गांधी युग नोट्स पार्ट-2: महात्मा गांधी के प्रारंभिक आंदोलन- चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा सत्याग्रह का इतिहास (1915-1918)

महात्मा गांधी के प्रारंभिक आंदोलन (1915–1918) से लेकर चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा सत्याग्रह की पूरी कहानी सरल भाषा में पढ़ें। B.A., M.A. और UPSC/SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए यह क्विक रिवीजन नोट्स आपकी तैयारी को मजबूत बनाएंगे।

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गांधी युग भाग-2: एक परिचय

प्रिय विद्यार्थियों,

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय में आप सभी का स्वागत है! गांधी युग नोट्स पार्ट-1 में हम यह पढ़ चुके हैं कि किस प्रकार गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह का सफल परीक्षण किया था। सत्याग्रह का सफल परीक्षण बाद गाँधी जी 9 जनवरी 1915 को भारत वापस आएँ। अब हम इस विशेष अध्ययन श्रृंखला के गांधी युग भाग-2 में उस ऐतिहासिक तथ्यों को पढेंगे(समझेंगे), जहाँ से गांधी जी ने भारत की ज़मीनी राजनीति में अपना पहला कदम रखा।

गाँधी युग भाग-2 केवल B.A. व M.A. की विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाओं  के लिए ही अत्यंत महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि राज्य स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भी बहुत ही उपयोगी अध्याय हैं। UPSC, State PCS, SSC और B.Ed. जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए गाँधी युग सबसे अधिक प्रश्नों वाला भाग माना जाता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हम  “गांधी युग Quick Revision Series” को लेकर आएँ हैं। इसSeries में हमनेकिसी प्रकार की कठिन भाषा का प्रयोग नहीं किया हैंबल्कि सीधे और सटीक (To-the-Point) तथ्यों का समावेश किया हैं। इस Quick Revision Series को लाने का मेरा एक उद्देश्य यह भी था कि कम समय में ही प्रतियोगी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय को परीक्षा के लिए तैयार कर सके और अपनी  उत्तर-लेखन (Answer Writing) और रिवीज़न दोनों को एकदम मजबूत कर सकें।

इस लेख की मुख्य विशेषताएँ

भारत आगमन के बाद गांधी जी ने तुरंत कोई देशव्यापी राष्ट्रीय आंदोलन शुरू नहीं किया, बल्कि अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर पहले यहाँ की ज़मीनी समस्याओं को समझा। इस भाग में हम निम्नलिखित प्रमुख ऐतिहासिक पड़ावों का क्रमानुसार अध्ययन करेंगे:

  • भारत आगमन एवं बीएचयू (BHU) भाषण (1916): भारत में गांधी जी का पहला सार्वजनिक भाषण और लखनऊ अधिवेशन (1916) में बिहार के किसान नेता राजकुमार शुक्ल से ऐतिहासिक मुलाकात।
  • चंपारण सत्याग्रह (अप्रैल 1917, बिहार): शोषक ‘तीनकठिया पद्धति’ के खिलाफ भारत में गांधी जी का पहला सफल सत्याग्रह।
  • अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (मार्च 1918, गुजरात): प्लेग बोनस का विवाद और भारत में गांधी जी की पहली भूख हड़ताल (अनशन)।
  • खेड़ा सत्याग्रह (मार्च 1918, गुजरात): अकाल के बावजूद जबरन लगान वसूली का विरोध और भारत में गांधी जी का पहला वास्तविक असहयोग आंदोलन।
  • क्विक समरी टेबल (Quick Revision): परीक्षा से ठीक पहले 2 मिनट में पूरे पाठ को दोहराने हेतु एक मास्टर टेबल।

