शोध सार (Abstract)
‘दलित’ विचार ने अकादमिक जगत में एक गहरी पहचान बनाई है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास के पथ पर चमार और जाटव समुदाय की प्रगति को कई अध्ययनों में प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में चमार और जाटव समुदायों के सामाजिक-राजनीतिक चेतना (जागृति) ने संयुक्त प्रांत में चमार और जाटव महासभा के विभिन्न पहलुओं पर शोध करने के लिए विद्वानों को प्रेरित किया है। यह शोध-पत्र इन महासभाओं के ऐतिहासिक ढाँचे और संगठनात्मक संरचना का विश्लेषण करता है। इसके साथ ही, यह आलेख संयुक्त प्रांत (United Provinces) में दलितों के सामाजिक विकास हेतु इन महासभाओं द्वारा उठाए गए शुरुआती कदमों तथा वंचित और पिछड़े समुदायों को जोड़ने के लिए किए गए प्रयासों को रेखांकित करता है।

1. प्रस्तावना: बीसवीं सदी का सामाजिक चेतना काल और वंचित चेतना का उदय
1.1 सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों और राष्ट्रीय संघर्ष का अंतर्संबंध
जैसा कि कहा गया है, शुरुआती सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने लोगों को जागरूक करके और समाज में सुधार लाकर राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। हालाँकि, यह भी उतना ही सत्य है कि राष्ट्रीय संघर्ष ने बदले में सामाजिक सुधार आंदोलनों के उद्भव में योगदान दिया। इनमें से लगभग सभी आंदोलन 20वीं सदी में निचली जातियों के उत्थान के लिए काम करने हेतु उभरे।
1.2 शिक्षित वर्ग की अपेक्षाएं और आधुनिक धार्मिक सुधारों का प्रभाव
जातिगत आंदोलनों के उदय का एक बड़ा कारण निचली और पिछड़ी जातियों के शिक्षित लोगों के मन में पनपती शिकायतें थीं। अपनी स्थिति में सुधार करने के लिए, भक्ति और नव-वेदांत आंदोलनों ने हिंदू सुधार संगठनों की गतिविधियों को अपनाकर काम किया। 1890 के दशक में के. रंगा राव द्वारा निचली जातियों के लिए स्कूल शुरू किए गए थे। निचली जाति के व्यक्तियों को शिक्षा की सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रार्थना समाज द्वारा एक स्वतंत्र व्यवस्था के रूप में ‘डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन सोसाइटी ऑफ इंडिया‘ शुरू की गई थी। ‘डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन सोसाइटी ऑफ मद्रास’ ने 1909 में काम करना शुरू किया।
1.3 संस्कृतिकरण की प्रक्रिया और क्षेत्रीय संदर्भ
जातिगत आंदोलन वंचित जातियों को पारंपरिक रूप से श्रेष्ठ समूहों के रीति-रिवाजों और आचरण का पालन करके उच्च स्थिति का दावा करने में मदद करके उनकी स्थिति को ऊपर उठाने के लिए भी उभरे। इन आंदोलनों, जिन्हें संस्कृतिकरण आंदोलन कहा जाता है, की शुरुआत तमिलनाडु के नाडारों और पल्लारों (जिन्होंने क्षत्रिय स्थिति का दावा किया), केरल के इझवाओं और नायरों और जौनपुर के चमारों (जिन्होंने शिव-नारायण संप्रदाय के तरीकों का पालन किया) के बीच हुई।
1.4 ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देने वाले कट्टरपंथी प्रयास
कट्टरपंथी (Radical) आंदोलन ब्राह्मणों के प्रभुत्व को चुनौती देने और पारंपरिक जाति व्यवस्था के मूल आधार पर सवाल उठाने की इच्छा से उत्पन्न हुए।
1.5 औपनिवेशिक नीतियां, वैधानिक बदलाव और जातीय ध्रुवीकरण
ब्रिटिश शासन ने एक तरफ तो जातियों के उत्थान के आंदोलनों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से प्रोत्साहित किया, और दूसरी तरफ ज़मींदारों और सामंती वर्गों के साथ गठबंधन बनाकर तथा धर्म में अहस्तक्षेप के माध्यम से जातिगत सामंतवाद को मजबूत किया। इसकी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति और 1890 की जनगणना जिसने जातियों को वर्गीकृत किया, ने बहुत अधिक भ्रम और जातिगत विद्रोह पैदा किए। 1850 के ‘कास्ट डिसएबिलिटीज़ रिमूवल एक्ट‘ और 1872 के ‘स्पेशल मैरिज अमेंडमेंट एक्ट‘ ने जातिगत कठोरता को तोड़ने में मदद की।1
1.6 जातियों की स्थानीय पंचायतें और सुधारवादी रणनीतियाँ

1920 के बाद दलित जागरूक हुए और यू.पी. के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी जाति पंचायतें (सभा/एसोसिएशन) बनाने लगे। इस सभा ने कई बार अपनी जाति की बैठक आयोजित की। उस सम्मेलन द्वारा, उन्होंने शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया, बाल विवाह और दहेज प्रथा को प्रतिबंधित किया और साथ ही एसोसिएशनों को मजबूत किया। उन्होंने सरकार को समाज की समस्याओं के संबंध में याचिका (Petition) भेजी और दलितों को मृत पशुओं को न खाने की सलाह दी। देश के कई स्थानों पर रविदास समाज द्वारा संत रविदास की जयंती मनाई गई और उन्होंने रविदास महासभा, पासी महासभा, जाटव महासभा आदि में भाग लेने में रुचि ली। ये महासभाएँ उत्तर प्रदेश के गाँवों और शहरों के विभिन्न क्षेत्रों में बनाई गई थीं।2
2. चमार महासभा:अपनी पहचान का निर्माण और ब्रिटिश शासन का विरोध
2.1 अस्पृश्यता उन्मूलन और इतिहासलेखन की सीमाएं
दलित राजनीतिक संघर्ष का पहला चरण पहचान के प्रश्न और मुक्ति की उन रणनीतियों पर केंद्रित था, जो सवर्ण हिंदुओं द्वारा उन पर थोपी गई “अस्पृश्यता” की स्थिति से उन्हें उबार सकें। हम ऐसे संघर्षों के बारे में कैसे लिखते हैं और इतिहासकारों के लिए इनके क्या अर्थ हैं? सवर्ण हिंदू इतिहासकारों की पीढ़ियाँ सामाजिक और आर्थिक स्थितियों, उपनिवेशवाद विरोधी तथा वर्ग संघर्षों पर लिखने की तो अभ्यस्त रही हैं, लेकिन उन्हें कभी ‘चमार‘ कहे जाने के अपमान का सामना नहीं करना पड़ा।
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2.2 आर्य समाज, क्षत्रियता का दावा और बेगारी का विरोध
