आसान नहीं है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह है कि स्वाधीन भारत में अनेक सरकारों के दौर आते रहे और जाते भी रहे, परन्तु कोई ठोस एवं सफल प्रयास इस ओर नहीं हुआ। लगभग 16 महीनों तक चले इस विद्रोह के बारे में कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने 28 लेख लिखे। कार्ल मार्क्स ने 15 जुलाई 1857 को ‘न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून‘ में लिखा था कि “यह पहली बार हुआ है कि देशी फौजों ने अपने यूरोपीय अफसरों को मार डाला है।”
इस महासंग्राम की पहली और सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उत्तर प्रदेश की दलित-दमित जनता ने अंग्रेजों से आमने-सामने लोहा लिया।
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उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलित स्वतंत्रता सेनानी
अमर शहीद मातादीन भंगी (दलित चेतना की पहली चिंगारी)

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मातादीन भंगी का विशेष महत्व है। यदि मंगल पांडेय इस क्रांति के शोले थे, तो मातादीन भंगी इसकी प्रथम चिंगारी थे। 10 मई 1857 ई. की क्रांति की मशाल कैसे जल उठी? इसके मूल में बैरकपुर छावनी (कलकत्ता से 16 मील दूर) की एक ऐतिहासिक घटना है।
बैरकपुर छावनी के कारतूस कारखाने में काम करने वाले कर्मचारी अछूत समझे जाने वाले समुदाय से थे। एक दिन एक प्यासे अछूत कर्मचारी (मातादीन) ने एक कर्मकांडी ब्राह्मण सैनिक से पानी पीने के लिए लोटा माँगा। सैनिक ने नीच जाति का समझकर लोटा देने से इंकार कर दिया। अपमानित होकर मातादीन ने कहा:
“बड़ा आया है ब्राह्मण का बेटा! जिन कारतूसों का तुम प्रयोग करते हो, उन पर गाय और सुअर की चर्बी लगाई जाती है और उन्हें तुम अपने दाँतों से काटकर बंदूक में भरते हो। उस समय तुम्हारा ब्राह्मणत्व कहाँ चला जाता है?”
इस बात ने ब्राह्मण सैनिक और पूरी छावनी की आँखें खोल दीं। यह बात आग की तरह फैल गई और 1 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। मंगल पांडेय का कोर्ट मार्शल हुआ और 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दी गई। आगे चलकर मातादीन भंगी को भी मातृभूमि की रक्षा और विद्रोह की प्रेरणा देने के आरोप में अंग्रेजों द्वारा शहीद कर दिया गया।
शहीद चेतराम जाटव एवं बल्लू मेहतर (एटा-कासगंज)
26 मई 1857 को सोरों (एटा/कासगंज क्षेत्र) में क्रांति की ज्वाला भड़की। इसमें चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर ने अद्भुत शौर्य दिखाया। उनके साथ सदाशिव मेहरे, रामनाथ तिवारी, चतुर्भुज वैश्य, सदासुखराम सक्सेना, विशम्भर कोठेदार, द्वारिका प्रसाद एवं हाफिज रजब अली भी थे।
कैप्टन फिलिप्स की सेना को इन्होंने पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। किंतु आगरा और मैनपुरी से अतिरिक्त अंग्रेजी सेना आ जाने के कारण क्रांति विफल हो गई। अंग्रेजों ने चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर को पेड़ से बाँधकर गोलियों से उड़ा दिया तथा अन्य सहयोगियों को कासगंज में फाँसी दे दी।
अमर शहीद बांके चमार (जौनपुर)
जौनपुर जिले की मछलीशहर तहसील के ग्राम कुंवरपुर निवासी बांके चमार, बागी नेता हरिपाल सिंह के प्रमुख सहयोगी थे। क्रांति विफल होने पर अंग्रेजों द्वारा घोषित 18 प्रमुख बागियों में बांके चमार का नाम शीर्ष पर था, जिन पर ₹50,000 का इनाम रखा गया था। गिरफ्तारी के पश्चात इस वीर सेनानी को फाँसी दे दी गई।
वीरा पासी (रायबरेली-मुरारमऊ)
रायबरेली के मुरारमऊ/डौंडिया खेड़ा के राजा बेनी माधव सिंह के अंगरक्षक वीरा पासी अत्यंत साहसी और बुद्धिमान थे। अंग्रेजों की कड़ी सुरक्षा के बावजूद वीरा पासी ने राजा बेनी माधव को जेल से छुड़ा लिया। अंग्रेजों ने वीरा पासी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर ₹50,000 का इनाम घोषित किया था।
लोचन मल्लाह (कानपुर)
27 जून 1857 को कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध भीषण विद्रोह हुआ। जब अंग्रेज नावों द्वारा इलाहाबाद भागने का प्रयास कर रहे थे, तब लोचन मल्लाह ने अपनी सूझ-बूझ और नाव संचालन की चतुरता से क्रांतिकारियों (टीका सिंह, अजीमुल्लाह, तांत्या टोपे) की मदद की और अंग्रेजों को घेरने में सफलता प्राप्त की।
1857 के संग्राम में दलित वीरांगनाओं का योगदान
1857 के स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख दलित वीरांगनाएँ
| वीरांगना | जाति / वर्ग | मुख्य क्षेत्र | योगदान और ऐतिहासिक महत्व |
| झलकारी बाई | कोरी | झाँसी | रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल एवं महिला सेना ‘दुर्गा दल’ की सेनापति; रानी को सुरक्षित निकालने के लिए स्वयं रानी का वेश धरकर अंग्रेजों से लड़ा। |