टीचर टिप (Teacher’s Advice): इतिहास को अलग-अलग टुकड़ों में रटने के बजाय कारण और परिणाम (Cause & Effect) की कड़ी बनाकर पढ़ें। उदाहरण के लिए—चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा के इन तीन स्थानीय आंदोलनों की सफलता ने न केवल आम जनता में आत्मविश्वास जगाया, बल्कि गांधी जी को पूरे देश का सर्वमान्य नेता बना दिया। यदि आप इस क्रम को समझ लेंगे, तो परीक्षा में दीर्घ उत्तरीय प्रश्न लिखने में आपको कभी कोई कठिनाई नहीं होगी।

यह भी पढ़ें: सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930): कारण, 11 सूत्रीय मांगें, दांडी मार्च एवं प्रभाव | Civil Disobedience Movement

अगला पार्ट (गांधी युग नोट्स पार्ट-3): नोट: 1918 के इन सत्याग्रहों के बाद की ऐतिहासिक घटनाओं (रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग हत्याकांड और परीक्षा-उपयोगी 37 PYQs) का अध्ययन करने के लिए हमारा अगला लेख “ महात्मा गांधी के प्रारंभिक आंदोलन–रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड (1919): संपूर्ण इतिहास एवं महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (PYQs)” ज़रूर पढ़ें।

चलिए, बिना किसी देरी के 1915 से 1918 तक के मुख्य नोट्स की शुरुआत करते हैं…

गांधी जी की भारत में प्रारंभिक गतिविधियाँ (1915 – 1918) एवं प्रमुख घटनाक्रम

जनवरी 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। भारत आने के बाद उन्होंने तुरंत कोई राजनीतिक आंदोलन शुरू नहीं किया। गाँधी जी ने सबसे पहले अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर एक वर्ष तक देश का भ्रमण किया और वहां की राजनीतिक परिस्थितियों को समझा। 1915 से 1918 के बीच की गतिविधियां और उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाएं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनीं।

1. साबरमती आश्रम की स्थापना एवं त्याग

स्थापना: ‘सत्याग्रह आश्रम‘ की स्थापना गांधी जी द्वारा मई 1915 में अहमदाबाद के कोचरब क्षेत्र में की गई थी, जिसे 1917 में साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित कर दिया गया।

  • मुख्य केंद्र (1915 – 1930): वर्ष 1915 से 1930 तक साबरमती आश्रम ही गांधी जी की सभी राजनीतिक, सामाजिक और रचनात्मक गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बिन्दु बना रहा।
  • आश्रम का त्याग: 12 मार्च 1930 को प्रसिद्ध ‘दांडी मार्च’ की शुरुआत करते समय गांधी जी ने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक मैं भारत को स्वराज (स्वतंत्रता) नहीं दिला देता, तब तक साबरमती आश्रम में वापस नहीं आऊंगा।

2. प्रथम सार्वजनिक उपस्थिति (1916)

  • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU): बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में फरवरी 1916 में हुए उद्घाटन समारोह में उपस्थित होकर गांधी जी ने भारत में अपनी पहली प्रमुख सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज कराई।
  • ऐतिहासिक भाषण: इस समारोह में राजा-महाराजा और उच्च वर्ग के लोग मौजूद थे। गांधी जी ने अपने भाषण में उच्च वर्ग पर हमला बोलते हुए कहा कि जब तक देश का किसान और गरीब वर्ग इस आंदोलन से नहीं जुड़ेगा, तब तक सच्चा स्वराज मिलना असंभव है।

3. कांग्रेस का ऐतिहासिक लखनऊ अधिवेशन (1916)

  • अध्यक्षता: कांग्रेस के 31वें अधिवेशन (1916 ई०) की अध्यक्षता करने का अवसर अम्बिका चरण मजूमदार को मिला था।
    • नरम दल और गरम दल का मिलन: 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन उदारवादी (नरम दल) और उग्रवादी (गरम दल) दलों में हो गया था। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के प्रयासों से पुनः एक हुए।
    • लखनऊ पैक्ट (कांग्रेस-लीग समझौता): इसी अधिवेशन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ। इसमें कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक/साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली की माँग को औपचारिक स्वीकृति दे दी। इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक इसे आगे चलकर भारत विभाजन का बीजारोपण और कांग्रेस की एक बड़ी रणनीतिक भूल मानते हैं।