चमार इतिहासों ने प्रभुत्वशाली हिंदू जातियों के समान “शुद्ध” क्षत्रिय स्थिति का दावा करके अपने अतीत को पुनर्प्राप्त और पुनरुद्धार करने के लिए हिंदू पौराणिक परंपराओं का सहारा लिया। 20वीं शताब्दी के दशक में चमार राजनीति ने हिंदू धर्म के भीतर, विशेष रूप से आर्य समाज द्वारा प्रचारित धर्म के रूप के भीतर, अपनी स्थिति को लेकर बातचीत की। चमारों ने अपनी “अस्पृश्यता” के चिह्नों पर सवाल उठाए, विशेष रूप से बेगारी (वैतनिक या अमानवीय श्रम) पर, जो कृषि कार्य, चमड़े के काम और ज़मींदारों व सरकारी अधिकारियों की व्यक्तिगत सेवा के रूप में ली जाती थी।
पहचान का यह चमार दावा और चमारों की चिंताओं को संबोधित करने के लिए नए हिंदू अनुष्ठानों व मुहावरों को गढ़ने में आर्य समाज की भूमिका—इस धारणा ने 20वीं सदी के पहले दो दशकों के दलित आंदोलन पर भारतीय इतिहासलेखन को चित्रित किया है। पहला, लगभग सभी उदारवादी और कट्टरपंथी इतिहासकार यह मान लेते हैं कि दलित इतिहास की शुरुआत हिंदू धर्म की आलोचना करने और मूल निवासी होने के दावे से होनी चाहिए। दूसरा, यह भी मान लिया जाता है कि आर्य समाज जैसे हिंदू संगठन दलितों को हिंदू समुदाय का हिस्सा बनाने के लिए उनका ‘हिंदूकरण’ करना चाहते थे। ये दोनों ही धारणाएँ वास्तविक चमार लेखन की उपेक्षा करती हैं और चमारों द्वारा अपने स्वयं के इतिहास और राजनीति में तय किए गए एजेंडे को गंभीरता से लेने में विफल रहती हैं। 1930 के दशक तक, चमार कार्यकर्ताओं ने मुद्दों की एक नई श्रृंखला उठाई थी और एक प्रभावी दलित राजनीतिक शक्ति का गठन किया था।3
2.3 बीसवीं सदी के प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथ और जनसांख्यिकीय संरचना
20वीं सदी के पूर्वार्द्ध के दौरान उत्तर प्रदेश में इतिहासों की एक श्रृंखला लिखी और प्रकाशित की गई:
- यू. बी. एस. रघुवंशी का श्री चंवर पुराण (1910 और 1916 के बीच),
- जायसवार महासभा का सूर्यवंश क्षत्रिय जायसवार सभा (1926),
- पं. सुंदर लाल सागर का यादव जीवन, और
- राम नारायण यादवेंदु का यादवंश का इतिहास (1942)।
सागर और यादवेंदु, जो जाटव थे, उन्होंने अपने वंश को भगवान कृष्ण के यादव कबीले से जोड़कर जाटव क्षत्रिय स्थिति का दावा किया। जाटव चमार मुख्य रूप से पश्चिमी यूपी में केंद्रित थे, जिनकी बड़ी उपस्थिति मेरठ, आगरा, मुरादाबाद और बदायूँ ज़िलों में थी। जायसवार चमार पूर्वी यूपी में प्रभुत्वशाली थे, जहाँ वे चंवर राजवंश से वंशानुक्रम का दावा करके क्षत्रिय स्थिति का दावा करते थे। जाटव और जायसवार दो प्रमुख चमार जातियाँ थीं, और मिलकर वे यूपी की चमार जनसंख्या का दो-पांचवां हिस्सा (40%) थीं।4
2.4 समाचार पत्रों की भूमिका और औपनिवेशिक पुलिस रिपोर्टिंग
1920 के दशक के चमार इतिहासों में उल्लिखित विषयों का यूपी के चमारों के बीच एक व्यापक सामाजिक आधार था। साप्ताहिक पुलिस रिपोर्ट 1920 और 1928 के बीच चमार विरोध बैठकों का प्रमाण देती हैं। दुर्भाग्य से, 1922 से पहले की अवधि के लिए ऐसा कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। पुलिस की साप्ताहिक रिपोर्टों में विस्तार से वर्णित चमार विरोध प्रदर्शनों को राष्ट्रवादी प्रेस में भी नोट किया गया था। ‘प्रताप‘, ‘अभ्युदय‘ और ‘आज‘ जैसे हिंदी भाषा के समाचार पत्रों ने इन पर रिपोर्ट देना तब शुरू किया जब हिंदू सुधार संगठनों ने दलितों के बीच अपने अभियान शुरू किए।
2.5 शुद्धतावादी सांस्कृतिक मानक और सामाजिक पुनर्गठन
चमार आंदोलन उत्तर भारत में 20वीं सदी के दलित संघर्ष के प्रथम चरण का एक संकेतक है। इस चरण की एक विशिष्ट विशेषता चमारों द्वारा क्षत्रिय स्थिति के अपने दावे के तहत शुद्ध हिंदू अनुष्ठानों और प्रथाओं को अपनाना था, जैसे कि शाकाहार और बीफ (गोमांस) खाने व चमड़े का काम करने जैसी अशुद्ध मानी जाने वाली प्रथाओं का त्याग करना। 1929 में सुंदर लाल सागर ने पश्चिमी यूपी में चमारों के चल रहे संघर्षों का उल्लेख किया, जिससे उन्हें अपनी स्थिति बदलने में सफलता की उम्मीद थी।5
2.6 प्रांतीय प्रसार: मुरादाबाद से बस्ती तक संगठनात्मक ढांचा
चमार सभाओं (एसोसिएशनों) और पंचायतों (परिषद) ने पूर्वी और पश्चिमी दोनों यूपी में ऐसे सम्मेलनों का आयोजन किया। मुरादाबाद, बुलंदशहर, मेरठ, बिजनौर, सहारनपुर, जौनपुर और बस्ती में ऐसी बैठकों ने चमार महासभाओं को स्थापित करने का एक संदर्भ प्रदान किया।6
2.7 पश्चिमी उत्तर प्रदेश में असंतोष की लहर
यद्यपि राज्य के कई हिस्सों में चमार विरोध प्रदर्शन स्पष्ट थे, पुलिस रिपोर्ट दर्शाती हैं कि सबसे संगठित और निरंतर आंदोलन पश्चिमी यूपी में हुआ। ये विरोध पहली बार 1920 में मेरठ, मुरादाबाद, बुलंदशहर, बदायूँ, बिजनौर, बरेली, पीलीभीत, आगरा और अलीगढ़ ज़िलों में देखे गए थे। 1923-24 तक, चमार विरोध का साक्ष्य मध्य यूपी के सहारनपुर, एटा, मैनपुरी, मथुरा, देहरादून, लखनऊ, उन्नाव, खीरी, सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ ज़िलों में भी दिखाई दिया। पूर्वी यूपी में बनारस, जौनपुर, बस्ती और गोरखपुर में भी यह देखा गया।7
2.8 जनसभाएं, आत्मनिर्भर वित्तपोषण और राजनीतिक चेतना
लेकिन पुलिस रिपोर्ट पश्चिमी यूपी में बैठकों और गतिविधियों को एक “आंदोलन” के रूप में वर्णित करती हैं। मुरादाबाद में हम “चमारों के सामान्य विद्रोह” के बारे में सुनते हैं; बुलंदशहर में हमें बताया जाता है कि “वहाँ शायद ही कोई बड़ा गाँव हो जहाँ चमारों के साथ समस्या न हो;” और मेरठ में यह नोट किया गया कि “चमार आंदोलन लगातार परेशानी पैदा कर रहा है।8