| ऊदा देवी पासी | पासी | लखनऊ | सिकंदर बाग युद्ध (16 नवं 1857) में पीपल के पेड़ पर चढ़कर अकेले ही 36 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। |
| महाबीरी देवी | भंगी (वाल्मीकि) | मुजफ्फरनगर | 22 क्रांतिकारी महिलाओं का सशस्त्र दस्ता बनाया और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। |
| जगरानी पासी | पासी | उजरियांव (लखनऊ) | सेमर के वृक्ष के नीचे अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा और मातृभूमि की रक्षा में शहीद हुईं। |
| आशा देवी | गुर्जर / दलित | मुजफ्फरनगर | मुजफ्फरनगर क्षेत्र में महिलाओं को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की कमान संभाली और शहीद हुईं। |
| शोभा देवी | वाल्मीकि/दलित | अवध / लखनऊ | बेगम हज़रत महल की सेना में महिला दस्त का नेतृत्व किया और बेलीगारद के घेराव में भाग लिया। |
अमर शहीद वीरांगना झलकारी बाई (झांसी)
कोरी जाति में जन्मीं झलकारी बाई का चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से अत्यधिक मिलता-जुलता था। उनके पति पूरन कोरी राजदरबार में सैनिक थे। जब अंग्रेजों ने झांसी के किले को घेरा, तब झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मीबाई को सुरक्षित बाहर निकालकर स्वयं रानी का वेश धारण कर लिया और अंग्रेजों से लोहा लिया ताकि रानी बिठूर पहुँच सकें। अंततः लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं।
अमर वीरांगना महाबीरी देवी (मुजफ्फरनगर)
मुजफ्फरनगर जिले के मुंडभर गाँव की महाबीरी देवी ने दलित महिलाओं को संगठित कर 22 सशस्त महिलाओं का एक दस्ता बनाया। जब अंग्रेजों ने मुजफ्फरनगर पर आक्रमण किया, तब महाबीरी देवी और उनकी 22 अज्ञात दलित वीरांगना साथियों ने अंग्रेजी सेना पर धावा बोल दिया और कई अंग्रेज सैनिकों को मारकर वीरगति प्राप्त की।
वीरांगना ऊदा देवी पासी एवं जगरानी पासी (लखनऊ)

लखनऊ में बेगम हजरत महल की महिला सैन्य टुकड़ी में पासी जाति की ऊदा देवी शामिल थीं। 16 नवंबर 1857 को सिकंदर बाग (लखनऊ) के युद्ध में ऊदा देवी एक पीपल के पेड़ पर छिपकर बैठ गईं और ऊपर से ही 36 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया।
इसी प्रकार उजरियांव (लखनऊ) की जगरानी पासी ने सेमर के वृक्ष के नीचे अंग्रेजों से जमकर मुकाबला किया और घायल होकर शहीद हुईं।
पासी समुदाय का सामूहिक योगदान एवं बेलीगारद का युद्ध
लखनऊ में रेजीडेंसी (बेलीगारद) के घेराव के समय चेतराम रैदास और पासी योद्धाओं ने सुरंग बिछाने की कला में अद्भुत कौशल दिखाया। 10 अगस्त 1857 को जनरल बरकत अहमद के नेतृत्व में पासी लड़ाकों ने बेलीगारद पर भीषण आक्रमण किया। बेलीगारद की लड़ाई में 220 देशभक्त शहीद हुए एवं 150 घायल हुए, जिनमें अधिकांश पासी समुदाय के अज्ञात योद्धा थे।
निष्कर्ष (Conclusion)
इतिहासकारों की उपेक्षा के कारण 1857 की क्रांति में दलित समाज के अपार बलिदान को लंबे समय तक दबाया गया। यदि भारतीय इतिहास से दलितों के इस योगदान को निकाल दिया जाए, तो स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अधूरा रहेगा। धरती पुत्र दलित वर्ग ने अपनी श्रमशक्ति और रक्त से मातृभूमि की रक्षा की है। 1857 के संग्राम में अपने प्राण न्यौछावर कर इस वर्ग ने सिद्ध किया कि राष्ट्रप्रेम किसी विशेष वर्ग की बपौती नहीं, बल्कि भारत के प्रत्येक नागरिक का परम धर्म है।
विद्यार्थियों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बैरकपुर छावनी के कारतूस कारखाने में काम करने वाले अछूत समुदाय के कर्मचारी मातादीन भंगी ने कारतूसों में गाय व सुअर की चर्बी के प्रयोग का पर्दाफाश किया। इस बात ने ब्राह्मण सैनिक और पूरी छावनी की आँखें खोल दीं। यह बात आग की तरह फैल गई और 1 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया ।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका में रहने के कारणझांसी की वीरांगना झलकारी बाई (कोरी), मुजफ्फरनगर की महाबीरी देवी (भंगी), तथा लखनऊ की ऊदा देवी पासी एवं जगरानी पासी दलित विरंगानाएं प्रमुख हैं।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम जौनपुर के बांके चमार और रायबरेली के राजा बेनी माधव के अंगरक्षक वीरा पासी ने अंग्रेजों की अधिक परेशान किया था। जिस कारण दोनों पर अंग्रेजों ने ₹50,000-50,000 का भारी-भरकम इनाम घोषित किया था।
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Dr. Om Prakash Singh
Assistant Professor & Head, Department of History
Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)
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