 राजकुमार शुक्ल से ऐतिहासिक भेंट:

  • चंपारण (बिहार) से आए किसान नेता राजकुमार शुक्ल ने इस अधिवेशन में गांधी जी से मुलाकात की। उन्होंने ‘तिनकठिया प्रणाली’ (ज़मीन के 3/20 भाग पर जबरन नील की खेती) के तहत ब्रिटिश बागान मालिकों द्वारा चंपारण के किसानों पर किए जा रहे अत्याचारों और उनकी दयनीय स्थिति से गांधी जी को रूबरू कराया।

  राजकुमार शुक्ल के बार-बार आग्रह करने पर ही गांधी जी ने चंपारण जाने का निर्णय लिया, जिसने भारत में उनके पहले ‘सत्याग्रह’ का मार्ग प्रशस्त किया।

भारत में महात्मा गांधी के प्रथम तीन प्रारम्भिक सत्याग्रह (1917 – 1918)

दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ा आंदोलन शुरू नहीं किया बल्कि पहले उन्होंने भारत की क्षेत्रीय समस्याओं को समझा। उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह का पहला व्यावहारिक प्रयोग भारत के तीन स्थानीय आंदोलनों—चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में किया।

अप्रैल1915 ई. में बिहार में स्थित चम्पारण जिले के किसानो पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध आंदोलन चलाया जो “चम्पारण आन्दोलन” के नाम से जाना जता हैं।

नीचे इनके प्रथम सत्याग्रह ‘चंपारण सत्याग्रह’ का संपूर्ण, प्रामाणिक और परीक्षा-उपयोगी विश्लेषण प्रस्तुत है:

 (I) चंपारण सत्याग्रह (अप्रैल 1917, बिहार)

चंपारण सत्याग्रह 1917 में महात्मा गांधी और राजकुमार शुक्ला के साथ तिनकठिया प्रथा का विरोध

भारत की धरती पर महात्मा गांधी का यह पहला ‘सविनय अवज्ञा’ (Civil Disobedience) और पहला सफल सत्याग्रह था।

1. आंदोलन का मुख्य कारण और पृष्ठभूमि

  • तीनकठिया प्रणाली (Tinkathia System): बिहार के चंपारण ज़िले में यूरोपीय बागान मालिकों (निल्हे साहबों) ने किसानों के साथ एक दमनकारी अनुबंध कर रखा था। इसके तहत किसानों को अपनी कुल ज़मीन के 3/20 भाग (प्रत्येक बीघे के तीन कट्ठे) पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी पड़ती थी।
  • अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का प्रभाव: 19वीं शताब्दी के अंत में जर्मनी में रासायनिक (कृत्रिम) रंगों की खोज हो गई थीं। जिस कारण बाज़ार में प्राकृतिक नील की माँग कम होने लगी और बागान मालिकों (यूरोपीय निलहे) को घाटा होने लगा।
  • अवैध वसूली (तावान व शराहबेशी): नील के व्यापार में घाटा होते देखकर बागान मालिक किसानों को नील की खेती के अनुबंध से मुक्त करने के लिए उन पर भारी लगान, अवैध कर और जबरन हर्ज़ाना (तावान) लगा दिए गए, जिससे किसान अत्याधिक शोषण का शिकार होने लगे।

2. गांधी जी का आगमन एवं प्रमुख सहयोगी

  • राजकुमार शुक्ल का प्रयास: चंपारण के एक किसान राजकुमार शुक्ल ने 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी से भेंट करके किसानों की दुर्दशा बताई और उन्हें चंपारण आने का आग्रह किया था।
  • सहयोगियों की टीम: गांधी जी 15 अप्रैल 1917 को मोतिहारी (चंपारण) पहुँचे। उनके साथ भारत के भावी दिग्गज नेताओं की एक सशक्त टीम जुड़ी, जिनमें प्रमुख थे:
    • डॉ. राजेंद्र प्रसाद
    • आचार्य जे. बी. कृपलानी
    • अनुग्रह नारायण सिंह
    • ब्रजकिशोर प्रसाद
    • मज़रहुल हक
    • महादेव देसाई और नरहरि पारिख (गांधी जी के निजी सचिव)