इस क्षेत्र में आंदोलन की एक उल्लेखनीय विशेषता सुधार गतिविधियों, विशेष रूप से चमार बच्चों के लिए स्कूलों को वित्तपोषित करने के लिए बैठकों के दौरान चंदे का संग्रह था। 1922 और 1923 में इन बैठकों में एकत्र किया गया धन मुरादाबाद में ₹200 से ₹1000 तक था और रामपुर में यह ₹1500 तक था। बैठकों में उपस्थिति काफी अच्छी प्रतीत होती है, जिसमें औसतन 500 या 600 लोग उपस्थित होते थे और कभी-कभी यह संख्या 1000 या 2000 तक पहुँच जाती थी। एक मामले में 1924 में बिजनौर में सात हजार चमार एकत्र हुए; इस बैठक में उन्होंने कांग्रेस की स्वराज की मांग की आलोचना की। बुलंदशहर, देहरादून और कुमाऊँ में भी इसी तरह के प्रस्ताव पारित किए गए। बाबू गुरु प्रसाद नामक एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने विभिन्न सुधार गतिविधियों को शुरू करने के लिए फरवरी 1921 में गोरखपुर ज़िले की बांसगाँव तहसील में पांच सौ चमारों के सम्मेलन में एक पंचायत का आयोजन किया।9
2.9 व्यसन मुक्ति और आहार संबंधी सुधारों का आह्वान
चमार सभाएँ मांस और शराब से दूर रहने की सबसे मुखर समर्थक थीं। अपने उपन्यास कर्मभूमि में, प्रेमचंद ने चमारों की अस्पृश्यता के लिए तीन कारकों की पहचान की: दारू-शराब, मुर्दा-मांस और चमड़ा। मुख्य पात्रों में से एक, अमरकांत, जो एक सवर्ण हिंदू और कांग्रेस कार्यकर्ता है तथा हरिद्वार में कहीं एक रैदासी गाँव में बसता है, चमारों को हिंदुओं की तरह शुद्ध स्थिति प्राप्त करने के तरीके के रूप में पहले दो को छोड़ने के लिए मनाता है।10
2.10 पूर्वी व पश्चिमी जिलों में जातिगत संकल्प तथा दंड विधान
पूर्वी यूपी में, चमारों की दलित जाति पंचायतों ने न केवल शराब और गांजे से दूर रहने के बल्कि मांस और मछली से भी परहेज करने के प्रस्ताव पारित किए। यूपी के अन्य भागों में, विशेष रूप से पश्चिमी क्षेत्र में, चमार सभाओं ने बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के क्षत्रिय स्थिति के एजेंडे और आकांक्षाओं को स्वीकार किया। मुरादाबाद और मेरठ ज़िलों की बैठकों में इन मुद्दों पर व्यापक बहस की नियमित रिपोर्ट दी गई। मुरादाबाद की चंदौसी, संभल, रहरा, डेलारी और गजरौला तहसीलों में चमारों ने जाटों के समान स्थिति का दावा करते हुए खुद को शाकाहारी सवर्ण हिंदू घोषित किया।
मेरठ ज़िला इस आंदोलन की ताकत के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय था। नवंबर 1920 में मवाना कस्बे में ज़िले के विभिन्न भागों से एकत्र हुए चार हजार चमारों की बैठक में क्षत्रिय स्थिति का दावा करने और एक पवित्र जीवन शैली अपनाने का संकल्प लेते हुए प्रस्तावों की एक श्रृंखला पारित की गई। मैनपुरी में मई 1924 में स्पष्ट रूप से चमारों के लिए क्षत्रिय स्थिति का दावा करने के लिए एक चमार महासभा का गठन किया गया था।11
चमारों का शाकाहार और उनके रहन-सहन की स्थिति की पवित्रता का राज्य के 24 ज़िलों में आयोजित बैठकों में पारित प्रस्तावों में बार-बार उल्लेख किया गया। कुछ सभाओं ने पवित्रता के अपने नए नियमों को लागू करने के लिए जुर्माने का भी प्रावधान किया।12 बाबा राम चंद्र ने प्रतापगढ़ और आसपास के ज़िलों में चमार सभाओं की बैठकों में भाग लिया।13
2.11 परंपरागत अशुद्ध व्यवसायों का बहिष्कार
पूर्वी उत्तर प्रदेश में गोरखपुर सुधारों और विरोध का एक प्रमुख केंद्र था, विशेष रूप से हाटा और पडरौना तहसीलों में। जुलाई 1926 में, चमारों ने चमड़े के काम के अशुद्ध व्यवसाय को छोड़ने और मवेशियों के शवों को हटाने, खाल निकालने व टैनिंग की प्रथाओं (चमड़ा पकाने की प्रथाएं/ चमड़ा बनाने का काम) को त्यागने के लिए बनारस के विभिन्न क्षेत्रों में प्रस्ताव पारित किए। दिलचस्प विवरणों में मुरादाबाद में चमारों द्वारा जूतों की मरम्मत और सिलाई करने से इनकार करना, बुलंदशहर के स्याना कस्बे में मृत जानवरों की खाल निकालने से इनकार करना और बदायूँ के राजपुरा कस्बे में मोची के व्यवसाय को छोड़ना शामिल है। सहारनपुर शहर में चमारों ने खाल का अपना वार्षिक ठेका भंगियों को बेच दिया।14
2.12 बेगारी विरोधी संघर्ष और कृषक आंदोलनों से जुड़ाव

अवध क्षेत्र के चमारों ने 1921-22 के किसान सभा आंदोलन में भाग लिया जो बेदखली और बेगारी के खिलाफ लड़ा गया था। आंदोलन समाप्त होने के बाद भी बेगारी के खिलाफ विरोध जारी रहा। मेरठ, मुरादाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, सहारनपुर, बिजनौर, एटा, कानपुर सहित पश्चिमी यूपी के कई ज़िलों में बेगारी के खिलाफ आंदोलन दर्ज किए गए। अप्रैल 1928 में हिंदी साप्ताहिक ‘प्रताप‘ की एक रिपोर्ट ने बेगारी और इसी तरह की प्रथाओं के उन्मूलन की मांग के लिए कानपुर की रैदास सभा द्वारा आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन पर टिप्पणी की। हालाँकि, पूर्वी उत्तर प्रदेश के ज़िलों जैसे आज़मगढ़, जौनपुर, इलाहाबाद, बनारस, गाज़ीपुर और गोरखपुर में, बेगारी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शाकाहार और पवित्रता के प्रचार की तुलना में कम स्पष्ट था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के रुधौली क्षेत्र में चमारों ने दाई के रूप में अपनी महिलाओं के काम के लिए मजदूरी की मांग की।15
2.13 आदि हिंदू आंदोलन की आधारशिला और वैचारिक बदलाव
चमार कार्यकर्ताओं के सामने मुख्य कठिनाई यह थी कि उनकी “अशुद्ध” उत्पत्ति और “अस्वच्छ” व्यवसाय ने उन्हें एक अस्पृश्य स्थिति में धकेल दिया था और इस नियति को अंग्रेजों द्वारा मान्यता दी गई और इसका सम्मान किया गया। अपनी जाति का इतिहास लिखकर और अपने समुदाय को राजनीतिक रूप से खुद को एकजुट करके चमार समुदाय ने अंग्रेजों और उच्च-जातीय हिंदू समाज द्वारा अपने बारे में फैलाए गए विचारों को खारिज कर दिया। ऐसे इतिहास लिखकर जिन्होंने दलितों को भारत के मूल निवासियों के रूप में पहचाना और उत्तर प्रदेश में सभी अस्पृश्य जातियों को संगठित करने के लिए राजनीतिक संघर्ष शुरू करके, चमार ‘आदि हिंदू आंदोलन‘ के सबसे आगे थे। चमार राजनीति और संघर्ष मुख्य रूप से इसी आंदोलन के साथ निर्मित हुए थे।