3. संघर्ष और अंतिम परिणाम

  • चंपारण एग्रेरियन कमेटी (Champaran Agrarian Committee): गांधी जी की दृढ़ता और किसानों के समर्थन को देखते हुए ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने पूरे मामले की जाँच करने के लिए एक समिति गठित की, जिसमें गांधी जी को भी एक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। गाँधी जी समिति को यह समझाने में पूर्णतया सफल रहे की तिनकठिया प्रणाली समाप्त होनी चाहिए।
  • ऐतिहासिक जीत: जाँच समिति ने स्वीकार किया कि तीनकठिया प्रणाली पूरी तरह अवैध और शोषक है।
    • तीनकठिया पद्धति को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया।
    • यूरोपीय बागन मालिको(निलहे) ने किसानों से गैर-कानूनी तरीके से वसूले गए धन का 25% हिस्सा वापस (रिफंड) किया।

4. परीक्षा-विशेष महत्वपूर्ण तथ्य (PYQs Focus)

  • ‘महात्मा‘ की उपाधि: चंपारण सत्याग्रह की अभूतपूर्व सफलता और गांधी जी के नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होकर रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें पहली बार ‘महात्मा‘ कहकर संबोधित किया।
  • आंदोलन का विरोध: दक्षिण भारतीय किसान नेता एन. जी. रंगा (N.G. Ranga) ने चंपारण में गांधी जी के हस्तक्षेप और इस सत्याग्रह का विरोध किया था।

 (II) अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (मार्च 1918, गुजरात) 

चंपारण की सफलता के बाद महात्मा गांधी का अगला प्रयोग १९१८ में अहमदाबाद मिल मजदूर आन्दोलन था। यहाँ का विवाद प्लेग बोनस को लेकर था। भारत में यह दूसरा प्रमुख क्षेत्रीय आंदोलन था। यह आंदोलन भारत में गांधी जी की पहली भूख हड़ताल (अनशन) के लिए जाना जाता है।

1. विवाद का मुख्य कारण और पृष्ठभूमि

  • प्लेग बोनस का मुद्दा: 1917 के अंत में अहमदाबाद में प्लेग की महामारी फैली थी। मिल मजदूर शहर छोड़कर जा रहे थे। मजदूरों को शहर छोड़कर जाने से रोकने के लिए मिल मालिकों ने उनके मूल वेतन का 75% तक प्लेग बोनस देना शुरू किया था।
  • बोनस की समाप्ति और महंगाई: 1918 की शुरुआत में महामारी के समाप्त होने के बाद  मिल मालिकों ने बोनस को पूरी तरह खत्म करने का ऐलान कर दिया। दूसरी ओर, प्रथम विश्वयुद्ध के कारण महंगाई बहुत बढ़ गई थी,जिस कारण मजदूर बोनस जारी रखने की मांग कर रहे थे।
  • मांग में अंतर: मिल मालिक केवल 20% बोनस देने पर अड़े थे, जबकि मजदूर 50% बोनस की मांग कर रहे थे।

2. गांधी जी का नेतृत्व और रणनीति    

  • मध्यस्थता और 35% की मांग: गांधी जी ने पूरे मामले का निष्पक्ष अध्ययन किया और दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाते हुए मजदूरों से अपनी मांग घटाकर 35% बोनस करने की सलाह दी।
  • प्रथम भूख हड़ताल (अनशन): जब मिल मालिकों ने 35% बोनस देने से भी इंकार कर दिया और हड़ताल ढीली पड़ने लगी, तब मजदूरों का मनोबल बढ़ाने के लिए गांधी जी ने 15 मार्च 1918 को भारत में पहली बार भूख हड़ताल (अनशन) शुरू की।
  • अहिंसक आंदोलन: उन्होंने मजदूरों से शपथ दिलवाई कि वे शांतिपूर्ण ढंग से हड़ताल जारी रखेंगे और किसी भी प्रकार की हिंसा या मिल परिसरों में तोड़फोड़ नहीं करेंगे।