3. जाटव महासभा: संस्थागत विकास और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान
3.1 आगरा क्षेत्र में जाटव अस्मिता का जागरण
आगरा क्षेत्र का निम्न जातीय आंदोलन अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। जातिगत आंदोलन से लेकर जातिगत पहचान के निर्माण तक, यह प्रक्रिया इस क्षेत्र में अत्यधिक सशक्त रूप में उभरी। 20वीं शताब्दी में इस क्षेत्र के जाटवों ने अपने सामाजिक दावे (Social Assertion) के लिए आंदोलन प्रारंभ किया। शुरुआती दौर में जाटव समुदाय के प्रबुद्ध वर्ग ने उच्च वर्गीय हिंदुओं का अनुकरण किया। उन्होंने वैदिक अनुष्ठानों को अपनाने, यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने और मांस भक्षण के त्याग पर विशेष बल दिया।16
3.2 शैक्षणिक उपक्रम और जाटव वीर महासभा की स्थापना
जाटव समाज के संभ्रांत वर्ग ने अपने बच्चों को मिशनरी स्कूलों, आर्य समाज के विद्यालयों और सरकारी स्कूलों में भेजना शुरू किया। 1917 में, उन्होंने ‘जाटव वीर महासभा‘ (जाटव पुरुषों का संगठन) की स्थापना की तथा 1924 में ‘जाटव प्रचारक मंडल‘ अस्तित्व में आया। इसका मुख्य उद्देश्य शैक्षिक स्थिति में परिवर्तन लाना और जाटवों के बीच नई पहचान व चेतना का संचार करना था।17
जाटवों का पहला सम्मेलन पंडित सुंदरलाल सागर द्वारा 28 अक्टूबर 1917 को आगरा में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में उन्होंने ‘अखिल भारतीय जाटव सभा‘ का ढाँचा तैयार किया, जिसके अध्यक्ष बोहरे खेमचंद (एमएलसी) बने और सेठ बनवारी लाल को मंत्री चुना गया। 1939 में ‘जाटव जन शिक्षा संस्थान‘ का निर्माण किया गया, जिसका उद्देश्य जाटव समाज के बीच शिक्षा का प्रसार करना था।18
3.3 ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग और डॉ. आंबेडकर का नेतृत्व

1930 में ‘जाटव युवक परिषद‘ (जाटव यूथ लीग) की स्थापना हुई। अप्रैल 1930 में राम स्वरूप ठेकेदार ने ‘भारतवर्षीय जाटव युवक परिषद‘ का गठन किया। बदलते सामाजिक परिवेश और राजनीतिकरण के दौर में 1935-1937 के दौरान इसका नाम बदलकर‘अखिल भारतीय जाटव युवक परिषद‘ (All India Jatav Youth League) कर दिया गया। उन्होंने जाटव समाज के उत्थान पर बल दिया और राजस्थान, पंजाब, मध्य भारत (सेंट्रल प्रोविंस) आदि जैसे देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी शाखाओं का विस्तार किया।
1930 के दशक में, गोलमेज सम्मेलन के दौरान, जाटव यूथ लीग ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर को अपना सच्चा नेता स्वीकार किया और निम्न जातियों के नेता के रूप में एम.के. गांधी के प्रतीकात्मक नेतृत्व को खारिज कर दिया। उन्होंने गांधी जी के विरोध के बावजूद पृथक निर्वाचिका (Separate Electorate) के मुद्दे पर डॉ. आंबेडकर का पूर्ण समर्थन किया।
3.4 पृथक नामकरण और 1935 के अधिनियम की चुनौतियाँ
जाटव बुद्धिजीवियों ने राज्य और केंद्र सरकार से आधिकारिक स्वीकृति के रूप में “जाटव” शब्द की मांग की। उन्होंने जनगणना आयुक्त और वायसराय के समक्ष इस शब्द के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए। जब 1935 में उन्हें सरकारी अनुसूची में शामिल नहीं किया गया, तो उन्होंने अपनी मांगों के लिए एक आंदोलन शुरू कर दिया। उन्होंने एक अलग जातिगत पहचान की मांग की और चमार अनुसूची के साथ शामिल किए जाने को खारिज कर दिया; जनगणना रिपोर्टों में जाटवों को एक पृथक जाति के रूप में उल्लिखित किया गया और संयुक्त प्रांत (U.P.) सरकार ने केंद्र सरकार से जाटवों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अनुरोध किया।19
4. ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग के आधिकारिक पत्राचार व ज्ञापन
4.1 बाबू राम नारायण यादवेंदु की याचिकाएं और 1938 के आदेश

बाबू राम नारायण यादवेंदु (बी.ए., एलएल.बी. वकील), जो स्वयं को “ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग” (प्रधान कार्यालय- राजा की मंडी, आगरा) के अध्यक्ष के रूप में वर्णित करते हैं20 ने अनुसूचित जातियों की सूची में जाटव समुदाय को एक विशिष्ट और पृथक जाति के रूप में मान्यता देने के संबंध में पत्र लिखा।21 30 मई 1938 को जाटवों ने सरकार से दो मुख्य अनुरोध किए:
- (a) शिक्षा विभाग के अभिलेखों में उन्हें “जाटव (चमार)” के स्थान पर “जाटव” के रूप में दर्ज किया जाए।
- (b) जाटवों को भारत सरकार अधिनियम (अनुसूचित जाति) आदेश, 1936 के तहत प्रकाशित अनुसूचित जातियों की सूची में चमारों से अलग एक पृथक जाति के रूप में स्थान दिया जाए।22
11 जनवरी 1938 को, सरकारी आदेश संख्या 2019/XV-1041-1935 (दिनांक 12 अक्टूबर 1935) के निर्देशों के अनुसार ‘जाटव (चमार)‘ शब्दों के स्थान पर केवल ‘जाटव‘ शब्द का प्रयोग करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, भारत सरकार द्वारा स्वीकृत अनुसूचित जातियों की सूची के साथ यह टिप्पणी भी संलग्न की जानी थी कि चमारों के अंतर्गत ही जाटव शामिल हैं।23
4.2 ‘इंडियन फ्रैंचाइज़ कमेटी’ के मानदंड और ब्लंट की टिप्पणी
‘इंडियन फ्रैंचाइज़ कमेटी’ (भारतीय मताधिकार समिति) का मत था कि यह शब्द केवल उन्हीं जातियों पर लागू किया जाना चाहिए जो अस्पृश्य हैं, और अस्पृश्यता के परीक्षण निम्नलिखित रूप में स्वीकार किए गए थे:
- ऐसे व्यक्ति जिन्हें साधारण हिंदू मंदिरों के भीतरी भाग में प्रवेश करने से वंचित किया जाता है;
- ऐसे व्यक्ति जो प्रदूषण का कारण बनते हैं: (a) स्पर्श द्वारा, (b) एक निश्चित दूरी के भीतर आने पर।
संयुक्त प्रांत (U.P.) सरकार प्रारंभ से ही ‘दलित वर्ग’ (Depressed Classes) शब्द की किसी भी ठोस परिभाषा को अपनाने के विरुद्ध थी और उसे इंडियन फ्रैंचाइज़ कमेटी द्वारा अपनाई गई परिभाषा पर गंभीर आपत्तियाँ थीं। हिंदू जातियों की स्थिति का परीक्षण सर एडवर्ड ब्लंट द्वारा किया गया था और उनके द्वारा एक टिप्पणी (Note) तैयार की गई थी, जिसने सरकार को अनुसूचित जाति में शामिल की जाने वाली जातियों का निर्णय करने में मार्गदर्शन दिया। अस्पृश्यता के सूत्र को अनुपयुक्त माना गया क्योंकि स्पष्ट रूप से ऐसे लोगों के बड़े वर्ग मौजूद थे जिन्हें सामाजिक अक्षमताओं के कारण विशेष विचार की आवश्यकता थी, जो उन्हें अन्य वर्गों से अलग करती हैं।24 अस्पृश्यता ही एकमात्र विभेदक कारक नहीं है; संबंधित लोग अल्पसंख्यक समुदाय की तुलना में एक “विशेष हित” का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे संरक्षण की आवश्यकता है।
4.3 श्वेत पत्र में सूचीबद्धता और सामाजिक सीढ़ी में जाटवों का स्थान
उपरोक्त सिद्धांतों के आधार पर ‘डिप्रेस्ड क्लासेस‘ की एक सूची तैयार की गई और ब्रिटिश सरकार द्वारा श्वेत पत्र (White Paper) में शामिल की गई। सर एडवर्ड ब्लंट की टिप्पणी के आलोक में उन सभी पर विचार किया गया: अहेरिया, बहेलिया, भुइयार, धोबी, खटीक, थारू और पूर्वी कोरी को इसमें शामिल किया गया तथा साउन (Saun) को बाहर रखा गया।
जाटवों के मामले पर विस्तार से विचार किया गया। चमारों के कुछ संप्रदायों, जिनमें जाटव भी शामिल हैं, ने स्वच्छ व्यवसायों को अपना लिया था, वे सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठे थे और उन्हें अस्पृश्य नहीं माना जाता था।25 उन्होंने उच्च जातियों के आचार-व्यवहार और रीति-रिवाजों का अनुकरण करना शुरू कर दिया था और क्षत्रिय वंशज होने का दावा प्रस्तुत किया था; यद्यपि सर एडवर्ड ब्लंट ने इस क्षत्रिय वंशानुक्रम की कहानी पर विश्वास नहीं किया।
यह निर्णय लेने के लिए कि जाटवों को एक पृथक नामकरण के तहत अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं, जाति की सामाजिक स्थिति का परीक्षण किया जाना आवश्यक था। यदि जाति सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठ चुकी है और उसे किसी विशेष संरक्षण की आवश्यकता नहीं है, तो जाटवों को अनुसूचित नहीं किया जाना चाहिए। यदि वे अभी भी चमार या अन्य अनुसूचित समुदायों जितने ही पिछड़े हैं, तो उनका अनुसूची में शामिल होने का दावा बनता है। तथ्य यह है कि सर एडवर्ड ब्लंट के अनुसार वे सामाजिक सीढ़ी में आगे बढ़े थे, लेकिन यह संदिग्ध था कि क्या यह प्रगति उन्हें सूची से बाहर रखने के लिए पर्याप्त थी। इसमें उल्लेख किया गया कि मोची, कुम्हार, मल्लाह और कुछ अन्य जातियाँ, जिन्होंने अनुसूचित होने का दावा किया था, उन्हें शामिल नहीं किया गया क्योंकि तत्कालीन सरकार उन्हें अनुसूचीबद्ध जातियों जितना पिछड़ा नहीं मानती थी।26 शिक्षा विभाग को अनुसूचित जाति के आदेश में एक टिप्पणी जोड़ने का निर्देश दिया गया कि चमारों के अंतर्गत जाटव शामिल हैं।27
ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग ने अनुसूचित जातियों की सूची के तहत जाटव समुदाय को एक पृथक जाति के रूप में मान्यता देने के विषय पर माननीय प्रधानमंत्री (Premier) और संयुक्त प्रांत के महामहिम राज्यपाल को 28 फरवरी 1938 को एक ज्ञापन प्रस्तुत किया।28
4.4 जनसंख्या, भौगोलिक फैलाव और सामाजिक-आर्थिक सांख्यिकी
जाटव संयुक्त प्रांत के मेरठ, आगरा, रोहिलखंड और इलाहाबाद मंडलों में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। संयुक्त प्रांत के अलावा, वे पंजाब, दिल्ली प्रांत, मध्य प्रांत (Central Provinces), मध्य भारत, राजपूताना और ग्वालियर, महू, नीमच व उदयपुर राज्यों सहित देशी रियासतों में भी पाए जाते हैं। 1931 की जनगणना के अनुसार, ब्रिटिश भारत में जाटवों की जनसंख्या लगभग 40 लाख थी।
जहाँ तक समाज में उनकी उत्पत्ति और वर्तमान स्थिति का प्रश्न है, यह कहना पर्याप्त होगा कि जाटव ‘यदु वंश‘ के वंशज हैं। श्री जे.सी. नेसफील्ड ने अपनी पुस्तक ‘ब्रीफ रिव्यू ऑफ कास्ट-सिस्टम ऑफ एन.डब्ल्यू. प्रोविंसेज एंड अवध‘ में इस दावे का समर्थन करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य दिए हैं।
1920 में ब्रिटिश भारत में मोंटेंग्यू-चेम्सफोर्ड (Mont-Ford) सुधारों की शुरुआत से पहले, जाटव समुदाय के नेताओं ने समाज की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए एक आंदोलन शुरू किया था। उस समय से सैकड़ों जाटव सभाएँ और संघ (लीग) समुदाय के कल्याण के लिए उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं।
यह एक तथ्य है कि जाटव समाज सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक अक्षमताओं से जूझ रहा है। जाटवों के बारे में एक मुख्य तथ्य उनकी अत्यंत निम्न आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति है। वे अत्यधिक गरीबी से ग्रस्त लोग हैं। उनके बीच साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम है। उनमें से एक बड़ी संख्या गैर-दखली काश्तकारों (Non-occupancy tenants) और कृषि मजदूरों की है। यह ध्यान देने योग्य है कि उनमें से 78% कृषि कार्य में, 11% विभिन्न व्यापारिक उद्योगों और व्यवसायों में तथा 9% कारीगर और कुशल मजदूर के रूप में लगे हुए हैं।29