3. परिणाम और समाधान

  • ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) का गठन: गांधी जी के अनशन और बढ़ते जनसमर्थन के आगे मिल मालिकों को झुकना पड़ा। मामले को सुलझाने के लिए ‘आनंदशंकर ध्रुव‘ की अध्यक्षता में एक न्यायाधिकरण (Arbitration Tribunal) का गठन किया गया।
  • मजदूरों की विजय: ट्रिब्यूनल ने गांधी जी के तर्क और मजदूरों की मांग को जायज मानते हुए अंततः 35% बोनस देने का फैसला सुनाया।

4. परीक्षा-विशेष महत्वपूर्ण तथ्य (PYQs Focus)

  • अनुसूइया बेन की भूमिका: प्रमुख मिल मालिक अम्बालाल साराभाई (जो गांधी जी के मित्र और साबरमती आश्रम के दानदाता थे) इस आंदोलन में गांधी जी के खिलाफ थे। परंतु उनकी बहन अनुसूइया बेन ने मजदूरों के हक के लिए गांधी जी का पूर्ण समर्थन किया।
  • अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (TLA): इस सफलता के बाद गांधी जी और अनुसूइया बेन ने मिलकर 1920 में ‘अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन‘ (मजदूर महाजन संघ) की स्थापना की, जो भारत के सबसे पुराने और व्यवस्थित श्रम संगठनों में से एक बना।

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 (III) खेड़ा सत्याग्रह (22 मार्च 1918 – मई 1918, गुजरात)

चंपारण और अहमदाबाद की सफलता के बाद यह महात्मा गांधी का तीसरा प्रमुख क्षेत्रीय आंदोलन खेड़ा सत्याग्रह था। इसे भारत में गांधी जी का प्रथम वास्तविक ‘असहयोग आंदोलन‘ (First Non-Cooperation Movement) माना जाता है। गाँधी जी सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया के सदस्य बिट्ठल भाई पटेल के साथ यहाँ पहुंचे।

1. विवाद का मुख्य कारण और पृष्ठभूमि

  • भीषण अकाल और फसल की तबाही: 1918 में गुजरात के खेड़ा ज़िले में भारी प्राकृतिक आपदा (सूखे) के कारण फसलें पूरी तरह नष्ट हो जाने के बावजूद सरकार ने किसानों को लगान में छूट नहीं दी गई।
  • लगान कोड (Revenue Code) का उल्लंघन: ब्रिटिश शासन के राजस्व संहिता नियमों के अनुसार, यदि किसी वर्ष प्राकृतिक आपदा के कारण पैदावार सामान्य की एक-चौथाई (25%) से भी कम होता हैं, तो किसानों का भू-राजस्व (लगान) पूरी तरह माफ कर दिया जाना चाहिए था।
  • ब्रिटिश अधिकारियों की ज़िद: इसके बावजूद, प्रांतीय सरकार ने फसल के नुकसान की परवाह न करते हुए लगान वसूली में 23% की वृद्धि कर दी और किसानों से बलपूर्वक कर वसूला जाने लगा। लगान न देने पर किसानों की ज़मीन व मवेशियों की कुर्की की धमकियाँ दींजाने लगी।

2. गांधी जी का नेतृत्व और रणनीति

  • सत्याग्रह का आह्वान: स्थिति की समीक्षा करने के बाद गांधी जी ने किसानों को राय दी कि जब तक लगान में छूट नहीं मिलाती तब तक वे सरकार को लगान देना बंद कर दें।
  • असहयोग का पहला प्रयोग: किसानों ने शपथ ली कि वे जेल जाने या संपत्ति ज़ब्त होने की परवाह किए बिना लगान नहीं देंगे। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ गांधी जी का पहला सीधा असहयोग आंदोलन बना।