व्यावहारिक प्रतिबंधों के कारण जाटवों को सार्वजनिक प्रशासन में भाग लेने के अवसरों से वंचित रखा गया था। सरकार द्वारा सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए जाटवों को एक ‘दलित/पिछड़ा’ (Depressed) वर्ग माना जाता था। लेकिन यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि सरकार द्वारा जाटवों को वस्तुतः (De facto) मान्यता दिए जाने के बावजूद, बिना किसी कारण के उन्हें वैधानिक रूप से (Statutorily) अनुसूचित जातियों की सूची से बाहर रखा गया है।30
4.5 प्रांतीय नेतृत्व और प्रांतीय सरकार से वार्ता (26 अक्टूबर 1938)
लखनऊ- दिनांक 26 अक्टूबर 1938
- अध्यक्ष: [नामनिर्दिष्ट]
- वरिष्ठ उपाध्यक्ष: राम दयाल सागर (अहमदाबाद)
- कनिष्ठ उपाध्यक्ष: मुन्ना लाल, निम (महू, मध्य भारत)
- महामंत्री: माणिक चंद जाटव वीर, एम.एल.ए. (आगरा)
- कार्यालय सचिव: नत्थी लाल यादव (आगरा)
- संयुक्त सचिव: दौलत राम, बी.ए. (आगरा)
- आर.एन. यादवेंदु: बी.ए., एलएल.बी. वकील (आगरा)
- कैशियर (कोषाध्यक्ष): राम स्वरूप सागर (अहमदाबाद)
- प्रचार सचिव: मोती लाल व्यास, बी.एससी. (कृषि)
- पुस्तकाध्यक्ष: ईश्वरी प्रसाद मौर्य (आगरा)
कार्यकारिणी समिति के सदस्य:
के.एस. केने, बी.ए., एम.एल.ए., संसदीय सचिव (लखनऊ); राम प्रसाद कदम (आगरा); धर्मपाल उद्यान (आगरा); लक्ष्मण सिंह धर्मवीर (दिल्ली); आत्माराम ठेकेदार (ग्वालियर); गंदा लाल ठेकेदार (बड़ौदा); अमृत लाल (उदयपुर); कालो राम सामी (महू); हजारी लाल (अजमेर); प्रताप भानु सिंह (बुलंदशहर); प्रताप सिंह, बी.ए. (बुलंदशहर); सुंदर लाल सागर (आगरा); और दलचंद, रईस (मथुरा)।31
श्री आर.एन. यादवेंदु ने स्पष्ट किया कि संपूर्ण भारत में जाटवों की जनसंख्या संयुक्त प्रांत (U.P.) में सबसे अधिक (लगभग 12.5 लाख) थी और वे मुख्य रूप से पश्चिमी ज़िलों में बसे हुए थे। 1936 में महामहिम सर हैरी हैग को एक ज्ञापन प्रस्तुत किया गया था और उसमें यह अनुरोध किया गया था कि अनुसूचित जातियों की सूची में जाटवों को एक पृथक जाति के रूप में दर्शाया जाना चाहिए। तब से दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन यह खेद का विषय है कि सरकार द्वारा अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।32
माननीय प्रधानमंत्री (Premier) ने रेखांकित किया कि कांग्रेस का उद्देश्य भारत सरकार अधिनियम में केवल मामूली संशोधन की मांग करना नहीं था, बल्कि इससे कहीं अधिक था। इसलिए, अपनी नीति के अनुरूप, उनके लिए अधिनियम में किसी भी संशोधन की सिफारिश करना संभव नहीं था।33
जाटवों का अनुरोध यह था कि उनके जातिगत नाम को ‘जाटव (चमार)’ के स्थान पर केवल “जाटव” के रूप में दर्ज किया जाए। यह परिवर्तन एक मामूली बदलाव प्रतीत होता है; यह नाइयों द्वारा “ब्राह्मण” कहलाने के दावे या पुष्पमाली, नज्जार या बढ़ई द्वारा “गौड़ ब्राह्मण” कहे जाने के दावे जैसा नहीं है। कार्यालय का मानना है कि यदि वांछित आदेश जारी किए जाते हैं तो इससे कोई गलत नज़ीर (Bad Precedent) कायम नहीं होगी।34
26 अक्टूबर 1938 को लखनऊ में जाटव नेताओं ने अपनी इस मांग पर बल दिया कि सरकार सभी विभागाध्यक्षों, मंडलायुक्तों और सभी ज़िलों के ज़िलाधिकारियों को एक परिपत्र जारी करे कि जाटव समुदाय के सदस्यों की जाति केवल ‘जाटव’ दर्ज की जाए और इस कारण उन्हें उन विशेषाधिकारों व विशेष अधिकारों का आनंद लेने से वंचित न किया जाए जो अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए उपलब्ध हैं।35
ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग ने तर्क दिया कि सभी व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए जाटवों को अनुसूचित जाति की एक जाति माना जाना चाहिए। अपनी जाति का नाम ‘जाटव‘ बताने वाला कोई भी जाटव उम्मीदवार अनुसूचित जाति की ओर से किसी भी सार्वजनिक सेवा के लिए आवेदन करने का पात्र होना चाहिए।36
5. औपनिवेशिक अभिलेखों और विभागाध्यक्षों की प्रशासनिक प्रस्तुतियां
5.1 जातीय वर्गीकरण सम्बन्धी विवाद और औपनिवेशिक रिकॉर्ड
उप-महासचिव ने कहा कि “संयुक्त प्रांत में जादव या जाटव समुदाय की स्थिति अस्पष्ट थी। वे या तो अहीर या चमार जाति के प्रतीत होते हैं। यदि उन्हें चमार माना जाता है, तो वे पहले से ही अनुसूचित जातियों में शामिल हैं। दूसरी ओर, यदि उन्हें अहीर माना जाता है, तो उन्हें दलित/पिछड़ा नहीं माना जा सकता, क्योंकि अहीर एक अपेक्षाकृत समृद्ध जाति है और उनका पारंपरिक व्यवसाय मवेशियों का पालन है, जबकि इस जाति के कई लोग अब कृषक बन गए हैं। वे संभवतः चरवाहा जनजाति ‘आभीर’ के वंशज हैं, जो पहली शताब्दी ईस्वी के अंत के आसपास पंजाब में स्थित थी। निश्चित रूप से क्षत्रिय होने का उनका कोई दावा नहीं बनता, जो कि एक आर्य वर्ग है।37
जाटव समुदाय के उन सभी सदस्यों की जाति, जो जाटव या जटुवा के रूप में जाने जाते थे, ‘जाटव’ दर्ज की गई।38अन्य प्रार्थनाओं के साथ यह भी कहा गया था कि जाटव जाति को अनुसूचित जातियों में शामिल किया जाना चाहिए।39
अनुसूचित जाति आदेश को निर्वाचक नामावलियों (Electoral Rolls) को प्रभावित करने वाले आदेशों में से एक माना गया। इस विभाग ने अन्य बातों के अलावा यह सुझाव दिया कि अनुसूचित जाति आदेश में “जाटव जाति” को शामिल करने के संबंध में हमारी सिफारिश की ओर भारत सरकार का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है।40
जनगणना में कभी भी जाटवों को एक पृथक जाति के रूप में मान्यता नहीं दी गई थी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है, उन्हें हमेशा चमार जाति के अंतर्गत ही दर्ज किया गया है। 1896 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज एंड अवध‘ में विलियम क्रुक ने जाटव, जटुआ या जादुआ को चमारों की एक उप-जाति के रूप में वर्गीकृत किया था।41
5.2 राज्य सचिव को ज्ञापन (26 दिसंबर 1938) और वैधानिक मान्यता
ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग, आगरा की ओर से भारत के राज्य सचिव (Secretary of State for India) को संबोधित 26 दिसंबर 1938 का एक ज्ञापन भेजा गया, जिसमें भारत सरकार (अनुसूचित जाति) आदेश, 1936 में संशोधन की प्रार्थना की गई ताकि ‘जाटव’ जाति को अनुसूचित जाति घोषित किया जा सके।42
पत्र संख्या 138-R (दिनांक 23 सितंबर 1933) ‘जाटव’ और ‘जाटवा’ जातियों के संबंध में संदर्भित है; उनका मानना है कि चूंकि जाटव वास्तव में एक ऐसी जाति है जो सभी सामान्य मानदंडों के अनुसार अनुसूचित जाति होगी, इसलिए ‘जाटव’ जाति को अनुसूचित किया जाना चाहिए। व्यावहारिक रूप में इस जाति को अनुसूचित जातियों में शामिल करने से कोई कठिनाई नहीं होगी, क्योंकि जो लोग स्वयं को ‘जाटव’ कहते हैं न कि ‘जाटवा’, वे भारत सरकार अधिनियम में दिए गए विशेष संरक्षण और विशेषाधिकारों के हकदार होंगे।43
ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग की ओर से सादर निवेदन किया गया कि आपकी सरकार के माध्यम से 26 दिसंबर 1938 को भारत के परम आदरणीय राज्य सचिव को पूरे क्षेत्र से जाटव जाति के 5,131 प्रतिनिधियों के हस्ताक्षरों के साथ एक ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग, आगरा से भारत के राज्य सचिव को संबोधित 26 दिसंबर 1938 का एक ज्ञापन भेजा गया, जिसमें भारत सरकार (अनुसूचित जाति) आदेश, 1936 में संशोधन की मांग की गई थी ताकि ‘जाटव’ जाति को अनुसूचित जाति घोषित किया जा सके।
प्रांतीय सरकार ने इस प्रश्न की पुनः जांच की है और इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि यद्यपि इस सरकार के पत्र संख्या 138-R (दिनांक 23 सितंबर 1933) में “जाटव” और “जाटवा” जातियों के संबंध में व्यक्त की गई अस्पष्टता अभी भी बनी हुई है, लेकिन जाटव वास्तव में एक ऐसी जाति है जो सभी सामान्य मापदंडों द्वारा अनुसूचित जाति होगी44
26 अक्टूबर 1938 को लखनऊ में प्रतिनिधिमंडल के साथ साक्षात्कार के दौरान, माननीय प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को यह सुझाव दिया कि जाटव लीग को भारत के राज्य सचिव को ज्ञापन भेजना चाहिए और स्थानीय सरकार भारत के राज्य सचिव से इसकी सिफारिश करेगी।45
26 अक्टूबर 1938 को ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग की ओर से एक प्रतिनिधिमंडल ने सरकार द्वारा जाटव जाति को मान्यता दिए जाने के संबंध में संयुक्त प्रांत के माननीय प्रधानमंत्री से मुलाकात की और इस प्रतिनिधिमंडल ने माननीय प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वे सरकार के सभी विभागों को जाटव जाति के सदस्यों को केवल ‘जाटव’ के रूप में दर्ज करने का परिपत्र जारी करें।46
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कार्यालय ज्ञापन संख्या 78(3) III-38 (दिनांक 30 मई 1941) के अनुसार, यू.पी. सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी किया कि ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन के संबंध में, भारत के राज्य सचिव ने भारत सरकार अनुसूचित जाति आदेश, 1936 के संशोधन का प्रस्ताव करने का पहला अवसर लेने का निर्णय लिया है, ताकि उस आदेश की अनुसूची के भाग (IV) (1) में जाटव जाति को शामिल किया जा सके।47
5.3 प्रांतीय विभागों की आधिकारिक स्वीकृतियाँ
सामान्य प्रशासन विभाग के कार्यालय ज्ञापन संख्या 78(3)-III-1938 (दिनांक 12 दिसंबर 1938) के संदर्भ के अनुसार:
न्यायिक सिविल विभाग से संबंधित अभिलेखों में जाटव समुदाय की जाति को ‘जाटव’ दर्ज करने में कोई आपत्ति नहीं है।48
11 जनवरी 1938 को शिक्षा विभाग ने जाटव समुदाय के उस अनुरोध को स्वीकार कर लिया जिसमें “जाटव (चमार)” शब्दों के स्थान पर स्वयं को ‘जाटव’ दर्ज करने की मांग की गई थी। इसके अलावा निर्देश दिया गया कि वंचित वर्गों के बच्चों के लिए स्वीकृत विशेष सुविधाओं का लाभ उन्हें देने के लिए, भारत सरकार द्वारा स्वीकृत अनुसूचित जातियों की सूची में यह टिप्पणी जोड़ी जाएगी कि चमारों में जाटव शामिल हैं।49
12 दिसंबर 1938 को ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग के उस अनुरोध के संबंध में निर्देश जारी किए गए कि सरकारी अभिलेखों में उनके समुदाय की जाति “चमार” या “जाटव चमार” के बजाय “जाटव” दर्ज की जाए।50
जहाँ तक उद्योग विभाग का संबंध था, सरकारी अभिलेखों में चमार या जाटव चमार समुदाय के सदस्यों की जाति को “जाटव” के रूप में दर्ज किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।51
12 दिसंबर 1938 को वित्त (A) विभाग ने भी स्पष्ट किया कि ऑल इंडिया जाटव यूथ लीग के इस अनुरोध को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है कि उनके समुदाय की जाति को “चमार” या “जाटव चमार” के स्थान पर “जाटव” नाम दिया जाए।52
22 दिसंबर 1938 को यह अनुरोध किया गया कि पैराग्राफ 3 की पंक्ति 3 में “जातियों” शब्द के बाद यह शब्द जोड़े जाएं: “जब तक कि सरकार कोई कार्यकारी आदेश जारी करके यह घोषित न कर दे कि जाटव अनुसूचित जातियों के समतुल्य हैं।” दूसरे शब्दों में, जाटव को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया जाए या जब तक सरकार कोई कार्यकारी आदेश जारी करके यह घोषित न कर दे कि जाटव अनुसूचित जातियों के समतुल्य हैं, तब तक उनके बच्चे अनुसूचित जातियों के लिए स्वीकृत सुविधाओं से वंचित रहेंगे, क्योंकि सरकार ने यह निर्णय लिया है कि दलित वर्गों के लिए स्वीकृत सभी लाभ भारत सरकार (आदेश) 1936 की सूची में उल्लिखित केवल अनुसूचित जातियों के बच्चों तक ही सीमित होने चाहिए।53
6. निष्कर्ष (Conclusion)