3. प्रमुख सहयोगी एवं समर्पित नेतृत्व

  • सरदार वल्लभभाई पटेल का उभार: खेड़ा आंदोलन से ही वल्लभभाई पटेल ने अपनी वकालत छोड़कर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और गांधी जी के सबसे निष्ठावान सहयोगी बने।
  • अन्य प्रमुख सहयोगी:
    • विट्ठलभाई पटेल (गुजरात सभा के वरिष्ठ सदस्य), इंदुलाल याज्ञिक, महादेव देसाई, नरहरि पारिख, अनुसूइया बेन
    • सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी (Servants of India Society): गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा स्थापित इस संस्था के सदस्यों ने भी किसानों की स्थिति की निष्पक्ष जाँच में गांधी जी का पूरा सहयोग किया।

4. परिणाम और समाधान

  • ब्रिटिश सरकार का गुप्त आदेश: गांधी जी के नेतृत्व, किसानों की अटूट दृढ़ता और बढ़ते जनाक्रोश के आगे ब्रिटिश अधिकारियों को झुकना पड़ा।
  • समझौता: सरकार ने गुप्त रूप से राजस्व अधिकारियों को निर्देश दिया कि लगान केवल उन्हीं किसानों से वसूला जाए जो इसे स्वेच्छा से देने में सक्षम हैं, तथा गरीब/असमर्थ किसानों का लगान माफ कर दिया जाए। साथ ही ज़ब्त की गई ज़मीनें और मवेशी भी लौटा दिए गए।

5. परीक्षा-विशेष महत्वपूर्ण तथ्य (PYQs Focus)

  • “प्याज चोर” (Onion Thief) और मोहनलाल पंड्या: स्थानीय किसान नेता मोहनलाल पंड्या ने सरकार द्वारा ज़ब्त किए गए एक खेत से जबरन प्याज की फसल काट ली थी। इस बहादुरी के लिए गांधी जी ने उन्हें प्यार से ‘प्याज़ चोर‘ की उपाधि दी थी। मोहनलाल पंड्या ने इस आंदोलन में किसानों को संगठित किया और जेल भी गए।
  • प्रथम असहयोग: इतिहासकार ए. आर. देसाई और कई विद्वान खेड़ा सत्याग्रह को गांधी जी का भारत में पहला ‘असली असहयोग आंदोलन‘ मानते हैं।

3. गांधी जी के सामाजिक लक्ष्य एवं वैचारिक परिवर्तन

महात्मा गांधी केवल एक राजनीतिक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक और दार्शनिक भी थे। उनका स्पष्ट मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक समाज आंतरिक रूप से सशक्त, एकजुट और कुरीतियों से मुक्त न हो।

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1. तीन मुख्य सामाजिक लक्ष्य

राष्ट्रीय आंदोलन के संचालन के साथ-साथ गांधी जी ने समाज सुधार के लिए तीन बुनियादी प्राथमिकताओं को अपने ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ (Constructive Programme) का हिस्सा बनाया:

हिंदू-मुस्लिम एकता (Communal Harmony):

  • गांधी जी का मानना था कि भारत की विविधता ही उसकी शक्ति है। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ (Divide and Rule) की नीति का मुकाबला करने के लिए उन्होंने दोनों समुदायों के बीच आपसी सौहार्द पर बल दिया।
    • इसी सोच के तहत उन्होंने 1919-20 में ‘खिलाफत आंदोलन’ का समर्थन करके राष्ट्रीय आंदोलन में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी को सुनिश्चित किया।

अस्पृश्यता (छुआछूत) उन्मूलन एवं दलितों का उत्थान:

  • गांधी जी छुआछूत को हिंदू समाज का सबसे बड़ा कलंक और सामाजिक पाप मानते थे।
    • उन्होंने दलितों को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘हरिजन‘ (ईश्वर के संतान) नाम दिया।
    • 1932 में उन्होंने ‘अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग’ (All India Anti-Untouchability League) की स्थापना की, जिसका नाम बाद में बदलकर ‘हरिजन सेवक संघ’ रखा गया। साथ ही उन्होंने ‘हरिजन’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया।

महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक स्थिति में सुधार:

  • गांधी जी ने महिलाओं को पर्दे, बाल-विवाह और सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों से बाहर निकाला और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा।
    • शराबबंदी (Prohibition) और स्वदेशी (चरखा व खादी) आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व रही। उनका दृढ़ मत था कि नैतिक और सामाजिक पुनरुत्थान में महिलाएं पुरुषों के बराबर की भागीदार हैं।

2. ब्रिटिश सरकार के प्रति वैचारिक परिवर्तन (उदारवादी से विद्रोही)

गांधी जी की विचारधारा ब्रिटिश साम्राज्य को लेकर एक क्रमिक परिवर्तन से गुजरी:

  • प्रारंभिक दौर (सहयोगी दृष्टिकोण):
    • 1915 में भारत लौटने पर गांधी जी ब्रिटिश शासन के पूरी तरह विरोधी नहीं थे। उन्हें ब्रिटिश न्यायप्रियता और संविधान पर विश्वास था।
    • प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) के दौरान उन्होंने भारतीयों को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि युद्ध के बाद अंग्रेजों से स्वशासन (Home Rule) की मांग की जा सके। इसी कारण अंग्रेजों ने उन्हें ‘केसर-ए-हिंद‘ की उपाधि दी और लोगों ने उन्हें व्यंग्य से ‘भर्ती कराने वाला सार्जेंट‘ (Recruiting Sergeant) कहा।
  • विचारधारा में निर्णायक बदलाव (1919की घटनाएं):
    • रॉलेट एक्ट (March 1919): प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों ने सहूलियत देने के बजाय ‘रॉलेट एक्ट’ (बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील का कानून) लागू कर दिया।
    • जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919): अमृतसर में निर्दोष हत्थों पर जनरल डायर द्वारा गोलियां चलवाने की बर्बर घटना ने गांधी जी को भीतर तक झकझोर दिया।
    • परिणाम: इन घटनाओं के बाद गांधी जी का ब्रिटिश न्यायप्रियता से पूरी तरह विश्वास उठ गया। वे अंग्रेजों के ‘सहयोगी’ (Cooperator) से बदलकर ‘असहयोगी‘ (Non-Cooperator) बन गए। उन्होंने अपनी ‘केसर-ए-हिंद’ की उपाधि लौटा दी और 1920 में पूरे देश में ‘असहयोग आंदोलन’ (Non-Cooperation Movement) की शुरुआत की।

 गांधी युग (भाग-2): मुख्य बिंदु एक नज़र में

परीक्षा-विशेष वन-लाइनर तथ्य (Quick Revision PYQs):

  1. ‘महात्मा‘ की उपाधि: चंपारण सत्याग्रह की अभूतपूर्व सफलता के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास कर्मचंद गांधी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी थी।
  2. ‘प्याज़ चोर‘ की उपाधि: खेड़ा सत्याग्रह के दौरान ज़ब्त की गई भूमि से प्याज़ की फसल काटने का साहस दिखाने पर गांधी जी ने किसान नेता मोहनलाल पंड्या को ‘प्याज़ चोर’ की उपाधि दी थी।
  3. ‘तीनकठिया प्रणाली‘: बिहार के चंपारण में यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा किसानों को अपनी ज़मीन के 3/20 भाग (तीन कट्ठा प्रति बीघा) पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करने के लिए बाध्य करने की प्रथा।

निष्कर्ष (Conclusion)

वर्ष 1915 से 1918 के बीच संचालित चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा के प्रारंभिक सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक नए युग के सूत्रपात का प्रतीक हैं। दक्षिण अफ्रीका में अहिंसा और सत्याग्रह का सफल प्रयोग करने के बाद, महात्मा गांधी ने इन स्थानीय आंदोलनों के माध्यम से भारत की धरातलीय समस्याओं—जैसे किसानों का शोषण, मिल मजदूरों का उत्पीड़न और लगान की जबरन वसूली—को गहराई से समझा और उनका अहिंसक समाधान प्रस्तुत किया।