चमार और जाटव महासभा के सुधारकों के लिए मद्यपान (मदिरापान), जुआ और प्रचलित धार्मिक कर्मकांड ऐसी बुराइयाँ या कुरीतियाँ थीं, जिन पर विजय पाना अत्यंत आवश्यक था। इसका उद्देश्य न केवल ऋणग्रस्तता (कर्ज) से बचना था, बल्कि समाज में उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त करना और भारतीय समाज के योग्य व उपयुक्त नागरिक के रूप में स्वयं को स्थापित करना भी था।
संयुक्त प्रांत (U.P.) के नगरों में अछूत एवं निर्धन वर्ग के संबंध उच्च जातीय राष्ट्रवादियों तथा धार्मिक सुधारकों के साथ सदैव तनावपूर्ण व असहज बने रहे, और इनमें से कोई भी वर्ग अछूत निर्धन वर्ग की राजनीति को एक सशक्त या पर्याप्त दिशा प्रदान करने में सफल नहीं हो सका।
इसके विपरीत, यद्यपि चमार और जाटव महासभा के नेतृत्व में संचालित आंदोलनों की राजनीति का स्वरूप यदा-कदा और असमान (Sporadic and uneven) रहा, फिर भी इन संस्थाओं ने उनकी राजनीतिक अभिव्यक्ति और सामाजिक पहचान के निर्माण में सबसे प्रमुख, निरंतर और स्थायी मंच की भूमिका निभाई।
Footnotes:
- Chandrika, R., Chancharik Kanhailal, Adhunik Bharat ka Andolan, University, New Delhi (2003), pp. 234–35. (Chamar Sabhas like Jatav Sabha, Jaiswar Sabha, Jatiya Sabha and many such were formed at the village level).
- Rawat, Ramnarayan S., Reconsidering Untouchability: Chamars and Dalit History in North India, Permanent Black, Ranikhet (2012), pp. 121–23.
- Ibid., W. Briggs, The Chamars, p. 20.
- Ibid., Rawat, Ramnarayan S. (2012), p. 131.
- Ibid., p. 132.
- PAI (Weekly Police Abstracts of Intelligence), March 24, 31; Oct 06, 1923; February 23; May 3, 17, 24; Jun 14; Sep 6, 1924.
- PAI, March 18; April 8, 22, 1922.
- Rawat, Ramnarayan S. (2012), pp. 132–33.
- Premchand, Munshi, Karambhoomi, pp. 168–71.
- Rawat, Ramnarayan S. (2012), p. 133.
- PAI, November 4, 1922.
- PAI, Dec 24, 1927; January 7, 1928.
- Rawat, Ramnarayan S. (2012), pp. 133–34.
- Ibid., p. 136.
- Chandrika, R., Chancharik Kanhailal, Adhunik Bharat ka Andolan, University, New Delhi (2003), p. 84.
- Ibid., p. 85.
- Ibid., p. 87.
- Ibid., pp. 88–89.
- File No. 78(3)/1938, Cover No. 1, General Administration Department, File Heading: Representation of Depressed Classes, March 5, 1938, p. 1, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Jun 14, 1938, p. 2, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Jun 14, 1938, p. 3, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., January 11, 1938, p. 5, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., January 11, 1938, p. 6, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., January 11, 1938, pp. 7–8, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., January 11, 1938, pp. 8–9, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., January 11, 1938, p. 10, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., July 14, 1938, p. 5, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., October 26, 1938, pp. 17–18, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., 1938, p. 18, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., p. 20, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., November, p. 21, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., p. 22, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., p. 23, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., November 11, p. 25, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., p. 26, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., January 1, p. 27, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Feb 8, p. 29, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., April 20, p. 30, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., p. 32, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Aug 2, p. 34, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., March 23, 1939, p. 40, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., p. 41, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., May 23, p. 42, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., July 4, p. 44, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., November 11, p. 48, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., June 4, p. 51, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Dec 20, p. 52, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Dec 22, p. 53, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., January 7, p. 54, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Jan 18, p. 56, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Jan 21, p. 57, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid., Feb 22, p. 61, U.P. State Archives, Lucknow.
- Ibid. Feb 22, p. 61, U.P. State Archives, Lucknow.
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Dr. Om Prakash Singh
Assistant Professor & Head, Department of History
Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)
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