इन तीन प्रारंभिक सफलताओं का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रभाव यह रहा कि इन्होंने भारतीय जनमानस में व्याप्त भय को समाप्त कर उनमें आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की भावना का संचार किया। गांधी जी ने यह सिद्ध कर दिया कि अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलकर दुनिया की सबसे शक्तिशाली हुकूमत को भी झुकने पर मजबूर किया जा सकता है। इन क्षेत्रीय आंदोलनों ने न केवल गांधी जी को राष्ट्रीय स्तर पर एक सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित किया, बल्कि आने वाले समय में 1920 के असहयोग आंदोलन जैसे वृहद राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए एक सुदृढ़ जन-आधार और सांगठनिक ढाँचा भी तैयार कर दिया।

विश्वविद्यालयीय परीक्षाओं (BA/MA) में उत्तर-लेखन की दृष्टि से इन तीनों आंदोलनों के कारण, कार्यप्रणाली और उनके क्रमिक विकास को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही प्रारंभिक प्रयोग आगे चलकर पूरे ‘गांधीवादी युग’ की वैचारिक नीव बनते हैं।

पिछला भाग: गांधी युग नोट्स पार्ट-1: जीवन परिचय, दक्षिण अफ्रीका प्रवास एवं भारत आगमन (1869-1915)

अगला भाग: गांधी युग नोट्स पार्ट-3: रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड (1919) – संपूर्ण इतिहास एवं 37 PYQs

विद्यार्थियों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारत में महात्मा गांधी का पहला सफल सत्याग्रह कौन सा था?

उत्तर: भारत में महात्मा गांधी का पहला सफल सत्याग्रह चंपारण सत्याग्रह (अप्रैल 1917, बिहार) था। यह सत्याग्रहकिसानों को बागन मालिको की शोषक ‘तीनकठिया पद्धति’ (3/20 भाग पर अनिवार्य नील की खेती) से छुटकारा (मुक्ति) दिलाने के लिए चलाया गया था।

2. गांधी जी ने भारत में पहली बार भूख हड़ताल किस आंदोलन में की थी?

उत्तर: गांधी जी ने भारत में पहली बार भूख हड़ताल (अनशन) मार्च 1918 के अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन केदौरान की। उन्होंने यह अनशन मजदूरों के 35% प्लेग बोनस देने की न्यायोचित माँग के समर्थन में की थी।

3. किस आंदोलन की सफलता के बाद गांधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि मिली थी?

उत्तर: चंपारण आन्दोलन (1917 ई.) की अभूतपूर्व सफलता से प्रभावित होकर रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास कर्मचंद गांधी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी थी।

4. गांधी जी का पहला वास्तविक ‘असहयोग आंदोलन’ किसे माना जाता है?

उत्तर:गांधी जी का पहला वास्तविक ‘असहयोग आंदोलन’मार्च 1918 के खेड़ा सत्याग्रह (गुजरात) माना जाता है। उन्होंने खेड़ा आन्दोलन के दौरान फसल नष्ट हो जाने के बावजूद सरकार द्वारा लगान में छूट न दिए जाने के कारण कर (लगान) न देने का नारा दिया था।


5. बिहार के चंपारण में किसानों की समस्या की ओर गांधी जी का ध्यान किसने आकर्षित किया था?

उत्तर: 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में बिहार के स्थानीय किसान नेता राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी से मुलाकात की। उसने चंपारण के किसानों पर हो रहे अत्याचार एवं उनकी दुर्दशा के बारे में बताया और उन्हें चंपारण आने का निमंत्रण दिया था।

Dr. Om Prakash Singh, Assistant Professor and Head of History Department at Constituent Government College Thakurdwara

Dr. Om Prakash Singh

Assistant Professor & Head, Department of History

Constituent Government College, Thakurdwara, Moradabad (U.P)

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